काल भैरव अष्टक स्तोत्र
Kaal Bhairav Ashtak Benefits : 12 नवंबर का भगवान शिव के सबसे शक्तिशाली और रौद्र स्वरूप बाबा काल भैरव का जयंती का पर्व है। यह मार्गशीर्ष माह के कृष्णपक्ष की पंचमी के दिन मनाया जाता है। मान्यता है कि काल भैरव जयंती पर अगर काल भैरव अष्टक स्तोत्र का पाठ कर लिया जाए तो प्रभु की कृुपा प्राप्त होती है।आदिशंकराचार्य जी द्वारा लिखित ये अष्टक इतना शक्तिशाली है कि इसके पाठ से राहु-केतु, शनि, तंत्र-मंत्र, शत्रु, डर, कर्ज सब से मुक्ति मिल जाती है। आज शाम 8 बजे के बाद सरसों का तेल का दीपक जलाकर इस अष्टक का पाठ करें।
काल भैरव अष्टक रोज या आज जयंती पर पढ़ने से राहु-केतु का दोष 100% खत्म हो जाता है, अचानक आने वाली परेशानियां हमेशा के लिए बंद हो जाती हैं। शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का बुरा असर कम पड़ता है, करियर में रुकावटें अपने आप हटने लगती हैं। तंत्र-मंत्र, ब्लैक मैजिक और नजर दोष से पूरी सुरक्षा मिलती है, कोई नेगेटिव एनर्जी घर में घुस ही नहीं पाती है।
शत्रु अपने आप पीछे हट जाते हैं, कोर्ट-कचहरी के केस में जीत निश्चित हो जाती है। कर्ज से मुक्ति मिलती है, अटका हुआ पैसा 11 दिन के अंदर वापस आना शुरू हो जाता है। डर, घबराहट, डिप्रेशन सब खत्म हो जाते हैं, रात को अच्छी नींद आती है। धन आने के रास्ते खुल जाते हैं, व्यापार में बरकत बढ़ती है। भक्ति और ज्ञान दोनों बढ़ते हैं, मन हमेशा शांत रहता है। मृत्यु का भय दूर हो जाता है, लंबी उम्र और सुरक्षा मिलती है। 8 सिद्धियां हाथ लगती हैं, मनचाहा वरदान मिलता है। अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
|| श्री गणेशाय नमः। श्री स्वामी सामर्थाय नमः। ||
श्लोक 1
देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥
अर्थ: इंद्र देवता जिनके पवित्र चरणकमलों की सेवा करते हैं, सांप यज्ञसूत्र जैसे हैं, चंद्रमा सिर पर सजते हैं, बहुत दयालु हैं, नारद जैसे बड़े योगी जिनकी वंदना करते हैं, दिगंबर (कपड़े नहीं पहनते), काशी के राजा काल भैरव को मैं नमस्कार करता हूं।
श्लोक 2
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥
अर्थ: करोड़ सूर्यों जैसे चमकते हैं, संसार रूपी समुद्र से पार लगाते हैं, नीला कंठ, मनचाही इच्छा पूरी करते हैं, तीन नेत्र, काल के भी काल, कमल जैसे नेत्र, त्रिशूल और डमरू धारण किए, अविनाशी – ऐसे काशी के राजा काल भैरव को मैं नमस्कार करता हूं।
श्लोक 3
शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥
अर्थ: हाथ में त्रिशूल, चिमटा, पाश, डंडा लिए हैं, आदि कारण (सबसे पहले), नीला शरीर, आदि देव, कभी नष्ट नहीं होते, रोग रहित, भयंकर पराक्रमी, नाचना बहुत पसंद है – ऐसे काशी के राजा काल भैरव को मैं नमस्कार करता हूं।
श्लोक 4
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ४॥
अर्थ: भोग और मोक्ष दोनों देते हैं, सुंदर शरीर, भक्तों से बहुत प्यार करते हैं, सारे लोकों में व्याप्त, कमर में सोने की घंटियां बजती हैं – ऐसे काशी के राजा काल भैरव को मैं नमस्कार करता हूं।
श्लोक 5
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशनं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५॥
अर्थ: धर्म की रक्षा करते हैं, अधर्म का नाश, कर्म के बंधन काटते हैं, सुख देते हैं, सर्वव्यापी, सोने जैसे रंग का शेषनाग कमर में शोभा देता है – ऐसे काशी के राजा काल भैरव को मैं नमस्कार करता हूं।
श्लोक 6
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६॥
अर्थ: रत्न जड़ी जूतियां पहनते हैं, कोई दूसरा नहीं, मनचाहे देवता, बिना दोष, मृत्यु का घमंड तोड़ते हैं, डरावने दांत – ऐसे काशी के राजा काल भैरव को मैं नमस्कार करता हूं।
श्लोक 7
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७॥
अर्थ:जोर की हंसी से ब्रह्मांड हिल जाता है, एक नजर से सारे पाप जल जाते हैं, कड़क शासन, 8 सिद्धियां देते हैं, खोपड़ियों की माला पहनते हैं – ऐसे काशी के राजा काल भैरव को मैं नमस्कार करता हूं।
श्लोक 8
भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८॥
अर्थ: भूत-प्रेत के सेनापति, बड़ी कीर्ति देते हैं, काशी में रहने वालों के पुण्य-पाप साफ करते हैं, न्याय के जानकार, सबसे पुराने, जगत के स्वामी – ऐसे काशी के राजा काल भैरव को मैं नमस्कार करता हूं।
फल श्रुति (लाभ)
कालभैरवाष्टकं पठंति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् ।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम् ॥
अर्थ: जो ये सुंदर अष्टक पढ़ते हैं, उन्हें ज्ञान और मोक्ष मिलता है, पुण्य बढ़ता है, दुख, मोह, गरीबी, लोभ, गुस्सा, तनाव सब नष्ट हो जाते हैं। ऐसे लोग निश्चित ही बाबा भैरव के चरणों में जगह पाते हैं।
|| इति कालभैरवाष्टकम् संपूर्णम् ||
|| श्रीगुरुदत्तात्रेयार्पणमस्तु ||
|| श्री स्वामी समर्थापर्ण मस्तु ||
आज की शाम को दीपक जलाएं। काले कुत्ते को जलेबी खिलाएं। ये अष्टक 1, 3 या 11 बार पढ़ें। अंत में ‘ॐ कालभैरवाय नमः’ का 11 बार जाप करें।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।