Pongal 2023: विविधता के रंग लिये है भारतीय संस्कृति। उत्सव, त्योहार, सब मनाये जाते हैं लेकिन बस देशकाल और परिस्थितियां उनका नाम और मनाने की परंपरा को बदल देती हैं। इसी तरह का त्योहार है पोंगल। दक्षिण भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक पोंगल को भी उसी दौरान मनाया जाता है जिस समय सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायन होने के समय को उत्तर भारत में मकर संक्रांति के नाम से मनाया है। केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक जैसे दक्षिण भारतीय क्षेत्र का प्रमुख उत्सव पोंगल द्रविड़ फसल के त्योहार के रूप में मनाया जाता है। पोंगल मनाने का इतिहास आज का नहीं है। ईसा से 200- 300 वर्ष ईस्वी पहले से इस त्योहार को मनाने की परंपरा द्रविणाें ने आरंभ की थी।
पोंगल से जुड़ी कहानी
माना जाता है कि पोंगल त्योहार को भगवान शिव के विशेष संदेश के प्रसार प्रचार के रूप में भी मनाया जाता है। एक बार भगवान शंकर ने अपने बैल बसव को स्वर्ण से पृथ्वी पर जाकर प्रतिदिन तेल मर्दन और माह में एक बार भाेजन करने का संदेश देने को कहा। लेकिन बैल बसव ने धरती पर आकर इसके विपरीत बात कही। बैल बसव की इस गलती का पता जब महादेव को चला तो वे क्राेधित हुए और उसे श्राप देकर कहा कि वो स्थायी रूप से अब धरती पर ही रहेगा। धरती पर रहकर मनुष्यों की अधिक अन्न उपजाने के लिए सहायता करेगा, उनके खेत जोतने में योगदान देगा। इस तरह पोंगल का त्योहार फसल और मवेशियों से संबंधित उत्सव मनाने का दिन है।
चार दिन तक चलता है पोंगल उत्सव
पोंगल उत्सव एक या दो नहीं बल्कि चार दिन का त्योहार है। ईश्वर को फसल रूपी वरदान देने के लिए उनका आभार करने का ये त्योहार होता है। पोंगल शब्द तमिल भाषा का है। जोकि थाई माह यानि जनवरी से फरवरी के मध्य मनाया जाता है। इस बार पोंगल 15 जनवरी से 18 जनवरी के मध्य मनाया जाएगा। भाेगी, पोंगल के पहले दिन को कहा जाता है। इस दिन भगवान इंद्र को वर्षा करने के लिए आभार दिया जाता है। थाई पोंगल, उत्सव का दूसरा दिन है। यह दिन सूर्य देव को समर्पित होता है। इस दिन घर− घर में कोलम यानी चावल के आटे से रंगोली बनाई जाती है। तीसरा दिन मट्टू पोगल होता है। यह दिन फसल के लिए उपयोगी मवेशियों को समर्पित होता है। इस दिन केरल में जल्ल्ली कट्टू खूेल भी हा्ेता है। कान्नुत पोंगल, उत्सव का अंतिम और चौथा दिन है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की आरती करती हैं। उनकी सुरक्षा और सुख की कामना करती हैं।
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