Shayari of The Day (आज की शायरी): मजरूह सुल्तानपुरी उर्दू शायरी और हिंदी शायरी ऐसे रचनाकार थे, जिन्होंने अदब और आम आदमी की भावनाओं के बीच की दूरी मिटा दी। 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में जन्मे मजरूह का असली नाम असरारुल हसन ख़ान था। उन्होंने परंपरागत उर्दू शायरी को आधुनिक संवेदना से जोड़ा और प्रेम, विद्रोह, उम्मीद और इंसानी संघर्ष को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उनकी कलम से निकले तमाम शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। ऐसा ही एक शेर है:
शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई
कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया
यह शेर इंतजार, बेचैनी और टूटते-जुड़ते उम्मीदों की बेहद गहरी तस्वीर पेश करता है। यहां मजरूह रात को केवल समय का एक टुकड़ा नहीं मानते, बल्कि उसे मानसिक अवस्था बना देते हैं। आइए समझते हैं इस शेर के क्या मायने हैं।
शेर के पहले मिसरे में कश्मकश शब्द बहुत अहम है। यह उस मानसिक खींचतान को दर्शाता है, जिसमें इंसान उम्मीद और निराशा के बीच झूलता रहता है। शायर कहता है कि उस रात का हाल मत पूछिए, क्योंकि वह इतनी भारी थी कि सुबह कब हो गई, इसका एहसास ही नहीं हुआ। समय मानो ठहर गया था और सुबह सुकून की जगह थकान की तरह आई।
अपनी बात को मजरूह शेर के दूसरे मिसरे में आगे बढ़ाते हैं। यहां चराग उम्मीद का प्रतीक है। इंतजार के दौरान कभी दिल में आशा जगती है कि शायद वह आएगा, शायद हालात बदलेंगे, तो चराग जल उठता है। लेकिन अगले ही पल कोई खयाल, कोई याद या कोई डर उस उम्मीद को बुझा देता है। इस तरह पूरी रात उम्मीद और मायूसी का खेल चलता रहता है।
मजरूह सुल्तानपुरी का ह शेर प्रेम-वियोग के साथ ही जीवन के हर उस इंतजार पर लागू होता है, जहां इंसान किसी फैसले, किसी जवाब या किसी बदलाव की राह देख रहा होता है। नौकरी का इंतजार, किसी अपने की वापसी हो या फिर बीमारी से उबरने की उम्मीद, हर जगह यही चराग जलते-बुझते हैं।
यह शेर हमें ह भी सिखाता है कि इंतजार सिर्फ समय का नहीं होता, वह मन की सबसे कठिन परीक्षा होता है। उस परीक्षा में इंसान बार-बार उम्मीद जगाता है और बार-बार खुद ही उसे तोड़ता है। यही वजह है कि ऐसी रातों के बाद आने वाली सुबह भी आसान नहीं होती। कुल मिलाकर, यह शेर इंसानी मन की उस नाज़ुक हालत को बयान करता है, जहां हर जलता चराग उम्मीद है और हर बुझता चराग एक टूटा हुआ सपना।
