Amalaki (Amla) Ekadashi Puja Vidhi: पद्म पुराण के अनुसार, आंवला भगवान विष्णु को अति प्रिय होता है। इसलिए ही जो व्यक्ति आमलकी एकादशी पर इस पेड़ की विधिवत पूजा करने के साथ-साथ इसका दान करता है उस पर श्री हरि विष्णु भगवान की विशेष कृपा बनी रहती है। शास्त्रों में आमलकी एकादशी के व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। कहते हैं इस व्रत को करने से भक्तों को सौ गौ दान के बराबर फल प्राप्त होता है। इस साल आमलकी एकादशी का व्रत 10 मार्च को रखा जाएगा। चलिए आपको बताते हैं आमलकी एकादशी या आंवला एकादशी की पूजा विधि क्या है।
आमलकी एकादशी पूजा विधि (Amlaki Ekadashi Puja Vidhi)
- आमलकी एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान कर लें।
- इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें।
- फिर भगवान विष्णु की विधि विधान पूजा करें।
- भगवान को पीला फूल, माला, पीला चंदन, पीला भोग चढ़ाएं। साथ ही तुलसी भी जरूर अर्पित करें।
- आमलकी एकादशी की कथा सुनें और साथ में विष्णु चालीसा का पाठ करें।
- दिनभर व्रत रखने के बाद दूसरे दिन शुभ मुहूर्त में इस व्रत का पारण करें।
- इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद आंवले के पेड़ की पूजा करें।
- अगर आस-पास आंवले का पेड़ नहीं है तो भगवान विष्णु को आंवला अर्पित करें।
आंवले के पेड़ की पूजा विधि (Amle Ki Puja Vidhi)
- आमलकी एकादशी के दिन आंवले के पेड़ की पूजा के लिए पेड़ की चारों तरफ अच्छे से सफाई कर लें।
- फिर पेड़ के नीचे सफेद रंग की रंगोली बनाएं और वहां पानी भरा हुआ कलश रखें।
- कलश के कंठ में श्रीखंड चंदन का लेप लगाएं।
- इसके बाद कलश में सभी देवी-देवताओं, तीर्थों और सागर को आमंत्रित किया जाता है।
- फिर कलश में इत्र और पंच रत्न रखे जाते हैं। इसके बाद कलश पर मिट्टी का ढक्कन रख दें और उसके ऊपर एक घी का दीपक जला लें।
- फिर कलश को पीले रंग का वस्त्र पहनाएं और फिर विधि-विधान से पूजा करें।
- जब अगले दिन व्रत का पारण करें तो ब्राह्मणों को विधिवत भोजन कराने के बाद दक्षिणा देने के साथ कलश भी दान में दे दें।
आमलकी एकादशी के दिन स्नान का महत्व (Amlaki Ekadashi Par Snan Ka Mahatva)
आमलकीएकादशी के दिन पवित्र नदी में स्नान करने का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए और स्नान वाले जल में सात बूंद गंगाजल की डालनी चाहिए। साथ में एक चुटकी तिल और एक आंवला भी जरूर डालें। इसके बाद स्नान करना चाहिए। माना जाता है कि इस दिन इस तरह स्नान करने से तीर्थ स्नान के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है।
