जब हम किसी भव्य मंदिर में जाते हैं और भगवान की मनमोहक मूरत के आगे शीश झुकाते हैं, तो हमारा ध्यान उस दिव्य छवि पर ही टिका रह जाता है। हम शायद ही कभी उस कलाकार और उन हाथों के बारे में सोचते हैं, जिन्होंने एक साधारण से पत्थर को तराशकर उसमें प्राण फूंक दिए। एस. सीतालक्ष्मी और राहुल नंदन द्वारा लिखी गई किताब द गोल्डन चिजल: द स्टोरी बिहाइंड द मेकिंग ऑफ रामलला (The Golden Chisel: The Story Behind The Making Of Ramlala) हमें इसी अनछुए पहलू से रूबरू कराती है।
यह किताब अयोध्या के भव्य राम मंदिर में विराजमान 5 साल के बालक राम यानी रामलला की उस दिव्य मूर्ति के निर्माण की कहानी है, जिसे मैसूर के मशहूर मूर्तिकार अरुण योगीराज ने गढ़ा है।
मूर्ति बनने के 9 महीनों का कड़ा सफर
किताब की सबसे खास बात यह है कि यह किसी इतिहास की किताब की तरह नीरस नहीं है, बल्कि एक कहानी की तरह बहती है। लेखकों ने अरुण योगीराज के साथ महीनों तक लंबी बातचीत की और उन 9 महीनों के संघर्ष को पन्नों पर उतारा है।
इस दौरान मूर्तिकार ने किन कठिन परिस्थितियों का सामना किया, उनके मन में उठने वाले संदेह, उनका कड़ा अनुशासन और सबसे बढ़कर उनकी अटूट आस्था। इन सबको बहुत ही आसान और दिल को छू लेने वाली भाषा में लिखा गया है।
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कला, साधना और दैवीय एहसास का संगम
आप जब यह किताब पढ़ेंगे तो शायद आपको एहसास होगा कि रामलला की मूर्ति बनाना केवल छेनी और हथौड़ी से पत्थर काटने का काम नहीं था। यह एक तरह की तपस्या थी। योगीराज जब मूर्ति तराश रहे थे, तो कई बार ऐसे मोड़ आए जहाँ उन्हें लगा कि कोई अदृश्य शक्ति उनके हाथों का मार्गदर्शन कर रही है। किताब में बताया गया है कि कैसे एक कलाकार अपने अस्तित्व को भुलाकर पूरी तरह से ईश्वर की भक्ति में डूब जाता है, तब जाकर ऐसी अलौकिक छवि का निर्माण होता है।

द गोल्डेन चीज़ल: द स्टोरी बिहाइं द मेकिंग ऑफ रामलला
पत्रकारिता और स्टोरीटेलिंग की बारीकी
राहुल नंदन और एस. सीतालक्ष्मी दोनों ही अनुभवी पत्रकार रहे हैं, इसलिए उनकी लेखनी में तथ्यों की स्पष्टता के साथ-साथ एक बेहतरीन प्रवाह है। उन्होंने भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करने के बजाय आम बोलचाल की भाषा चुनी है, जिससे एक आम पाठक भी इस भावुक और आध्यात्मिक यात्रा से सीधे जुड़ जाता है।
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यह किताब क्यों पढ़ी जानी चाहिए?
'द गोल्डन चिज़ल' सिर्फ राम मंदिर या आस्था तक सीमित नहीं है। यह किताब भारत की प्राचीन मूर्तिकला की समृद्ध परंपरा, एक कलाकार की साधना और निष्ठा का सुंदर दस्तावेज है।
तो अगर आप कला में रुचि रखते हैं, आस्था के गहरे ताने-बाने को समझना चाहते हैं या यह जानना चाहते हैं कि हमारे दौर की सबसे ऐतिहासिक मूर्ति कैसे बनी, तो यह किताब आपको निराश नहीं करेगी। यह एक सरल, प्रेरणादायक और दिल को छू लेने वाली पठनीय रचना है।
