प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने एक औपचारिक प्रस्ताव पारित कर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस) नियमों में प्रस्तावित संशोधनों के ड्राफ्ट को पूरी तरह वापस लेने की मांग की है।
11 अप्रैल को पारित इस प्रस्ताव में प्रेस क्लब ने प्रस्तावित नियमों के प्रेस की स्वतंत्रता और डिजिटल मीडिया की स्वायत्तता पर संभावित प्रभाव को लेकर गंभीर चिंता जताई। प्रस्ताव में कहा गया कि ऑनलाइन कंटेंट को नियंत्रित करने वाला कोई भी नियामक ढांचा संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मूल अधिकारों का सम्मान करे।
प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि नए नियम स्वतंत्र क्रिएटर्स, यूट्यूबर्स और फ्रीलांसरों के लिए आर्थिक रूप से भारी पड़ सकते हैं और इससे “चिलिंग इफेक्ट” पैदा होगा, यानी लोग डर के कारण खुद ही सेंसरशिप करने लगेंगे।
प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि इन संशोधनों के खिलाफ सांसदों और अन्य संबंधित पक्षों से समर्थन जुटाया जाएगा, ताकि सरकार पर दबाव बनाया जा सके। मौजूदा रूप में ये ड्राफ्ट प्रावधान सरकारी निगरानी और संभावित सेंसरशिप को बढ़ावा दे सकते हैं, जिससे पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। सदस्यों ने जोर देकर कहा कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया लोकतंत्र की बुनियाद है और ऐसे किसी भी कदम से बचना चाहिए जो आलोचनात्मक रिपोर्टिंग को सीमित करे।
समयसीमा और अधिकारों पर सवाल
प्रस्ताव में फरवरी 2026 में किए गए बदलावों पर भी आपत्ति जताई गई, जिसमें कंटेंट हटाने की समयसीमा 36 घंटे से घटाकर 2 घंटे कर दी गई है। इसे अव्यवहारिक बताते हुए वापस लेने की मांग की गई है। इसके अलावा, IT Rules 2009 के Rule 16 और अन्य प्रावधानों को भी खत्म करने की मांग की गई, जिन्हें बिना जवाबदेही के सेंसरशिप को बढ़ावा देने वाला बताया गया।
नए नियमों से पहले संबंधित पक्षों से व्यापक परामर्श करे सरकार
प्रेस क्लब ने सरकार से अपील की कि किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले पत्रकारों, संपादकों और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स सहित सभी संबंधित पक्षों से व्यापक परामर्श किया जाए।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब देश में डिजिटल मीडिया के नियमन को लेकर बहस तेज है और कई मीडिया संगठनों व नागरिक समाज के समूहों ने भी इन ड्राफ्ट नियमों पर चिंता जताई है।
