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Mahatma Gandhi Death Anniversary: शहीद दिवस पर पढ़ें महात्मा गांधी पर कविता, बापू की शहादत को सलाम करती हैं ये नज्में

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  • Updated Jan 30, 2026, 05:11 AM IST

Mahatma Gandhi Par Kavita: ये महात्मा गांधी की शख्सियत का ही कमाल है कि दुनिया के हर बड़े साहित्यकार या कलमकार ने अपनी लेखनी से बापू के बलिदान को सराहा है। आज गांधी जी की पुण्य तिथि है। शहीद दिवस के इस मौके पर गांधी जी को श्रद्धांजलि देते हुए कुछ कविताएं आपके लिए लेकर आए हैं। आइए यहां देखें महात्मा गांधी पर लिखी चंद खूबसूरत कविताएं:

Poems on Gandhi ji

महात्मा गांधी पर कविताएं

Poems on Mahatma Gandhi in Hindi: आज शहीद दिवस है। 30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी। बापू के बलिदान दिवस को देश शहीद दिवस के तौर पर मनाता है। महात्मा गांधी ने पूरी दुनिया को इंसानियत का पाठ पढ़ाया। उन्होंने सत्य और अहिंसा को हथियार बना मानवता के लिए हर बुरी चीज से लड़ाई लड़ी। उनका पूरा जीवन मानवता के लिए मिसाल है। बापू पर बहुत कुछ लिखा और कहा गया है। आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर आइए पढ़ें गांधी जी पर लिखी कुछ बेहतरीन कविताएं:

1. सुना रहा हूं तुम्हें दास्तान गांधी की

ज़माने-भर से निराली है शान गांधी की

रहे रहे न रहे इस में जान गांधी की

न रुक सकी न रुकेगी ज़बान गांधी की

यही सबब है जो वो दिल से सब को प्यारा है

वतन का अपने चमकता हुआ सितारा है

बना था मस्त कोई और कोई सौदाई

हर एक सम्त थी ग़फ़्लत की जब घटा छाई

तो उस की अक़्ल-ए-रसा काम वक़्त पर आई

मरीज़-ए-मुल्क है मम्नून-ए-चारा-फ़रमाई

नए ख़याल में इक इक का दिल असीर हुआ

उधर अमीर हुआ और उधर फ़क़ीर हुआ

जफ़ा-ओ-जौर ने की ख़ूब अपनी बर्बादी

ख़राब-हाल न दिल रात क्यूँ हूँ फ़रियादी

बना दिया था क़फ़स का बुरी तरह आदी

मगर है शुक्र मिला हम को दर्स-ए-आज़ादी

ज़माना कहता है गांधी महात्मा वो है

बशर नहीं है हक़ीक़त में देवता वो है

जो दिल में याद है तो लब पे नाम उस का है

जो है तो ज़िक्र फ़क़त सुब्ह-ओ-शाम उस का है

भलाई सब की हो जिस से वो काम उस का है

जहाँ भी जाओ वहीं एहतिराम उस का है

उठाए सर कोई क्या सर उठा नहीं सकता

मुक़ाबले के लिए आगे आ नहीं सकता

किसी से उस को मोहब्बत किसी से उल्फ़त है

किसी को उस की है उस को किसी की हसरत है

वफ़ा-ओ-लुत्फ़ तरह्हुम की ख़ास आदत है

ग़रज़ करम है मुदारात है इनायत है

किसी को देख ही सकता नहीं है मुश्किल में

ये बात क्यूँ है कि रखता है दर्द वो दिल में

वो रश्क-ए-शम-ए-हिदायात है अंजुमन के लिए

वो मिस्ल-ए-रूह-ए-रवाँ उंसुर-ए-बदन के लिए

वो एक साग़र-ए-नौ महफ़िल-ए-कुहन के लिए

वो ख़ास मसलह-ए-कुल शैख़-ओ-बरहमन के लिए

लगन उसे है कि सब मालिक-ए-वतन हो जाएँ

क़फ़स से छूट के ज़ीनत-दह-ए-चमन हो जाएँ

जफ़ा-शिआ'र से होता है बर-सर-ए-पैकार

न पास तोप न गोला न क़ब्ज़े में तलवार

ज़माना ताबा-ए-इरशाद हुक्म पर तय्यार

वो पाक शक्ल से पैदा हैं जोश के आसार

किसी ख़याल से चर्ख़े के बल पे लड़ता है

खड़ी है फ़ौज ये तन्हा मगर अकड़ता है

तरह तरह के सितम दिल पर अपने सहता है

हज़ार कोई कहे कुछ ख़मोश रहता है

कहाँ शरीक हैं आँखों से ख़ून बहता है

सुनो सुनो कि ये इक कहने वाला कहता है

जो आबरू तुम्हें रखनी हो जोश में आओ

रहो न बे-खु़द-ओ-बे-होश होश में आओ

उसी को घेरे अमीर-ओ-ग़रीब रहते हैं

नदीम-ओ-मूनिस-ओ-यार-ओ-हबीब रहते हैं

अदब के साथ अदब से अदीब रहते हैं

नसीब-वर हैं वो बड़े ख़ुश-नसीब रहते हैं

कोई बताए तो यूँ देख-भाल किस की है

जो उस से बात करे ये मजाल किस की है

रिफ़ाह-ए-आम से रग़बत है और मतलब है

अनोखी बात निराली रविश नया ढब है

यही ख़याल था पहले यही ख़याल अब है

फ़क़त है दीन यही बस यही तो मज़हब है

अगर बजा है तो 'बिस्मिल' की अर्ज़ भी सुन लो

चमन है सामने दो-चार फूल तुम चुन लो

- बिस्मिल इलाहाबादी

2. शब-ए-एशिया के अँधेरे में सर-ए-राह जिस की थी रौशनी

वो गौहर किसी ने छुपा लिया वो दिया किसी ने बुझा दिया

जो शहीद-ए-ज़ौक़-ए-हयात हो उसे क्यूँ कहो कि वो मर गया

उसे यूँ ही रहने दो हश्र तक ये जनाज़ा किस ने उठा दिया

तिरी ज़िंदगी भी चराग़ थी तेरी गर्म-ए-ग़म भी चराग़ है

कभी ये चराग़ जला दिया कभी वो चराग़ जला दिया

जिसे ज़ीस्त से कोई प्यार था उसे ज़हर से सरोकार था

वही ख़ाक-ओ-ख़ूँ में पड़ा मिला जिसे दर्द-ए-दिल ने मज़ा दिया

जिसे दुश्मनी पे ग़ुरूर था उसे दोस्ती से शिकस्त दी

जो धड़क रहे थे अलग अलग उन्हें दो दिलों को मिला दिया

जो न दाग़ चेहरा मिटा सके उन्हें तोड़ना ही था आइना

जो ख़ज़ाना लूट सके नहीं उसे रहज़नों ने लुटा दिया

वो हमेशा के लिए चुप हुए मगर इक जहाँ को ज़बान दो

वो हमेशा के लिए सो गए मगर इक जहाँ को जगा दिया

- नुशूर वाहिदी

3. 'गांधी' हो या 'ग़ालिब' हो

ख़त्म हुआ दोनों का जश्न

आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न

ख़त्म करो तहज़ीब की बात

बंद करो कल्चर का शोर

सत्य अहिंसा सब बकवास

हम भी क़ातिल तुम भी चोर

ख़त्म हुआ दोनों का जश्न

आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न

वो बस्ती वो गाँव ही क्या

जिस में हरीजन हो आज़ाद

वो क़स्बा वो शहर ही क्या

जो न बने अहमदाबाद

ख़त्म हुआ दोनों का जश्न

आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न

'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो

दोनों का क्या काम यहाँ

अब के बरस भी क़त्ल हुई

एक की शिकस्ता इक की ज़बाँ

ख़त्म हुआ दोनों का जश्न

आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न

- साहिर लुधियानवी

4. तिरे मातम में शामिल हैं ज़मीन ओ आसमां वाले

अहिंसा के पुजारी सोग में हैं दो जहाँ वाले

तिरा अरमान पूरा होगा ऐ अम्न-ओ-अमाँ वाले

तिरे झंडे के नीचे आएँगे सारे जहाँ वाले

मिरे बूढ़े बहादुर इस बुढ़ापे में जवाँ-मर्दी

निशाँ गोली के सीने पर हैं गोली के निशाँ वाले

निशाँ हैं गोलियों के या खिले हैं फूल सीने पर

उसी को मार डाला जिस ने सर ऊँचा किया सब का

न क्यूँ ग़ैरत से सर नीचा करें हिन्दोस्ताँ वाले

मिरे गाँधी ज़मीं वालों ने तेरी क़द्र जब कम की

उठा कर ले गए तुझ को ज़मीं से आसमाँ वाले

ज़मीं पर जिन का मातम है फ़लक पर धूम है उन की

ज़रा सी देर में देखो कहाँ पहुँचे कहाँ वाले

पहुँचता धूम से मंज़िल पे अपना कारवाँ अब तक

अगर दुश्मन न होते कारवाँ के कारवाँ वाले

सुनेगा ऐ 'नज़ीर' अब कौन मज़लूमों की फ़रियादें

फ़ुग़ाँ ले कर कहाँ जाएँगे अब आह-ओ-फ़ुग़ाँ वाले

- नजीर बनारसी

5. वही है शोर-ए-हाए-ओ-हू, वही हुजूम-ए-मर्द-ओ-ज़न

मगर वो हुस्न-ए-ज़िंदगी, मगर वो जन्नत-ए-वतन

वही ज़मीं, वहीं ज़माँ, वही मकीं, वही मकाँ

मगर सुरूर-ए-यक-दिली, मगर नशात-ए-अंजुमन

वही है शौक़-ए-नौ-ब-नौ, वही जमाल-ए-रंग-रंग

मगर वो इस्मत-ए-नज़र, तहारत-ए-लब-ओ-दहन

तरक़्क़ियों पे गरचे हैं, तमद्दुन-ओ-मुआशरत

मगर वो हुस्न-ए-सादगी, वो सादगी का बाँकपन

शराब-ए-नौ की मस्तियाँ, कि अल-हफ़ीज़-ओ-अल-अमाँ

मगर वो इक लतीफ़ सा सुरूर-ए-बादा-ए-कुहन

ये नग़्मा-ए-हयात है कि है अजल तराना-संज

ये दौर-ए-काएनात है कि रक़्स में है अहरमन

हज़ार-दर-हज़ार हैं अगरचे रहबरान-ए-मुल्क

मगर वो पीर-ए-नौजवाँ, वो एक मर्द-ए-सफ़-शिकन

वही महात्मा वही शहीद-ए-अम्न-ओ-आश्ती

प्रेम जिस की ज़िंदगी, ख़ुलूस जिस का पैरहन

वही सितारे हैं, मगर कहाँ वो माहताब-ए-हिन्द

वही है अंजुमन, मगर कहाँ वो सद्र-ए-अंजुमन

- जिगर मुरादाबादी

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