दुनिया के सबसे ग्लेशियर के रूप में 'क्रेटर' ग्लेशियर को जाना जाता है। इसका निर्माण अमेरिका के माउंट सेंट हेलेंस में ज्वालामुखी के भीषण विस्फोट (1980) के बाद हुआ था।
आमतौर पर ग्लेशियर पहाड़ों की ऊंची चोटी पर होते हैं, लेकिन यह ग्लेशियर ज्वालामुखी के फटने से बने क्रेटर के भीतर स्थित है, यही कारण है कि इसका नाम क्रेटर ग्लेशियर रखा गया है।
बता दें कि जलवायु परिवर्तन के कारण जहां दुनिया के सभी ग्लेशियर पिघल रहे हैं, वहीं क्रेटर ग्लेशियर एक ऐसा ग्लेशियर है जो लगातार बढ़ रहा है। इसके विपरीत स्वभाव पर वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं।
बता दें कि चारों तरफ ज्वालामुखी की ऊंची ऊंची दीवारें इस ग्लेशियर को सूरज की सीधी रोशनी से बचाती हैं। इतना ही नहीं, ज्वालामुखी की राख और पत्थरों की मोटी परत एक इंसुलेटर (कवच) का काम करती है, जो नीचे की बर्फ को पिघलने से रोकती है।
जानकारी के अनुसार, इस क्षेत्र में सर्दियों के दौरान अधिक बर्फबारी होती है। इस क्रेटर की बनावट इस प्रकार की है कि सर्दियों में गिरने वाली पूरी बर्फ अंदर जमा हो जाती है और ज्वालामुखी की गर्मी के बावजूद यह साल भर टिकी रहती है।
ग्लेशियर की मोटाई वर्तमान समय में कई जगहों पर 200 मीटर से अधिक हो चुकी है। ग्लेशियर धीरे धीरे ज्वालामुखी के भीतर लावा डोम को चारों तरफ से घेर रहा है।
इस ग्लेशियर के बढ़ते साइज पर वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। इतना नहीं ग्लेशियर वैज्ञानिकों को यह समझने में भी मदद कर रहा है विपरीत परिस्थितियों और गर्मी के बीच भी यह ग्लेशियर कैसे जीवित है और विकसित हो रहा है।