UGC के नए जाति भेदभाव नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, सभी जातियों के खिलाफ भेदभाव का मुद्दा उठाया
- Reported by: गौरव श्रीवास्तवEdited by: शिव शुक्ला
- Updated Jan 24, 2026, 11:07 PM IST
याचिका बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र मृतुंजय तिवारी की ओर से दायर की गई है और उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में नीरज सिंह पैरवी कर रहे हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि समानता और सामाजिक न्याय का उद्देश्य महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे लागू करने के लिए ऐसे नियम नहीं बनाए जा सकते जो संविधान द्वारा संरक्षित अधिकारों को सीमित करें या विश्वविद्यालयों के अकादमिक वातावरण को भय और असुरक्षा से भर दें।
सुप्रीम कोर्ट
उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा हाल ही में अधिसूचित किए गए प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन) रेगुलेशन 2026 को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। यूजीसी का कहना है कि इससे एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के खिलाफ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकने में मदद मिलेगी। इन नियमों का पालन न करने पर UGC मान्यता रद्द करने तक का प्रावधान है।
इन नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि यूजीसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे प्रावधान बनाए हैं जो संविधान के मूल ढांचे, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इन नियमों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है और इनके क्रियान्वयन पर रोक लगाने का आग्रह किया गया है।
याचिका बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र मृतुंजय तिवारी की ओर से दायर की गई है और उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में नीरज सिंह पैरवी कर रहे हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि समानता और सामाजिक न्याय का उद्देश्य महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे लागू करने के लिए ऐसे नियम नहीं बनाए जा सकते जो संविधान द्वारा संरक्षित अधिकारों को सीमित करें या विश्वविद्यालयों के अकादमिक वातावरण को भय और असुरक्षा से भर दें।
जातिगत भेदभाव सिर्फ आरक्षित वर्ग तक सीमित नहीं
याचिका में सबसे अहम तर्क यह उठाया गया है कि जातिगत भेदभाव केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसी भी जाति के व्यक्ति के खिलाफ हो सकता है, चाहे वह तथाकथित उच्च जाति से ही क्यों न हो। याचिकाकर्ता का कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है और कानून का उद्देश्य किसी विशेष वर्ग को विशेष संरक्षण देना नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को अपमान, उत्पीड़न और भेदभाव से बचाना होना चाहिए। यदि नियम केवल कुछ समुदायों के अनुभवों को मान्यता देंगे और अन्य समुदायों के खिलाफ होने वाले सामाजिक अपमान या उत्पीड़न को नजरअंदाज करेंगे, तो यह स्वयं समानता के सिद्धांत का उल्लंघन होगा।
याचिका में विस्तार से कहा गया है कि हाल के वर्षों में शैक्षणिक परिसरों, सोशल मीडिया मंचों और सार्वजनिक विमर्श में सामान्य वर्ग या तथाकथित ऊँची जाति से जुड़े छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ सामूहिक और अपमानजनक टिप्पणियाँ सामने आई हैं। उदाहरण के तौर पर, याचिका में उल्लेख है कि कई बार सार्वजनिक मंचों और चर्चाओं में यह कहा जाता है कि जनरल कैटेगरी के लोग जन्म से ही शोषक होते हैं, ऊँची जाति वालों का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, इनकी उपलब्धियां केवल विशेषाधिकार का परिणाम हैं, मेहनत का नहीं, या इनकी सामाजिक पहचान अपने आप में अपराध है। याचिका के अनुसार, इस तरह की टिप्पणियाँ भी किसी व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं और उसे उसकी पहचान के आधार पर कलंकित करती हैं, जो किसी भी दृष्टि से भेदभाव से कम नहीं है।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि ऐसे बयान केवल वैचारिक आलोचना नहीं रह जाते, बल्कि वे कई बार छात्रों को सामाजिक रूप से अलग थलग करने, कक्षा के माहौल को विषाक्त बनाने और अकादमिक संवाद को भय और संकोच से भरने का कारण बनते हैं। याचिका में उदाहरण दिया गया है कि कुछ संस्थानों में सामान्य वर्ग के छात्रों को खुले तौर पर यह कहा गया कि वे ऐतिहासिक अपराधों के उत्तराधिकारी हैं और इसलिए उन्हें शिकायत करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। इसी तरह, कुछ शिक्षकों को उनकी जातिगत पृष्ठभूमि के आधार पर सार्वजनिक रूप से कटघरे में खड़ा किया गया, जिससे उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ा।
यूजीसी का नियम, संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ
याचिका का तर्क है कि यदि यूजीसी के नियम केवल SC, ST और OBC समुदायों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को ही कानूनी संरक्षण के दायरे में लाते हैं, जबकि अन्य जातियों के खिलाफ होने वाले अपमान, उत्पीड़न या सामाजिक बहिष्कार को नजरअंदाज करते हैं, तो इससे कानून की दृष्टि में नागरिकों के बीच असमानता पैदा होगी। याचिकाकर्ता का कहना है कि भेदभाव की प्रकृति व्यक्ति की जाति से नहीं, बल्कि उसके साथ किए गए व्यवहार से तय होती है, और इसलिए कानून को किसी एक वर्ग के बजाय सभी नागरिकों की गरिमा और समानता की रक्षा करनी चाहिए।याचिका में यह भी कहा गया है कि शिक्षा संस्थान विचारों के आदान प्रदान, बहस और आलोचनात्मक विमर्श के केंद्र होते हैं। यदि किसी समूह या समुदाय के खिलाफ सामूहिक अपमानजनक भाषा को सामान्यीकृत कर दिया जाए, तो इससे अकादमिक स्वतंत्रता और विचारों की विविधता को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। याचिकाकर्ता का तर्क है कि समानता का अर्थ केवल ऐतिहासिक उत्पीड़न को संबोधित करना नहीं, बल्कि वर्तमान में हो रहे किसी भी प्रकार के सामाजिक अपमान और बहिष्कार को रोकना भी है, चाहे वह किसी भी समुदाय के खिलाफ क्यों न हो।
उच्च जातियां भी हैं कट्टरता और वैमनस्य का शिकार
इसी आधार पर याचिका में यह मांग की गई है कि यदि UGC को भेदभाव विरोधी नियम बनाने ही हैं, तो उन्हें सार्वभौमिक, तटस्थ और सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होना चाहिए, न कि केवल कुछ वर्गों तक सीमित। याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून का उद्देश्य किसी समूह को दूसरों के विरुद्ध खड़ा करना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाना होना चाहिए जहां हर छात्र और शिक्षक बिना भय, अपमान या पूर्वाग्रह के अध्ययन और शोध कर सके।
याचिका में यह भी कहा गया है कि जाति आधारित कट्टरता किसी भी दिशा में हो, वह सामाजिक समरसता और शैक्षणिक माहौल दोनों के लिए घातक है। इसलिए, भेदभाव विरोधी कानूनों का उद्देश्य किसी एक वर्ग की सुरक्षा तक सीमित न होकर हर व्यक्ति की गरिमा, सम्मान और समानता की रक्षा होना चाहिए।
इसके अलावा यह भी कहा गया है कि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, जहां केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका है। ऐसे में बिना राज्यों से परामर्श के जारी की गई अधिसूचना संघीय ढांचे के विरुद्ध जाती है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि अधिसूचना का असर छात्रों, शिक्षकों और विश्वविद्यालय प्रशासन तीनों पर पड़ेगा, जिससे शैक्षणिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
कोर्ट से क्या राहत मांगी गई है?
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह यूजीसी की हालिया अधिसूचना को असंवैधानिक घोषित करते हुए उस पर रोक लगाए। इसके साथ ही अदालत से यह भी मांग की गई है कि भविष्य में विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों से जुड़े किसी भी नियामक आदेश को जारी करने से पहले व्यापक परामर्श और संवैधानिक परीक्षण सुनिश्चित किया जाए।
याचिकाकर्ता ने यह भी प्रार्थना की है कि अदालत यह स्पष्ट करे कि यूजीसी की भूमिका मार्गदर्शन और मानक निर्धारण तक सीमित है, न कि विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक या नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप तक। साथ ही अंतरिम राहत के रूप में अधिसूचना के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की भी मांग की गई है।
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