पहाड़ों की यात्रा खासकर ट्रैकिंग मौजूदा समय में पर्यटकों के बीच खासा पॉपुलर है। हिमालय की धुंध भरी ऊंचाइयों में शरीर कंपा देने वाली ठंड के बीच खाली पेट ट्रैकिंग करते हुए सामने एक छोटी मैगी की दुकान दिख जाना किसी सपने के सच होने जैसा लगता है।
सवाल सिर्फ मैगी का नहीं बल्कि ये है कि कैसे 1880 के दशक के एक स्विस आविष्कार ने समुद्र तल से 7000 हजार फीट ऊंचाई पर अपनी असली पहचान पाई। पहाड़ों पर यात्रा के दौरान मैगी सिर्फ एक स्नैक नहीं बल्कि ट्रैकर्स के लिए ईंधन है।
पहाड़ों की यात्रा के दौरान अक्सर मौसम ठंडा होता है और इस ठंडक में फटाफट से 2 मिनट में ही जब कोई गर्मागरम चीज खाने को मिलती है, तो उसका स्वाद अपने आप और भी बढ़ जाता है। पहाड़ों पर हल्का और गर्म खाना शरीर और मन दोनों को सुकून देता है।
मैगी हल्की, कम जगह घेरने वाली और हाई कैलोरी वाली डिश होती है। कई बार लोग ऊंचाई पर टेंट में भी खुद मैगी बनाते हैं जो उन्हें आत्मनिर्भर और रोमांचकारी अनुभव प्रदान करता है।
पहाड़ों में जाकर किसी खूबसूरत व्यू के सामने बैठकर गर्मागरम मैगी खाने का पल ट्रैवलर्स के जहन में हमेशा के लिए बस जाता है। अगली बार जब वो घर जाकर दोबारा मैगी खाते हैं तो उन्हें वो ठंडी हवा, वो वादी, वो दोस्तों के साथ बिताया वक्त याद आता है।
ऐसे में अगली बार यात्रा के दौरान जब आप पहाड़ों में हों और धुंध भरी सड़क के किनारे मैगी का मजा ले रहे हों तो यह जान लें कि आप सिर्फ अपना पेट नहीं भर रहे हैं बल्कि एक ऐसी कहानी का हिस्सा हैं जो महाद्वीपों तक फैली हुई है और आपको पहाड़ों पर घर जैसा फील कराती है।