अध्यात्म

प्रवचन: बिना विधि-विधान के की गई पूजा भी क्या स्वीकार होती है? जानें प्रेमानंद महाराज का जवाब

Premanand Maharaj Pravachan In Hindi: जब प्रेमानंद महाराज से किसी भक्त ने पूछा कि क्या बिना विधि-विधान के की गई पूजा भी स्वीकार होती है? तो इस पर प्रेमानंद महाराज ने जो जवाब दिया वो सभी को जरूर सुनना चाहिए।

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बिना विधि-विधान के की गई पूजा भी क्या स्वीकार होती है?

Premanand Maharaj Pravachan In Hindi: अक्सर प्रेमानंद महाराज से मिलने गए श्रद्धालु उनसें कई तरह के सवाल करते हैं जिस पर महाराज जी बड़े ही सरल तरीके से जवाब देते हुए उनका मार्गदर्शन करते हैं। ऐसे ही जब किसी भक्त ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि क्या बिना विधि-विधान के की गई पूजा भी भगवान स्वीकार करते हैं तो इस पर महाराज जी ने समझाते हुए कहा कि बिल्कुल नियम-कानून के बिना भी पूजा सार्थक होती है क्योंकि ईश्वर भक्ति भाव सबसे पहले देखते हैं।

अगर आपके अंदर भाव है और आपसे नियम-कानून का खंडन भी होता है तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। महाराज जी ने इस पर जगन्नाथ भगवान की भक्त कर्माबाई की कहानी भी सुनाई। कर्माबाई के मन में एक समय विचार आया कि भगवान जगन्नाथ को दिन में तो खूब भोग लगता है लेकिन रात में ऐसा नहीं किया जाता। उन्होंने सोचा भगवान को जरूर ही रात में भूख लगती होगी। इसके बाद उन्होंने 3 बजे उठकर बिना नहाए धोए सबसे पहले खिचड़ी बनाई और फिर जगन्नाथ जी को रोकर पुकारने लगीं। जगन्नाथ जी भी उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर आने लगे। भगवान उनकी गोद में बैठ जाते और उनके हाथों से खिचड़ी खाते।

एक बार जब कर्माबाई सुबह 7 बजे स्नान करने जा रही थीं तो उन्हें एक संत मिल गए जो नियम से चलते थे। उन्होंने कर्माबाई से कहा कि स्नान करने जा रहे हो किस प्रकार की भक्त हो सूर्योदय हो गया और अभी तक स्नान नहीं किया। भक्त तो तड़के स्नान करते हैं। जिस पर कर्माबाई ने कहा कि तड़के तो ठाकुर जी का भोग बनाती हूं। ये सुनकर संत ने कहा कि कितना बड़ा अपराध कर दिया। बिना स्नान किए ठाकुर जी को भोग लगा दिया ये तो अपराध है। फिर उन्होंने दूसरे दिन दिनचर्या के कार्य निपटाने के बाद स्नान किया और भोग बनाया। फिर ठाकुर जी को जैसे ही भोग लगाया वैसे ही वो अंतर्ध्यान हो गए। मंदिर के कपाट खुले तो देखा ठाकुर जी के मुख में खिचड़ी लगी थी। तब जगन्नाथ जी के पार्षदों ने पूछा कि अभी तो भोग आया नहीं तो भगवान के मुख पर प्रसाद कैसे लगा है।

तब भगवान बोले कि वो कर्माबाई नियम वालों के चक्कर में पड़ गई है तो इतना ही भोग मिल पाया। तो कर्माबाई से कह दो कि मैं नियमों से प्रसन्न नहीं होता बल्कि मैं प्रेम से प्रसन्न होता हूं। इसलिए जब कभी भाव से भक्त भगवान को कुछ देता है तभी भगवान उसे ग्रहण करते हैं नियमों से नहीं।

प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि सेवा में प्रधानता भाव की होनी चाहिए नियम की नहीं। अगर खूब उत्साह है अंदर तो भगवान बिना नियम के भी प्रसन्न हो जाएंगे।

Laveena Sharma
लवीना शर्माauthor

धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर की रहने वाली हूं। पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट हूं। 10 साल से मीडिया में काम कर रही हूं। पत्रकारिता में करियर की शुरुआत न्यूज 24 से हुई। इसके बाद तमाम चैनलों में काम किया। जहां स्क्रिप्ट राइटिंग, एडिटिंग और एंकरिंग का अनुभव हासिल हुआ। रफ्तार यहीं नहीं रूकी अब चाह थी कुछ नया करने की जिसके लिए मैंने डिजिटल मीडिया में स्विच किया और मैं जनसत्ता से जुड़ गई। जनसत्ता में मैंने अध्यात्म सेक्शन लीड किया। इसके बाद पत्रिका में सेवाएं दी और अब timesnowhindi.com से जु़ड़ी हूं। यहां भी मैं अध्यात्म सेक्शन में कार्यरत हूं। भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और ज्योतिष शास्त्र में मेरा शुरू से ही लगाव रहा है। मेरी कोशिश रहती है कि मैं ऐसा कंटेट लिखूं जिससे बड़े बुजुर्ग ही नहीं बल्कि आज के युवा भी कनेक्ट कर सकें।

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