How Airports Are Selected in India: भारत में हवाई सफर करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकार भी 'उड़ान' (UDAN) योजना के तहत छोटे शहरों को हवाई कनेक्टिविटी से जोड़ रही है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके शहर में एयरपोर्ट क्यों नहीं है? या सरकार कैसे तय करती है कि किस शहर को नया एयरपोर्ट मिलेगा और किसे नहीं?
किसी भी शहर में नया एयरपोर्ट बनाना सिर्फ जमीन और पैसे का खेल नहीं है। इसके पीछे भारत सरकार और नागरिक उड्डयन मंत्रालय (Ministry of Civil Aviation) का एक बेहद जटिल और कड़ा गणित होता है। आइए समझते हैं कि भारत में नए एयरपोर्ट के लिए जगह का चुनाव किस आधार पर किया जाता है:
1. ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड एयरपोर्ट का अंतर
सरकार सबसे पहले यह देखती है कि प्रोजेक्ट किस तरह का है:
ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट (Greenfield Airport): यह पूरी तरह से एक नए सिरे से, खाली जमीन पर बनाया जाने वाला एयरपोर्ट होता है (जैसे जेवर या नवी मुंबई एयरपोर्ट)। इसके लिए कड़े पर्यावरण और तकनीकी क्लीयरेंस की जरूरत होती है।
ब्राउनफील्ड एयरपोर्ट (Brownfield Airport): इसमें पहले से मौजूद किसी हवाई पट्टी, सेना के एयरबेस या बंद पड़े रनवे को अपग्रेड करके उसे कमर्शियल उड़ानों के लायक बनाया जाता है।
2. सबसे अहम: 'कमर्शियल व्यवहार्यता' (Commercial Viability)
कोई भी एयरलाइन कंपनी घाटे में विमान नहीं उड़ाना चाहती। इसलिए सरकार सबसे पहले उस शहर की 'कमर्शियल वायबिलिटी' यानी आर्थिक लाभ की संभावनाओं को जांचती है। इसमें निम्नलिखित पहलुओं को देखा जाता है:
यात्रियों की संख्या (Passenger Traffic): क्या उस शहर और उसके आसपास इतनी आबादी है जो नियमित रूप से हवाई सफर का खर्च उठा सके?
आर्थिक और औद्योगिक महत्व: क्या वह शहर कोई बड़ा बिजनेस हब, औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Zone) या आईटी पार्क है, जहां देश-विदेश से कॉरपोरेट अधिकारियों का आना-जाना लगा रहता है?
पर्यटन (Tourism): अगर कोई शहर धार्मिक या ऐतिहासिक रूप से बेहद प्रसिद्ध है (जैसे अयोध्या या कुशीनगर), तो वहां यात्रियों की संख्या की गारंटी होती है, जिससे एयरपोर्ट मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
3. दो एयरपोर्ट के बीच की दूरी का नियम
अतीत में भारत सरकार का एक नियम था कि दो डोमेस्टिक (घरेलू) एयरपोर्ट्स के बीच कम से कम 150 किलोमीटर की दूरी होनी चाहिए। हालांकि, अब नियमों में थोड़ी ढील दी गई है। अगर किसी बड़े शहर (जैसे दिल्ली या मुंबई) के मौजूदा एयरपोर्ट पर ट्रैफिक क्षमता से ज्यादा हो जाता है, तो 150 किमी के दायरे के भीतर भी दूसरे अंतरराष्ट्रीय या घरेलू एयरपोर्ट (जैसे नोएडा का जेवर एयरपोर्ट) को मंजूरी दे दी जाती है।
4. तकनीकी और भौगोलिक सर्वे (Technical Feasibility)
जमीन फाइनल करने से पहले भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) और डीजीसीए (DGCA) की टीमें साइट का दौरा करती हैं और देखती हैं:
हवाई क्षेत्र (Airspace): क्या वहां का आसमान उड़ानों के लिए साफ और सुरक्षित है? क्या पास में कोई मिलिट्री एयरबेस या रिस्ट्रिक्टेड एरिया तो नहीं है?
मौसम का मिजाज: उस इलाके में सालभर मौसम कैसा रहता है? क्या वहां अत्यधिक कोहरा, तेज हवाएं या भारी बारिश जैसी भौगोलिक चुनौतियां तो नहीं हैं?
बाधाएं (Obstacles): प्रस्तावित रनवे के आसपास कोई ऊंचे पहाड़, गगनचुंबी इमारतें या हाई-टेंशन बिजली की लाइनें नहीं होनी चाहिए।
5. जमीन की उपलब्धता और कनेक्टिविटी
एक आधुनिक एयरपोर्ट बनाने के लिए हजारों एकड़ समतल जमीन की जरूरत होती है। यह जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है। राज्य सरकार को न सिर्फ जमीन का अधिग्रहण (Land Acquisition) करना होता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होता है कि वह जगह हाईवे, एक्सप्रेसवे या मेट्रो के जरिए मुख्य शहर से अच्छी तरह जुड़ी हो।
6. कैसे मिलती है अंतिम मंजूरी?
नया एयरपोर्ट बनाने की प्रक्रिया कई चरणों से गुजरती है:
सबसे पहले राज्य सरकार या निजी डेवलपर नागरिक उड्डयन मंत्रालय को एक 'सटीक परियोजना रिपोर्ट' (DPR) भेजते हैं। इसके बाद गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय और अंतरिक्ष विभाग से एनओसी (NOC) ली जाती है। सभी क्लीयरेंस मिलने के बाद नागरिक उड्डयन मंत्रालय की एक विशेष 'स्टीयरिंग कमेटी' इसे अंतिम मंजूरी (In-Principle Approval) देती है।
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