रिलेशनशिप की दुनिया में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां मिलेनियल्स लंबे समय तक ऐसे रिश्तों में टिके रहते हैं जो उन्हें खुश नहीं रखते, वहीं Gen Z भावनात्मक असुरक्षा महसूस होते ही रिश्ता खत्म करने का फैसला लेने से नहीं हिचकता। आखिर ये फर्क क्यों है?
1981 से 1996 के बीच जन्मे मिलेनियल्स ऐसे दौर में बड़े हुए, जहां रिश्तों को हर हाल में बचाने की सीख दी जाती थी। उनके लिए समझौता, धैर्य और रिश्ते को निभाना अच्छी बात मानी जाती थी।
कई लोग अकेले रहने के डर, सामाजिक दबाव या "इतना समय दे दिया है" जैसी सोच के कारण भी खराब रिश्ते में बने रहते हैं।
1997 के बाद जन्मी Gen Z मानसिक स्वास्थ्य को रिश्ते से अलग नहीं मानती। यह पीढ़ी थेरेपी, भावनात्मक सीमाओं और आत्मसम्मान पर खुलकर बात करती है। अगर आज की पीढ़ी को लगे कि रिश्ता लगातार तनाव, गैसलाइटिंग या भावनात्मक नुकसान पहुंचा रहा है, तो वे उसे खत्म करना बेहतर समझते हैं।
सोशल मीडिया ने भी इस सोच को बदला है। आज रिश्तों पर मनोवैज्ञानिकों और कंटेंट क्रिएटर्स की सलाह आसानी से उपलब्ध है। इससे युवा लोग रेड फ्लैग्स पहचानने और अपने लिए स्वस्थ सीमाएं तय करने के प्रति ज्यादा जागरूक हुए हैं।
रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स मानते हैं कि कभी-कभी यही जागरूकता जल्दबाजी में रिश्ता छोड़ने की वजह भी बन सकती है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि दोनों पीढ़ियों के नजरिए में संतुलन जरूरी है। हर मतभेद ब्रेकअप की वजह नहीं होता, लेकिन लगातार अपमान, डर या भावनात्मक शोषण वाले रिश्ते में बने रहना भी सही नहीं है।