PFI Case: दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट स्थित स्पेशल NIA कोर्ट ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ चल रहे बहुचर्चित मामले में बड़ा आदेश पारित करते हुए संगठन के चेयरमैन O.M.A. सलाम, संस्थापक चेयरमैन और पूर्व वाइस चेयरमैन ई.एम. अबूबकर समेत कुल 21 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर दिए हैं। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना है कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री यह गंभीर संदेह पैदा करती है कि आरोपी PFI और उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी परिषद (NEC) के माध्यम से भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने और वर्ष 2047 तक या उससे पहले शरिया आधारित इस्लामिक खिलाफत स्थापित करने की साजिश में शामिल थे।
कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के अलावा गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आपराधिक साजिश, देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की तैयारी, आतंकी गतिविधियों के लिए फंड जुटाने, प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने, भर्ती करने और आतंकवादी गतिविधियों की तैयारी जैसे गंभीर आरोप तय किए हैं। मामले की अगली सुनवाई 10 जुलाई 2026 को होगी। अदालत ने सभी आरोपियों को उस दिन पेश होने का निर्देश दिया है।
क्या है PFI से जुड़ा पूरा मामला?
NIA ने सितंबर 2022 में देशभर में एक साथ की गई कार्रवाई के दौरान PFI और उससे जुड़े पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया था। एजेंसी का आरोप है कि PFI केवल एक सामाजिक या राजनीतिक संगठन नहीं था, बल्कि उसके शीर्ष नेतृत्व द्वारा एक दीर्घकालिक योजना के तहत देश में कट्टरपंथी नेटवर्क तैयार किया जा रहा था।
कोर्ट के आदेश के अनुसार अभियोजन पक्ष का मामला यह है कि वर्ष 2006 से लेकर 22 सितंबर 2022 तक PFI और उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी परिषद ने संगठित तरीके से ऐसी गतिविधियां चलाईं जिनका अंतिम उद्देश्य भारत की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर इस्लामिक शासन स्थापित करना था। अदालत ने कहा कि अभियोजन के अनुसार यह लक्ष्य सशस्त्र संघर्ष, कट्टरपंथीकरण, हथियार प्रशिक्षण, भर्ती और वित्तीय नेटवर्क के माध्यम से हासिल किया जाना था।
कोर्ट ने ‘विजन 2047’ की साजिश पर क्या कहा?
स्पेशल NIA कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता है कि ‘विजन 2047’ दस्तावेज PFI का दस्तावेज था। नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी के मुताबिक इस दस्तावेज में भारत में इस्लामिक शासन स्थापित करने की दीर्घकालिक साजिश का उल्लेख था।
कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से यह भी संकेत मिलता है कि हिंदू नेताओं को निशाना बनाने, सुरक्षा बलों पर हमले की तैयारी और ISIS को समर्थन जैसे मुद्दों पर संगठन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी स्तर पर निर्णय लिए गए थे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ये गतिविधियां किसी एक व्यक्ति के निजी कृत्य नहीं थीं, बल्कि संगठन के शीर्ष नेतृत्व या "डायरेक्टिंग माइंड्स" के माध्यम से संचालित संस्थागत निर्णय थे।
RSS-BJP नेताओं को निशाना बनाने के आरोप
आदेश में कई संरक्षित गवाहों के बयानों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि PFI के कुछ प्रशिक्षण कार्यक्रमों और बैठकों में कथित तौर पर RSS और BJP नेताओं को टारगेट करने की चर्चा हुई थी।
अभियोजन का दावा है कि विभिन्न राज्यों में आयोजित प्रशिक्षण शिविरों में प्रतिभागियों को हिंदू संगठनों और उनके नेताओं के खिलाफ कार्रवाई के लिए प्रेरित किया गया। कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों की सत्यता का अंतिम परीक्षण मुकदमे के दौरान होगा, लेकिन इस स्तर पर आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है।
PFI की दलीलें क्यों नहीं मानी गईं?
आरोप तय करने की प्रक्रिया के दौरान बचाव पक्ष ने कई कानूनी आपत्तियां उठाईं।
1. कोई आतंकी हमला हुआ ही नहीं
बचाव पक्ष का तर्क था कि मामले में कोई वास्तविक आतंकी हमला नहीं हुआ, इसलिए आतंकवाद से जुड़े आरोप नहीं बनते।
कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि UAPA की कई धाराएं आतंकवादी कृत्य की तैयारी, फंडिंग, भर्ती और प्रशिक्षण को भी दंडनीय बनाती हैं। किसी आतंकी हमले का वास्तव में होना आवश्यक नहीं है।
2. संरक्षित गवाहों के बयान एक जैसे
आरोपियों ने कहा कि कई संरक्षित गवाहों के बयान लगभग समान हैं, इसलिए उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने के चरण में गवाहों की विश्वसनीयता का विस्तृत परीक्षण नहीं किया जाता। यह ट्रायल का विषय है। अदालत ने माना कि यदि किसी संगठन की गतिविधियां केंद्रीकृत तरीके से संचालित होती हैं तो विभिन्न गवाहों के बयानों में कुछ समानता स्वाभाविक है।
3. PFI एक सामाजिक संगठन है
बचाव पक्ष ने दावा किया कि PFI एक सामाजिक कल्याण संगठन है और उसे झूठा फंसाया गया है।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया एक अलग तस्वीर पेश करती है। आरोप तय करने के चरण में इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
4. 2047 का लक्ष्य बहुत दूर की बात
बचाव पक्ष ने कहा कि यदि किसी कथित खिलाफत का लक्ष्य 2047 रखा गया था तो वर्तमान गतिविधियों और उस लक्ष्य के बीच पर्याप्त निकटता नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि इतने बड़े लक्ष्य को हासिल करने में दशकों लग सकते हैं। इसलिए प्रशिक्षण शिविर, कट्टरपंथीकरण और भर्ती जैसी गतिविधियों को उस कथित लक्ष्य से अलग नहीं किया जा सकता।
5. हथियार बरामद नहीं हुए
अदालत ने कहा कि हथियारों की बरामदगी न होना अपने आप में आरोपों को खत्म नहीं करता। रिकॉर्ड से यह संकेत मिलता है कि हथियारों की व्यवस्था और प्रशिक्षण के प्रयास किए जा रहे थे।
NIA को कौन-कौन से सबूत मिले?
NIA ने अदालत के सामने बड़ी मात्रा में दस्तावेजी, इलेक्ट्रॉनिक और मौखिक साक्ष्य पेश किए हैं। अदालत ने अपने आदेश में इनका उल्लेख किया है।
1. संरक्षित गवाहों के बयान
अभियोजन का सबसे महत्वपूर्ण आधार कई संरक्षित गवाहों (Protected Witnesses) के बयान हैं। इन गवाहों ने कथित प्रशिक्षण शिविरों, बैठकों, भाषणों और संगठन की रणनीतियों के बारे में जानकारी दी।
2. बैंक खातों और वित्तीय लेन-देन के रिकॉर्ड
NIA ने बैंक अधिकारियों के बयान, बैंक खाते, वित्तीय दस्तावेज और लेन-देन का रिकॉर्ड पेश किया। एजेंसी का दावा है कि संगठन के विभिन्न कार्यक्रमों और कथित आतंकी तैयारी के लिए वित्तीय संसाधन जुटाए गए।
3. तलाशी में जब्त दस्तावेज
देशभर में की गई तलाशी के दौरान कई दस्तावेज, पुस्तिकाएं और साहित्य बरामद किए गए। इनमें तमिल और उर्दू भाषा के कुछ दस्तावेज भी शामिल हैं, जिनका अनुवाद जांच में पेश किया गया।
4. डिजिटल साक्ष्य
मोबाइल फोन, एसडी कार्ड और अन्य डिजिटल उपकरणों से प्राप्त सामग्री को अदालत के सामने रखा गया। जांच एजेंसी ने सोशल मीडिया डेटा और टेलीग्राम चैट का भी हवाला दिया।
5. ISIS से जुड़ी सामग्री
अदालत के आदेश के अनुसार जांच एजेंसी ने कुछ इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से ISIS संबंधी साहित्य और प्रकाशनों की बरामदगी का दावा किया है।
6. कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR)
कई आरोपियों के बीच संपर्क और बातचीत को दर्शाने के लिए कॉल डिटेल रिकॉर्ड अदालत में पेश किए गए।
7. संगठनात्मक दस्तावेज
PFI के संगठनात्मक ढांचे, पदाधिकारियों की भूमिका और बैठकों से जुड़े दस्तावेज भी रिकॉर्ड का हिस्सा हैं।
किस आरोपी की क्या भूमिका बताई गई?
O.M.A. सलाम
NIA के अनुसार O.M.A. सलाम PFI के राष्ट्रीय अध्यक्ष और NEC के प्रमुख सदस्यों में थे। अभियोजन का दावा है कि उन्होंने संगठन की रणनीतिक गतिविधियों की निगरानी की और विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों एवं बैठकों में भूमिका निभाई।
गवाहों के बयानों के आधार पर एजेंसी का आरोप है कि वे संगठन के दीर्घकालिक लक्ष्य और प्रशिक्षण संरचना से जुड़े निर्णयों में शामिल थे।
ई.एम. अबूबकर
PFI के संस्थापक चेयरमैन और पूर्व वाइस चेयरमैन ई.एम. अबूबकर पर आरोप है कि उन्होंने संगठन के वैचारिक और संगठनात्मक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अभियोजन का दावा है कि वे शीर्ष नेतृत्व का हिस्सा थे और कथित रूप से ऐसे कार्यक्रमों में शामिल रहे जिनका उद्देश्य प्रशिक्षित कैडर तैयार करना था।
अन्य NEC सदस्य
कोर्ट के आदेश के अनुसार अन्य राष्ट्रीय पदाधिकारियों और NEC सदस्यों पर आरोप है कि उन्होंने:
- संगठनात्मक विस्तार में भूमिका निभाई।
- प्रशिक्षण कार्यक्रमों का संचालन किया।
- भर्ती और कट्टरपंथीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया।
- वित्तीय संसाधन जुटाने में सहयोग किया।
- और कथित रूप से लक्षित हमलों से जुड़ी चर्चाओं में भाग लिया।
आरोप तय होने के बाद अब मामला ट्रायल के चरण में प्रवेश करेगा। 10 जुलाई 2026 को सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया जाएगा। इसके बाद अभियोजन अपने गवाहों और साक्ष्यों को अदालत के सामने पेश करेगा।
हालांकि अदालत ने अपने आदेश में कई गंभीर टिप्पणियां की हैं, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि आरोप तय होना दोष सिद्ध होना नहीं है। आरोपियों को मुकदमे के दौरान अपने बचाव का पूरा अवसर मिलेगा और अंतिम निर्णय ट्रायल पूरा होने के बाद ही होगा।
फिलहाल, NIA कोर्ट का यह आदेश PFI से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक माना जा रहा है, क्योंकि अदालत ने प्रथम दृष्टया यह माना है कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री एक व्यापक, संगठित और दीर्घकालिक साजिश की ओर संकेत करती है, जिसके केंद्र में कथित तौर पर भारत में 2047 तक इस्लामिक खिलाफत स्थापित करने का लक्ष्य था।
