लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल इस याचिका में चुनाव आयोग के कामकाज, मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों, मतदाता सूची में संशोधन और डिजिटल डेटाबेस के संचालन पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने, चुनाव आयोग के संबंधित रिकॉर्ड की जांच कराने और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से जुड़ी प्रक्रियाओं की स्वतंत्र समीक्षा की मांग की है।
12 अक्टूबर 2026 को दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया है कि SIR से जुड़े कुछ फैसले चुनाव आयोग के सभी सदस्यों की जानकारी, मंजूरी या सहमति के बिना लिए गए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चुनाव आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल कानून के मुताबिक होना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से यह जांच कराने की मांग की है कि विवादित फैसले संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुरूप लिए गए या नहीं।
CEC की शक्तियों पर सवाल, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड तलब करने की मांग
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त की ओर से चुनाव आयोग की सामूहिक शक्तियों के कथित एकतरफा इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया है। इसमें कहा गया है कि चुनाव आयोग बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसके फैसले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए जाने चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज आपत्तियों, बैठकों के एजेंडे, कार्यवाही के मिनट्स, फाइलों और संबंधित नोटिंग को रिकॉर्ड पर मंगाने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि इन दस्तावेजों की जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि SIR से जुड़े विवादित फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए थे।
इस संबंध में याचिका में टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की भूमिका तथा चुनाव आयोग के सामूहिक कामकाज से जुड़े कानूनी सिद्धांतों के संदर्भ में विवादित फैसलों की समीक्षा होनी चाहिए।
देशव्यापी SIR शुरू करने के फैसले की फाइल मांगने की अपील
याचिका में देशभर में SIR शुरू करने के लिए 24 जून 2025 को लिए गए कथित फैसले का पूरा रिकॉर्ड भी तलब करने की मांग की गई है। इसमें RTI के तहत मिली जानकारी और बाद में प्रथम अपीलीय प्राधिकारी की टिप्पणी का जिक्र किया गया है।
याचिका के मुताबिक, RTI आवेदन के जवाब में चुनाव आयोग के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी ने प्रकाशित आदेश की प्रति उपलब्ध कराई थी। बाद में प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने कहा था कि उस समय तक देशव्यापी SIR शुरू करने का कोई फैसला नहीं लिया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस टिप्पणी और चुनाव आयोग के प्रकाशित आदेश के बीच अंतर की जांच जरूरी है।
याचिका में मांग की गई है कि 24 जून 2025 के फैसले से जुड़ी पूरी फाइल, नोटिंग और अन्य रिकॉर्ड अदालत के सामने रखे जाएं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि देशव्यापी SIR को संस्थागत मंजूरी मिली थी या नहीं।
Form 6 में बदलाव को भी चुनौती
याचिका में ऑनलाइन Form 6 में किए गए बदलाव पर भी सवाल उठाए गए हैं। Form 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि जुलाई 2026 में ECINET पर उपलब्ध ऑनलाइन फॉर्म में आवेदक या उसके रिश्तेदार का किसी पिछली SIR मतदाता सूची में नाम होने से संबंधित घोषणा जोड़ी गई, जबकि संबंधित नियमों में संशोधन नहीं किया गया था।याचिका में कहा गया है कि वैधानिक नियमों में बदलाव किए बिना फॉर्म में नई शर्त जोड़ने से पात्र नागरिकों के लिए मतदाता सूची में नाम दर्ज कराना मुश्किल हो सकता है। इसका असर खास तौर पर पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों पर पड़ सकता है।
याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि ऑनलाइन Form 6 को मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित फॉर्म के अनुरूप रखा जाए और किसी बदलाव के लिए पहले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाए।
ECINET और ERONET डेटाबेस के स्वतंत्र ऑडिट की मांग
याचिका में मतदाता सूची से जुड़े ECINET और ERONET डिजिटल डेटाबेस के संचालन और तकनीकी व्यवस्था की भी जांच कराने की मांग की गई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि डेटाबेस तक पहुंच रखने वाले लोगों और मतदाता रिकॉर्ड में बदलाव करने की उनकी क्षमता को लेकर पारदर्शिता की कमी है।याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि पात्र मतदाताओं के नाम गलती से हटाए जाने की स्थिति में उन्हें दोबारा सूची में शामिल करने के लिए प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। याचिका में दावा किया गया है कि सॉफ्टवेयर में बदलाव वापस लेने यानी रोलबैक की सुविधा नहीं होने से कुछ पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने में परेशानी हुई। इसलिए सुप्रीम कोर्ट से एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की गई है, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश करें और जिसमें तकनीकी विशेषज्ञ तथा अन्य प्रतिष्ठित लोग शामिल हों। समिति को SIR के दौरान मतदाता सूची में किए गए बदलावों, डेटाबेस तक पहुंच और रिकॉर्ड में संशोधन की स्वतंत्र जांच करने का प्रस्ताव दिया गया है।
मतदाता सूची से हटाए गए नामों का बूथवार ब्योरा सार्वजनिक करने की मांग
याचिका में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और Form 7 के तहत दर्ज आपत्तियों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। Form 7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम को हटाने के लिए आपत्ति दर्ज कराने में किया जाता है।याचिकाकर्ताओं ने हर मतदान केंद्र के हिसाब से SIR के दौरान हटाए गए सभी मतदाताओं के नाम और नाम हटाने के कारण सार्वजनिक करने की मांग की है। साथ ही, उम्र और लिंग के आधार पर आंकड़े उपलब्ध कराने तथा पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि बड़ी संख्या में Form 7 आपत्तियां दाखिल किए जाने, कथित फर्जी नामों और कुछ समुदायों तथा महिलाओं को निशाना बनाए जाने की शिकायतों की जांच जरूरी है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे नोटिस दिया जाए और अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिले।
याचिका में लगभग 13 करोड़ नामों के हटाए जाने का दावा करते हुए पहले से दाखिल एक अन्य मामले का हवाला दिया गया है। हालांकि, इसमें चुनाव आयोग के उस पक्ष का भी उल्लेख है कि यह संख्या अंतिम रूप से हटाए गए मतदाताओं की नहीं, बल्कि उन लोगों की है जिन्हें ड्राफ्ट सूची के स्तर पर अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट के रूप में चिह्नित किया गया था।
पंजाब में मतदाता सूची को लेकर भी जताई चिंता
याचिका में पंजाब की ड्राफ्ट मतदाता सूची के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि जून 2026 में लगभग 2.14 करोड़ मतदाताओं की संख्या के मुकाबले 13 अगस्त 2026 को प्रकाशित ड्राफ्ट सूची में करीब 20.66 लाख नाम कम होने की बात सामने आई थी।
याचिका के मुताबिक, लगभग 12.80 लाख मतदाताओं का वर्ष 2003 में तैयार मतदाता सूची से मिलान नहीं हो पाया था और उन्हें सूची में बने रहने के लिए एक महीने के भीतर दस्तावेज देने को कहा गया था। याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई है कि यदि पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने की प्रभावी व्यवस्था नहीं हुई तो आगामी चुनावों में कुछ लोग मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं।
EVM की नीतियों और तकनीकी व्यवस्था की समीक्षा भी मांगी
याचिका में EVM के इस्तेमाल से जुड़ी नीतियों, प्रक्रियाओं, प्रोटोकॉल और तकनीकी ढांचे की भी स्वतंत्र समीक्षा कराने की मांग की गई है। इसके लिए वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ भारतीय व्यवस्था की तुलना करने का प्रस्ताव रखा गया है।
याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता वाली प्रस्तावित स्वतंत्र समिति मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस के ऑडिट के साथ EVM के इस्तेमाल और संचालन से जुड़े तकनीकी पहलुओं की भी समीक्षा करे।
SIR पर अंतरिम रोक लगाने की मांग
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि मामले की सुनवाई पूरी होने तक देशभर में चल रही SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाई जाए। इसके अलावा, विवादित फैसलों को कानून के मुताबिक लिए जाने की जांच करने, यदि कोई फैसला अधिकार के बिना लिया गया हो तो उसे रद्द करने और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने की मांग की गई है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि पात्र मतदाताओं को नाम शामिल कराने के लिए कानून के तहत निर्धारित अंतिम तारीख तक अवसर मिलना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने संबंधित मामलों को साथ सुनने का अनुरोध भी किया है।
SIR की वैधता को दोबारा चुनौती देने का दावा नहीं
याचिका में स्पष्ट किया गया है कि याचिकाकर्ता SIR की वैधता को नए सिरे से चुनौती नहीं दे रहे हैं। इसमें 27 मई 2026 को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख है, जिसमें SIR की वैधता को बरकरार रखा गया था।याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा याचिका का दायरा अलग है। इसमें यह जांचने की मांग की गई है कि SIR लागू करते समय सुप्रीम कोर्ट की ओर से मान्य सुरक्षा उपायों, संवैधानिक प्रावधानों और वैधानिक नियमों का पालन किया गया या नहीं। याचिका 12 अक्टूबर 2026 को एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड प्रसन्ना एस. के माध्यम से दाखिल की गई है। इसमें उठाए गए आरोपों और मांगों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है।
