Puri Jagannath Rath Yatra 2025: सागर की लहरों से गूंजता शहर पुरी हर साल 9 दिनों तक आस्था का वो महासंगम बन जाता है, जब जगन्नाथ जी की रथयात्रा निकलती है। वह खास पल आ गया है। आज से रथयात्रा शुरू है। हिंदू धर्म को मानने वालों के लिए यह सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था की चलती हुई ऐसी तस्वीर है जिसमें श्रद्धालु न सिर्फ भगवान को देखने आते हैं, बल्कि उन्हें अपने हाथों से खींचकर रास्ता दिखाते हैं।

पुरी रथयात्रा
कैसे निकलती है प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा
लाखों की संख्या में भक्तों की भीड़, हवा में उड़ता चंदन और फूल और विशाल रथों की गर्जना देख ऐसा लगता है मानो खुद धरती पर देवता उतर आए हों। तीन रथ- नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन , भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ को ले जाते हैं, उनके मौसी के घर गुंडिचा मंदिर की ओर। इस दिन न मंदिर की दीवारों के भीतर और न पवित्र गर्भगृह के अंधेरे में, बल्कि खुले आकाश के नीचे भगवान सजे-संवरे रथ पर सवार होते हैं। भक्तों के बीच, धूल और श्रद्धा के संग। हर रस्सी खींचने वाला मानता है कि वह खुद ईश्वर को अपनी आत्मा की राह पर ले जा रहा है।

जगन्नाथ रथयात्रा
छेरा पहरा: जगन्नाथ रथयात्रा का अनूठा रिवाज
पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से जुड़े कई अनूठे रीति-रिवाज सदियों से चले आ रहे हैं। ऐसा ही एक रिवाज है सोने के झाड़ू से सफाई करना। इस रिवाज को छेरा पहरा कहा जाता है। इस रस्म में होता ये है कि पुरी के गजपति महाराज साधारण धोती पहनकर, सोने की झाड़ू हाथ में लिए, भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों के पास पहुंचते हैं। वे पहले रथ के चारों ओर जल और चंदन छिड़कते हैं, फिर झुक कर झाड़ू लगाते हैं।

छेरा पहरा
क्यों करते हैं सोने के झाड़ू से सफाई
पुरी की रथयात्रा में जब गजपति महाराज सोने की झाड़ू से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों के आगे सफाई करते हैं, तो वह सिर्फ एक रस्म नहीं होती, बल्कि यह गहरी आध्यात्मिक भावना और सामाजिक संदेश से जुड़ी परंपरा होती है।
दरअसल धार्मिक कर्मकांड में सोने को बेहद पवित्र माना गया है। रथयात्रा में भगवान के यात्रा मार्ग को सोने के झाड़ू से बहारना आध्यात्मिक पवित्रता का प्रतीक है। माना जाता है कि सोने के झाड़ू से सफाई सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करती है। इसका मुख्य उद्देश्य भगवान के रथमार्ग को शुद्ध और पवित्र करना है।

पुरी के गजपति माहाराजा
रथयात्रा में कौन करता है सोने के झाड़ू से सफाई
हमेशा से पुरी के वंशज राजा ही भगवान के रथयात्रा में सोने के झाड़ू से सफाई करते आ रहे हैं। उन्हें गजपति महाराज की पदवी मिली हुई है। पुरी की पवित्र परंपराओं में गजपति महाराज का स्थान केवल एक राजा का नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण की मूर्त प्रतिमा का है। वर्तमान में यह गौरवशाली भूमिका निभा रहे हैं गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव।
कौन हैं गजपति महाराज
गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव मौजूदा समय में पुरी के राजा हैं। राज गद्दी पर बैठने वाला शख्स ही पुरी के जगन्नाथ मंदिर समिति का अध्यक्ष होता है। परंपरा यही चली आ रही है। इस कारण महाराजा दिव्यसिंह देव ही मंदिर समीति के अध्यक्ष हैं। गजपति महाराजा को ही भगवान जगन्नाथ का प्रथम सेवक माना जाता है। इसी नाते वही भगवान के रथमार्ग की सोने के झाड़ू से सफाई करते हैं।

गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव
राजा दिव्यसिंह देव भोई राजवंश से आते हैं। राजा दिव्यसिंह देव को गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव चतुर्थ के नाम से भी जाना जाता है। वह इस राजवंश के वर्तमान मुखिया हैं। भोई वंश गजपति राजवंश कहलाता है, जिसकी जड़ें 15वीं शताब्दी के उड़ीसा के शासक गजपति पुरुषोत्तम देव से जुड़ी हैं। इस वंश को विशेष मान्यता मिली क्योंकि इन्हें भगवान जगन्नाथ का सीधा प्रतिनिधि माना गया। मंदिरों, तीर्थों और धार्मिक रीति-नीतियों में इनकी भूमिका न केवल सम्मानजनक है, बल्कि अत्यंत आवश्यक भी मानी जाती है। गजपति महाराज की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है पुरी श्री जगन्नाथ मंदिर की परंपराओं की रक्षा करना।

फोटो सोर्स- Sri_Mandi/insta
क्या संदेश देता है रथयात्रा में राजा का झाड़ू लगाना
पुरी की रथयात्रा में जब गजपति महाराज सोने की झाड़ू से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों के आगे सफाई करते हैं, तो वह सिर्फ एक रस्म नहीं होती, बल्कि यह गहरी आध्यात्मिक भावना और सामाजिक संदेश से जुड़ी परंपरा होती है। इसके पीछे के मुख्य कारण:
1. सेवा का प्रतीक: स्वयं राजा द्वारा रथमार्ग की सफाई करना दिखाता है कि ईश्वर के सामने सबसे बड़ा व्यक्ति भी सिर्फ एक सेवक है। यह एक प्रकार का आत्मसमर्पण है।
2. विनम्रता का संदेश: सोने जैसी कीमती वस्तु से सफाई करना बताता है कि जब आप भक्ति और सेवा का भाव रखते हैं तो धन और पद की कोई अहमियत नहीं होती।

सोने के मूठ वाली झाड़ू से सफाई
3. रथयात्रा की पवित्रता बनाए रखना: भगवान के रथ को खींचने से पहले झाड़ू लगाना प्रतीक है बाहरी और भीतरी अशुद्धियों को साफ करने का।
4. लोक-कल्याण का भाव: गजपति महाराज को भगवान जगन्नाथ का प्रथम सेवक माना जाता है। यह रस्म राजा के लोकसेवक होने की परंपरा को जीवित रखता है।
बता दें कि पुरी की रथयात्रा केवल एक परंपरा नहीं है। यह एक ऐसा जीवित उत्सव है जहां धर्म, सेवा, श्रद्धा और समुदाय का मनोरम संगम होता है। यह यात्रा सिर्फ ईश्वर के रथों की नहीं बल्कि दिलों के उजाले की भी है और इसमें शामिल हर भक्त, भगवान का रथ बन जाता है।
