Zihaal-e-Miskeen : अमीर ख़ुसरो उन प्रतिभाशाली हस्तियों में से एक थे जो सदीयों बाद कभी जन्म लेती हैं। तुर्की मूल के होने के बावजूद उनकी आत्मा हिंदुस्तानी थी। उनका व्यक्तित्व अपने आप में बहुआयामी था। वो एक समय में एक साथ शायर, चिंतक, सिपाही, सूफ़ी, अमीर और दरवेश थे। अमीर ख़ुसरो उन लोगों में से थे जिनको क़ुदरत सिर्फ़ मुहब्बत के लिए पैदा करती है। उनको हर शख़्स और हर चीज़ से मुहब्बत थी। हिन्दी और फ़ारसी के मिश्रण से कही गई उनकी ग़ज़लें अजीब रंग पेश करती हैं। शायद ही कोई हो जिसने उनकी ग़ज़ल "ज़ेहाल-ए-मिस्कीं न सुनी हो और इसके पुरसोज़ मगर परम आनंद के लुत्फ़ से वंचित रह गया हो। यह एक ऐसी रोमांटिक ग़ज़ल है जो शास्त्रीय फ़ारसी (फ़ारसी) और हिंदी की एक पुरानी बोली के बीच बारी-बारी से काम करती है। खुसरो की यह रचना सूफी दर्शन से गहरे प्रभावित है, जिसमें प्रेम को ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग माना गया है। पढ़ें पूरी गजल:
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैना बनाए बतियां
कि ताब-ए-हिज्रां नदारम ऐ जां न लेहू काहे लगाए छतियां
शबान-ए-हिज्रां दराज़ चूं ज़ुल्फ़ ओ रोज़-ए-वसलत चूं उम्र-ए-कोताह
सखी पिया को जो मैं न देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां
यकायक अज़ दिल दो चश्म जादू ब-सद-फ़रेबम ब-बुर्द तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनावे पियारे पी को हमारी बतियां
चूं शम-ए-सोज़ां चूं ज़र्रा हैरां ज़ मेहर-ए-आं-मह बगश्तम आख़िर
न नींद नैनां न अंग चैनां न आप आवे न भेजे पतियां
ब-हक्क-ए-रोज़-ए-विसाल-ए-दिलबर कि दाद मारा ग़रीब 'ख़ुसरव'
सपीत मन के वराय रखूँ जो जा के पाऊं पिया की खतियां
इस कविता में खुसरो एक प्रेमी की व्यथा को बयान करते हैं, जो अपने प्रिय (जो यहां ईश्वर का प्रतीक है) से मिलने की तड़प में है। जेहाल ए मिस्किन का अर्थ है मेरी दयनीय हालत। इस रचना में प्रेमी अपनी हालत को दयनीय बताता है, क्योंकि वह प्रेम की तड़प में जल रहा है। वह कहता है कि मुझ ग़रीब मिस्कीन की हालत से यूं बेख़बर मत बनो। आंखें मिलाते हो, आंखें चुराते हो और बातें बनाते हो। मेरी जान!
जुदाई की ताब सहने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है। मुझे अपने सीने से क्यों नहीं लगा लेते! जुदाई की रातें ज़ुल्फ़ की तरह लंबी हैं और मिलन के दिन ज़िंदगी की तरह छोटे हैं। हे पसखी, मैं यदि अपने पिया को न देखूं तो डरावनी व अंधेरी रातें कैसे कटे! जादू भरी इन दोनों आंखों ने अचानक सैकड़ों बहानों से मेरा धैर्य छीन लिया है। किसके पास वक़्त है या किसे पड़ी है जो मेरे जी की बात सुने अर्थात मेरा दुःख सुने।
मैं शमां की तरह जल रहा हूं और ज़र्रे की तरह हैरान हूं, आख़िरकार मैं उस बुत (कठोर दिल) की मोहब्बत में गिरफ़्तार हो गया हूं। मेरी आंखों में ना नींद है और ना दिल को चैन है। और मेरा प्रिय इतना निष्ठुर है कि ना तो आप आता है और ना ही चिट्ठियां ही भेजता है। मिलन वाले दिनों की क़सम, मेरे महबूब ने मेरे साथ फ़रेब किया है। मैं अपनी प्रीत को अपने दिल में दबाकर रखती अगर मैं जानती कि मेरे महबूब से मुझे फ़रेब मिलेगा।
