Ramadan Ka 15th Roza Kyu Khas Hota Hai: रमजान का महीना तीन हिस्सों में बांटा गया है। इसमें पहला अशरा रहमत का, दूसरा अशरा मगफिरत यानी माफी का और तीसरा अशरा जहन्नम से निजात का होता है। 15वां रोजा मगफिरत के अशरे के बीच में आता है। इस कारण इसे रूहानी तौर पर बहुत अहम माना जाता है। यह दिन बंदे को याद दिलाता है कि वह अपने गुनाहों की सच्चे दिल से तौबा करे और अल्लाह से माफी मांगे। इस दौरान की गई दुआ और इस्तगफार को खास अहमियत दी जाती है। माना जाता है कि जो इंसान सच्चे दिल से अपने गुनाहों पर शर्मिंदा होकर माफी मांगता है, अल्लाह उसे बख्श देता है।
इंसान की जरूरत और अल्लाह की बेनियाजी
इस्लाम की पवित्र किताब कुरआन में सूरह फातिर (35:15) में कहा गया है कि इंसान अल्लाह का मोहताज है और अल्लाह बेनियाज है। इसका मतलब यह है कि हर इंसान को अपने रब की जरूरत है, जबकि अल्लाह किसी का मोहताज नहीं है। 15वां रोजा इस बात का एहसास और गहरा करता है कि हमें अपनी कमजोरी समझनी चाहिए और हर हाल में अल्लाह की तरफ रुख करना चाहिए। रमजान के इस दौर में बंदा जब अपनी गलतियों को मानकर तौबा करता है तो वह अपने रब के और करीब हो जाता है।
वादे की पाबंदी और सच्चा अमल
रोजा सिर्फ भूख और प्यास का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने वादे पर कायम रहने का भी पैगाम देता है। कुरआन की सूरह सफ (61:3) में बताया गया है कि अल्लाह के नजदीक यह बात नापसंद है कि इंसान वह कहे जो वह करता नहीं। 15वें रोजे के मौके पर यह बात खास तौर पर याद दिलाई जाती है कि अगर हम अल्लाह से मगफिरत और रहमत की उम्मीद रखते हैं, तो हमें भी अपने वादों और जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाना चाहिए। नेक नीयत, नेक काम और सच्चाई के साथ किया गया अमल ही असली रोजा है।
आय्यामे बीज और आधे रमजान का पड़ाव
इस्लामी महीनों की 13, 14 और 15 तारीख को आय्यामे बीज कहा जाता है। इन दिनों में नफ्ल रोजा रखने की भी अहमियत बताई गई है। रमजान में तो हर दिन रोजा फर्ज है, लेकिन 15वीं तारीख आधे महीने के पूरे होने का एहसास भी दिलाती है। यह दिन बंदे को सोचने पर मजबूर करता है कि अब तक उसने अपने अंदर कितना बदलाव किया और आगे के दिनों में वह अपनी इबादत को कैसे और बेहतर बना सकता है।
इस दिन अल्लाह की इबादत कैसे करें?
रमजान के 15वें रोजे पर मुसलमान ज्यादा से ज्यादा इस्तगफार पढ़ते हैं और ‘अस्तगफिरुल्लाह’ का जिक्र करते हैं। पांच वक्त की नमाज के साथ नफ्ल नमाज और तहज्जुद का एहतमाम किया जाता है। कुरआन की तिलावत की जाती है और उसके मतलब पर भी गौर किया जाता है। इफ्तार से पहले का वक्त दुआ के लिए खास माना जाता है, इसलिए उस समय दिल से दुआ करना बेहतर समझा जाता है।
जरूरतमंदों को सदका देना और लोगों की मदद करना भी इस दिन की इबादत का हिस्सा माना जाता है। इसके साथ ही इंसान को चाहिए कि वह अपने व्यवहार, जुबान और रिश्तों में सुधार लाने का पक्का इरादा करे। रमजान का 15वां रोजा दरअसल आत्ममंथन का दिन है। यह याद दिलाता है कि आधा महीना गुजर चुका है और अब बाकी दिनों को और ज्यादा लगन, सच्चाई और इबादत के साथ बिताने की जरूरत है, ताकि अल्लाह की रहमत और मगफिरत हासिल हो सके।
