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सौरव दास और आशुतोष रांका को 5 दिन की न्यायिक हिरासत क्यों? पहले रिहा हुए, इस बार जेल क्यों भेजे गए; जानिए पूरी टाइमलाइन

दिल्ली पुलिस के अनुसार, जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद वहां प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी। पुलिस का आरोप है कि 13 अक्टूबर की सुबह सौरव दास, आशुतोष रांका और CJP के अन्य सदस्य जेडीयू कार्यालय परिसर की ओर से एक बंद गेट पार करके जंतर-मंतर पहुंचे।

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क्यों जेल भेजे गए रांका और सौरव?

Photo : PTI

कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया है। दोनों को 13 अक्टूबर को पुलिस ने हिरासत में लिया था और 14 अक्टूबर को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। मजिस्ट्रेट महेश कुमार मीणा ने दोनों को 19 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। इस बार की कार्रवाई इसलिए अहम है क्योंकि दोनों को इससे पहले भी दिल्ली पुलिस ने निवारक कार्रवाई के तहत हिरासत में लिया था, लेकिन तब वे 50-50 हजार रुपये के निजी और जमानती मुचलके भरने के बाद रिहा हो गए थे।

सौरव दास और आशुतोष रांका को जेल क्यों भेजा गया?

इस सवाल का जवाब मजिस्ट्रेट के आदेश में दर्ज पुलिस के आरोपों और पहले की कार्यवाही में मिलता है। पुलिस का कहना है कि दोनों नेताओं ने पहले शांति बनाए रखने और अच्छे व्यवहार के लिए एक साल की अवधि के मुचलके भरे थे। रिहाई के बाद भी उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए लोगों को जुटाने की अपील जारी रखी। पुलिस के मुताबिक, 13 अक्टूबर को दोनों ने प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश किया और वहां प्रदर्शन किया।

मजिस्ट्रेट के आदेश में कहा गया कि दोनों के पिछले और मौजूदा आचरण से शांति भंग होने की आशंका दिखाई देती है। आदेश के मुताबिक, पुलिस ने सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो समेत सामग्री पेश की। मजिस्ट्रेट ने इस आधार पर माना कि आगे की कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार हैं।

क्या है पूरा मामला, कब क्या हुआ?

10 अक्टूबर: दिल्ली पहुंचे, पहली बार हिरासत में लिए गए

CJP के नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया था। पुलिस के मुताबिक, सौरव दास, आशुतोष रांका और CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके दिल्ली पहुंचे तो उन्हें आईजीआई एयरपोर्ट पर रोका गया। पुलिस ने शांति भंग होने की आशंका के आधार पर BNSS की धारा 126/170 के तहत निवारक कार्रवाई शुरू की। इसके बाद तीनों ने 50-50 हजार रुपये के निजी और जमानती मुचलके भरे। उन्हें एक साल तक शांति बनाए रखने और अच्छे व्यवहार की शर्त पर रिहा किया गया।

11 अक्टूबर: मुचलका भरने के बाद रिहाई

स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के समक्ष हुई कार्यवाही में तीनों को शांति बनाए रखने के लिए मुचलके भरने पड़े। आदेश में एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त दर्ज थी। इसके बाद वे रिहा हो गए। यहीं से मौजूदा मामले का अहम कानूनी पहलू सामने आता है। पुलिस ने बाद की कार्यवाही में आरोप लगाया कि रिहाई के तुरंत बाद भी दोनों नेताओं ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए सोशल मीडिया पर अपील करना जारी रखा।

13 अक्टूबर: जंतर-मंतर में प्रवेश, दो FIR दर्ज

दिल्ली पुलिस के अनुसार, जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद वहां प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी। पुलिस का आरोप है कि 13 अक्टूबर की सुबह सौरव दास, आशुतोष रांका और CJP के अन्य सदस्य जेडीयू कार्यालय परिसर की ओर से एक बंद गेट पार करके जंतर-मंतर पहुंचे। वहां उन्होंने तिरंगा लहराया और नारे लगाए। पुलिस ने आरोप लगाया कि उन्हें रोकने की कोशिश के दौरान पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डाली गई। इस घटना के बाद दो FIR दर्ज की गईं। पहली FIR कनॉट प्लेस थाने में और दूसरी संसद मार्ग थाने में दर्ज हुई। दोनों में अलग-अलग धाराओं के तहत कार्रवाई की गई। पुलिस ने इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रांका को गिरफ्तार कर लिया।

CJP के नेताओं का पक्ष इससे अलग है। पार्टी की ओर से कहा गया कि वे तिरंगा लहराने और देशभक्ति के नारे लगाने के लिए जंतर-मंतर पहुंचे थे। पार्टी ने कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। पुलिस का कहना है कि मामला केवल नारे लगाने का नहीं, बल्कि प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश, कथित रूप से पुलिस के काम में बाधा डालने और पहले भरे गए मुचलकों के बाद दोबारा कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका से जुड़ा है।

14 अक्टूबर: मजिस्ट्रेट के सामने पेशी, पांच दिन की न्यायिक हिरासत

दोनों नेताओं को 14 अक्टूबर को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट महेश कुमार मीणा के सामने पेश किया गया। आदेश में पुलिस ने कहा कि दोनों के पिछले आचरण और मौजूदा गतिविधियों से शांति भंग होने की आशंका है। पुलिस ने सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो को भी अपने पक्ष में आधार बनाया। मजिस्ट्रेट ने दोनों के खिलाफ BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस जारी करने का निर्देश दिया। आदेश में यह भी दर्ज है कि उस समय पर्याप्त जमानती पेश नहीं किए गए थे। सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया और मामले को आगे की जांच के लिए 19 अक्टूबर को सूचीबद्ध किया गया।

पहले रिहा हुए थे, इस बार जेल क्यों भेजे गए?

इसका मुख्य अंतर पुलिस की ओर से पेश किए गए नए घटनाक्रम और मजिस्ट्रेट के सामने रखी गई सामग्री में है। पहली बार पुलिस ने संभावित शांति भंग होने की आशंका के आधार पर निवारक कार्रवाई की थी। उस समय दोनों ने मुचलके भरकर शांति बनाए रखने का वचन दिया और रिहा हो गए। दूसरी बार पुलिस का आरोप था कि रिहाई के बाद दोनों ने उसी स्थान पर प्रदर्शन के लिए लोगों को जुटाने की अपील जारी रखी और 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर में प्रवेश भी किया। पुलिस ने इसे पहले दिए गए आश्वासन के उल्लंघन और भविष्य में दोबारा कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका से जोड़कर पेश किया। मजिस्ट्रेट ने भी आदेश में उनके पिछले और मौजूदा आचरण का उल्लेख किया।

हालांकि, CJP नेताओं के वकीलों ने मीडिया रिपोर्टों में कहा कि नई गिरफ्तारी जंतर-मंतर में कथित प्रवेश से जुड़े अलग मामले में हुई है और इसे पहले भरे गए मुचलकों के उल्लंघन से अलग करके देखा जाना चाहिए। इसलिए यह कहना कि उन्हें केवल पुराने मुचलके के उल्लंघन में जेल भेजा गया, मामले की पूरी तस्वीर नहीं होगी।

CJP नेताओं को जमानत क्यों नहीं मिली?

इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने वाले आदेश में मजिस्ट्रेट ने लिखा कि उस समय पर्याप्त जमानती पेश नहीं किए गए थे। साथ ही, सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत का उल्लेख किया गया। इसलिए उपलब्ध आदेश के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि किसी नियमित जमानत याचिका को सुनवाई के बाद खारिज कर दिया गया। आदेश में जो स्पष्ट रूप से दर्ज है, वह यह है कि पर्याप्त जमानती पेश नहीं किए जाने और सार्वजनिक शांति बनाए रखने के आधार पर दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। दूसरी ओर, पुलिस ने आशंका जताई कि यदि दोनों को फिर छोड़ दिया गया तो वे दोबारा कानून का उल्लंघन कर सकते हैं और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। यही बात पुलिस ने मजिस्ट्रेट के सामने रखी।

अजिंक्य शिंदे को क्यों छोड़ दिया गया?

इसी मामले में CJP के एक अन्य नेता अजिंक्य शिंदे को निजी मुचलके और 5,000 रुपये के जमानती मुचलके पर रिहा किया गया। उनके लिए छह महीने तक शांति बनाए रखने और अच्छे व्यवहार की शर्त लगाई गई। इससे स्पष्ट है कि एक ही घटना में तीनों नेताओं के संबंध में एक जैसा आदेश नहीं दिया गया। सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जबकि अजिंक्य शिंदे को शर्तों के साथ रिहाई मिली।

क्या Preventive Detention?

शुरुआती पुलिस कार्रवाई को BNSS की धारा 126/170 के तहत निवारक कार्रवाई कहा गया है। धारा 170 संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए गिरफ्तारी से संबंधित है। लेकिन 14 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट ने जो आदेश दिया, उसमें स्पष्ट रूप से दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने की बात है।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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