दिवाली का त्योहार आ गया है। लोगों के घर दीये से सज चुके हैं। गलियां रोशन हो चुकी हैं। लेकिन क्या दिवाली की रोशनी सिर्फ हमारे घरों और बाजारों के लिए है? जाने-माने आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु के मुताबिक, इस त्योहार का असली मतलब इससे कहीं आगे है। बाहर जलने वाला हर दीया हमें अपने भीतर झांकने की याद दिलाता है। सवाल यह है कि हमारे अंदर कितना उजाला है?
सद्गुरु दिवाली को स्पष्टता यानी क्लैरिटी का त्योहार मानते हैं। उनके अनुसार रोशनी सिर्फ अंधेरा दूर करने का साधन नहीं है। यह जीवन को साफ नजर से देखने का प्रतीक भी है। जब सोच में उलझन होती है, तो ज्ञान और आत्मविश्वास होने के बावजूद इंसान गलत फैसले ले सकता है। इसलिए जरूरी है कि बाहर की रोशनी के साथ भीतर की उलझनों पर भी ध्यान दिया जाए।
अंदर का अंधेरा आखिर है क्या?
हमारे भीतर का अंधेरा किसी कमरे की तरह दिखाई नहीं देता। यह गुस्सा, डर, नफरत, जलन और लगातार बनी रहने वाली नकारात्मकता के रूप में सामने आ सकता है। सद्गुरु दिवाली की कथा में आने वाले नरकासुर को इसी नजर से देखते हैं। उनके अनुसार जब इंसान के भीतर गुस्सा, ईर्ष्या और डर हावी हो जाते हैं, तो वह खुद अपने लिए परेशानी और दुख पैदा करने लगता है।
इसलिए दिवाली का एक संदेश यह भी है कि हम देखें कि हमारे भीतर कौन-सी चीज हमें परेशान कर रही है। किसी से पुरानी नाराजगी है? हर बात पर गुस्सा आता है? किसी दूसरे की सफलता देखकर मन खराब होता है? इन भावनाओं को पहचानना ही बदलाव की शुरुआत हो सकती है।
सिर्फ दीया जलाने से बात पूरी नहीं होती
दिवाली पर घर के बाहर सैकड़ों दीये जल सकते हैं, लेकिन अगर मन लगातार उलझा हुआ है तो उस रोशनी का मतलब अधूरा रह जाता है। सद्गुरु के विचारों में बाहरी दीया भीतर की जागरूकता की याद दिलाता है। यानी रोशनी को सिर्फ देखना नहीं, उसे अपने व्यवहार में भी उतारना जरूरी है।
इसका मतलब यह नहीं कि इंसान कभी गुस्सा न करे या उसे कोई दुख महसूस न हो। बात अपनी भावनाओं को दबाने की नहीं, बल्कि उन्हें समझने की है। जब हम अपनी प्रतिक्रिया को देखने लगते हैं, तब धीरे-धीरे यह समझ आने लगती है कि किसी स्थिति में हमें कैसे व्यवहार करना है।
एक और अंधेरा है 'जड़ता'
सद्गुरु दिवाली को जड़ता यानी इनर्शिया से बाहर निकलने का प्रतीक भी मानते हैं। लगातार टालना, किसी काम में मन न लगना, जीवन को बस जैसे-तैसे चलाते रहना- ये सब धीरे-धीरे इंसान को भीतर से सुस्त बना सकते हैं। उनके अनुसार यही जड़ता जीवन की ऊर्जा को कम करती है।
इसलिए दिवाली को सिर्फ एक दिन का उत्सव मानने के बजाय जीवन में नई ऊर्जा लाने का मौका बनाया जा सकता है। परिवार के साथ समय बिताना, किसी पुराने काम को पूरा करना, अपने मन की कोई उलझन सुलझाना या बस रोजमर्रा की जिंदगी को ज्यादा जागरूक होकर जीना भी इसकी शुरुआत हो सकती है।
असली रोशनी कहां जलानी है?
दिवाली का सबसे खूबसूरत संदेश शायद यही है कि अंधेरे को खत्म करने के लिए हमेशा बाहर से रोशनी लाने की जरूरत नहीं होती। कई बार हमारे भीतर ही ऐसी चीजें जमा होती जाती हैं, जो रोशनी को ढक देती हैं। उन्हें पहचानकर हटाना जरूरी है।
इसलिए इस दिवाली घर में दीये जरूर जलाएं। लेकिन एक दीया अपने भीतर भी जलाने की कोशिश करें- स्पष्ट सोच का, जागरूकता का और जीवन को पूरे मन से जीने का। बाहर की रोशनी एक रात रहती है, लेकिन भीतर की रोशनी अगर जाग जाए तो उसका असर रोज की जिंदगी पर दिखाई दे सकता है।
