अध्यात्म

Kangana Ranaut Kalighat Temple Visit : क्यों खास है कोलकाता का कालीघाट मंदिर, जहां कंगना रनौत ने किए दर्शन, जानिए क्या है इस मंदिर का इतिहास

Kangana Ranaut Kalighat Temple Visit : बॉलीवुड अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत ने 7 अप्रैल मंगलवार को कोलकाता स्थित प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर में दर्शन किए। ये काली मंदिर बेहद खास है, आइए जानते हैं कि इसकी क्या विशेषताएं हैं।

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क्यों खास है कालीघाट मंदिर कोलकाता

Kangana Ranaut Kalighat Temple Visit : बॉलीवुड अभिनेत्री और बीजेपी सांसद कंगना रनौत मंगलवार को कोलकाता दौरे पर पहुंचीं, जहां उन्होंने प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर में मां काली के दर्शन कर पूजा-अर्चना की। इस दौरान उन्होंने पूरे विधि-विधान के साथ मां के चरणों में पुष्प अर्पित किए और देश व पश्चिम बंगाल की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की।

कंगना ने मंदिर के पुजारियों से आशीर्वाद लिया और उन्होंने अपनी इस यात्रा को भक्ति और आध्यात्मिक अनुभव बताया। कंगना की यात्रा आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से बेहद ही खास मानी जा रही है। दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर बीजेपी ने उन्हें अपने स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल किया था। इस लिस्ट में प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और कई बड़े नेता भी शामिल हैं, जिनके साथ कंगना को भी चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी दी गई थी।

हालांकि बाद में पार्टी की रणनीति में बदलाव हुआ और कुछ बाहरी नेताओं के नाम हटाए गए, जिनमें कंगना रनौत का नाम भी शामिल था। उनकी यह यात्रा सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रही है। कालीघाट दर्शन के बाद उन्होंने पास स्थित नकुलेश्वर भैरव मंदिर में भी जाकर पूजा की, जिसे इस शक्तिपीठ का रक्षक माना जाता है।

क्यों खास है कालीघाट मंदिर (Kalighat Temple)?

कालीघाट मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है और इसे अत्यंत जागृत और चमत्कारी स्थान माना जाता है। कालिका पुराण के अनुसार यह चार आदि शक्ति पीठों में शामिल है, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता और भी बढ़ जाती है। यहां मां काली दक्षिणा कालिका के रूप में विराजमान हैं, जिन्हें बुराई का नाश करने वाली देवी माना जाता है। यह मंदिर आदि गंगा के तट पर स्थित है। कालीघाट मंदिर भारत के सबसे रहस्यमयी और शक्तिशाली मंदिरों में गिना जाता है। यह देवी के यह 51 शक्तिपीठों में से एक है। कालिका पुराण के अनुसार यह मंदिर चार आदि शक्ति पीठों में भी शामिल है। यहां मां दक्षिणा कालिका रूप में विराजमान हैं। यहां माता सती के दाहिने पैर की 4 उंगलियां गिरी थीं। माना जाता है कि यहां पर मां सती के ये अंग आज भी मंदिर में मौजूद हैं, जिसे लोहे की संदूक में छिपाकर रखा जाता है। इसे साल में एक बार स्नान यात्रा पर निकाला जाता है। पुजारी आंखों में पट्टी बांधकर उस अंग को स्नान कराते हैं। यह परंपरा आज भी एक गहरा रहस्य बनी हुई है।

क्यों खास है नकुलेश्वर भैरव मंदिर?

कालीघाट शक्तिपीठ की रक्षा करने वाले भैरव हैं । धार्मिक मान्यता के अनुसार हर शक्ति पीठ के साथ एक भैरव होते हैं, जो उस स्थान की रक्षा करते हैं और भक्तों को नकारात्मक शक्तियों से दूर रखते हैं। कालीघाट में भी मां काली के दर्शन को पूर्ण तभी माना जाता है, जब भक्त नकुलेश्वर भैरव के दर्शन भी करें। इस कारण इस मंदिर का महत्व कालीघाट के बराबर ही माना जाता है और दोनों का संबंध एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है।

नकुलेश्वर भैरव मंदिर का इतिहास काफी प्राचीन माना जाता है। मान्यता है कि 15वीं शताब्दी में नाथ संप्रदाय के संत चौरांगा गिरि ने यहां स्वयंभू शिवलिंग की खोज की थी। शुरुआती समय में यह स्थान एक साधारण झोपड़ी के रूप में था, जहां साधक पूजा करते थे। बाद में वर्ष 1854 में इसका निर्माण एक भव्य मंदिर के रूप में किया गया। समय के साथ यह मंदिर कालीघाट शक्तिपीठ का अभिन्न हिस्सा बन गया और आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

कालीघाट मंदिर में एक विशेष परंपरा मानी जाती है कि यहां आने वाले भक्त पहले भैरव के दर्शन करते हैं, उसके बाद मां काली के दर्शन किए जाते हैं। यह परंपरा इस विश्वास पर आधारित है कि भैरव इस शक्तिपीठ के रक्षक हैं और उनकी अनुमति के बिना देवी के दर्शन अधूरे माने जाते हैं। इसी कारण नकुलेश्वर भैरव मंदिर और कालीघाट मंदिर का संबंध बेहद गहरा और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

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Mohit Tiwari
मोहित तिवारी author

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ... और देखें

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