Dog Bite: स्ट्रे डॉग्स पर सुनवाई से पहले याचिकाकर्ता की दलील, भैरव के वाहन हैं ये...रीति रिवाज को ध्यान में रखकर सुप्रीम कोर्ट ले फैसला
- Reported by: गौरव श्रीवास्तवEdited by: Piyush Kumar
- Updated Jan 19, 2026, 10:13 PM IST
आवारा कुत्तों और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पहले एक हस्तक्षेप याचिका दाखिल की गई है। याचिका में मांग की गई है कि किसी भी नीति में हिंदू धर्म सहित सभी धर्मों की पशुओं को भोजन कराने जैसी धार्मिक परंपराओं को अवैध या दंडनीय न बनाया जाए। याचिकाकर्ता ने वैज्ञानिक, मानवीय और संवैधानिक संतुलन के साथ आवारा कुत्तों की समस्या के समाधान की जरूरत पर जोर दिया है।
आवारा कुत्तों और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान मामले पर होगी सुनवाई।(फोटो सोर्स: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल)
आवारा कुत्तों और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान मामले में कल होने वाली सुनवाई से ठीक पहले एक अहम हस्तक्षेप याचिका दाखिल की गई है। यह याचिका एडवोकेट अरविंद कुमार शुक्ला की ओर से दाखिल की गई है।
याचिका में विशेष रूप से यह मांग की गई है कि भविष्य में किसी भी नीति या आदेश में हिंदू धर्म की रीति-परंपराओं और धार्मिक आचरण, खासकर पशुओं को भोजन कराने जैसी परंपराओं, को संरक्षित रखा जाए और उन्हें अवैध या दंडनीय न बनाया जाए। याचिका ऐसे समय दाखिल हुई है जब इस मामले में कल सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में सुनवाई करेगा, ऐसे में ये नई मांग न्यायिक बहस को नया धार्मिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक आयाम दे सकती है।
सभी धर्मों में कुत्तों और जीवों के प्रति करुणा के उदाहरण
याचिका में भारतीय समाज की धार्मिक विविधता का हवाला देते हुए कहा गया है कि लगभग सभी प्रमुख धर्मों में जीवों के प्रति करुणा को नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य माना गया है। हिंदू धर्म में कुत्तों को विशेष धार्मिक स्थान प्राप्त है। पितृ पक्ष, श्राद्ध और अमावस्या जैसे अनुष्ठानों में कुत्तों, कौओं और गायों को भोजन कराना अनिवार्य धार्मिक कर्म माना जाता है। महाभारत की कथा में युधिष्ठिर द्वारा कुत्ते को स्वर्ग के द्वार तक न छोड़ने को धर्म की सर्वोच्च परीक्षा बताया गया है। भगवान शिव के भैरव रूप का वाहन कुत्ता माना जाता है, और भैरव मंदिरों में कुत्तों को भोजन कराना श्रद्धा का प्रतीक है।
जैन धर्म में कुत्तों का महत्व
जैन धर्म में अहिंसा सर्वोच्च सिद्धांत है। जीव मात्र को कष्ट न देने और उनके प्रति दया रखने को आत्मिक उन्नति का मार्ग माना गया है। जैन दर्शन में पालतू बनाकर पशुओं को बांधने की बजाय समुदाय में स्वतंत्र रूप से रहने वाले जीवों को भोजन और संरक्षण देने को श्रेष्ठ माना गया है।
इस्लाम में पशुओं के प्रति दया को ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का माध्यम माना गया है। हदीसों में वर्णन है कि एक प्यासे कुत्ते को पानी पिलाने वाले व्यक्ति को अल्लाह ने क्षमा और इनाम दिया। भूखे जानवरों को भोजन कराना इस्लाम में सदक़ा और पुण्य कार्य माना जाता है।
ईसाई धर्म में भी जीवों के प्रति करुणा को ईश्वर की सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व माना गया है। संत फ्रांसिस ऑफ असीसी जैसे संतों ने पशुओं और पक्षियों से प्रेम को आध्यात्मिक साधना का अंग बताया। बौद्ध धर्म में करुणा और अहिंसा को जीवन का मूल मूल्य माना गया है। सभी प्राणियों के दुख को कम करना बौद्ध साधना का केंद्रीय सिद्धांत है, जिसमें पशु भी समान रूप से शामिल हैं। याचिका में कहा गया है कि इन धार्मिक परंपराओं का साझा संदेश यह है कि मानव सुरक्षा और पशु करुणा विरोधी नहीं, बल्कि एक दूसरे और नीति निर्माण में दोनों के बीच संतुलन जरूरी है।
याचिका में कानून, विज्ञान और सार्वजनिक स्वास्थ्य के भी दिए आधार
याचिका में कहा गया है कि देश में पहले से लागू एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम, 2001 का उद्देश्य नसबंदी, टीकाकरण और पुनर्वास के जरिए आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करना है, लेकिन इन नियमों को सही तरीके से लागू नहीं किया गया है।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि बड़े पैमाने पर कुत्तों को शेल्टर होम में रखने से बीमारियों के फैलने, भीड़भाड़ और ज़ूनोटिक संक्रमण का खतरा पैदा हो सकता है। वैज्ञानिक शोधों का हवाला देते हुए कहा गया है कि नसबंदी और सार्वभौमिक टीकाकरण ही दीर्घकालिक समाधान है, न कि सामूहिक हटाने की कार्रवाई।
किसकी ओर से दाखिल हुई याचिका और क्या है उद्देश्य?
हस्तक्षेप याचिका सुप्रीम कोर्ट के जाने माने वकील एडवोकेट अरविंद कुमार शुक्ला ने दायर की है। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया है कि उन्हें इस मामले में सुना जाए ताकि वैज्ञानिक, मानवीय और संवैधानिक दृष्टिकोण से संतुलित समाधान सामने आ सके।
याचिकाकर्ता ने कहा है कि वह कुत्तों के काटने की घटनाओं की गंभीरता से इनकार नहीं करते, लेकिन अंधाधुंध तरीके से हटाने, पकड़ने या समाप्त करने की नीति न केवल अप्रभावी है बल्कि इससे समस्या और बढ़ सकती है। याचिका में कहा गया है कि आवारा कुत्तों को एक इलाके से हटाने पर वहां नए, असंक्रमित और अक्सर अधिक आक्रामक कुत्ते आ जाते हैं, जिससे सुरक्षा का जोखिम बना रहता है।
सुप्रीम कोर्ट से राहत और आने वाले समय में क्या मांग की गई?
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि भविष्य में कोई भी दिशा-निर्देश ऐसा न हो जिससे हिंदू धर्म सहित अन्य धर्मों की पशुओं को भोजन कराने जैसी धार्मिक प्रथाएं अवैध, दंडनीय या सामाजिक रूप से कलंकित हो जाएं। विशेष रूप से यह आग्रह किया गया है कि पितृ पक्ष, श्राद्ध और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान कुत्तों और अन्य जीवों को भोजन कराने के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण मिले।
इसके अलावा कोर्ट से यह भी अनुरोध किया गया है कि एक राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति गठित की जाए, जिसमें पशु चिकित्सक, नगर निकाय अधिकारी, व्यवहार वैज्ञानिक और पशु कल्याण संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हों, ताकि पूरे देश के लिए एक वैज्ञानिक और मानवीय नीति तैयार की जा सके।
याचिका में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश देने की भी मांग की गई है कि वे अंधाधुंध डॉग रिमूवल ड्राइव बंद करें, ABC नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करें, स्कूलों और अस्पतालों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षित ज़ोन बनाएं और नागरिकों को जागरूक करने के अभियान चलाएं।
आवारा कुत्तों के मामले पर सुप्रीम कोर्ट लगातार कर रहा सुनवाई
आवारा कुत्तों से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई जारी रखेगा। कोर्ट इस मामले में सभी पक्षकारों- डॉग लवर्स, कुत्तो काटने के शिकार लोगों, एनिमल राइट एक्टिविस्ट की ओर से पेश वकीलों की दलीलें विस्तार से सुन रहा है। 7 नवंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने सभी शैक्षणिक संस्थानों, हॉस्पिटल, बस डिपो, रेलवे स्टेशन, सरकारी दफ्तरों और स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स से आवारा कुत्तों को हटाने और उन्हें शेल्टर होम में रखने को कहा था। इस आदेश में बदलाव को लेकर कोर्ट में याचिकाएं दायर हुई हैं।
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