भारतीय आईटी पेशेवरों और कंपनियों को लेकर अमेरिका में हो रही कार्रवाई के बीच कांग्रेस ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने की कोशिशों के बावजूद भारत को इसका फायदा नहीं मिला। उन्होंने भारतीय IT पेशेवरों के हितों पर असर डालने वाले अमेरिकी कदमों का हवाला देते हुए मोदी सरकार की विदेश नीति और आर्थिक फैसलों पर सवाल उठाए।
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी पोस्ट में लिखा कि दबंगों को खुश करने की नीति कभी काम नहीं आती और अमेरिकी सरकार की हालिया कार्रवाई ने इसे एक बार फिर साबित कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी कदम सीधे तौर पर भारतीय IT पेशेवरों को निशाना बनाते हैं। रमेश ने UPI लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क लागू करने के प्रस्ताव को भी इसी संदर्भ में उठाया और दावा किया कि इससे अमेरिकी कंपनियों को फायदा होगा।
इन कंपनियों पर ट्रंप प्रशासन ने की कार्रवाई
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन विदेशी कर्मचारियों से जुड़े वीजा नियमों और ग्रीन कार्ड प्रक्रिया को लेकर सख्ती कर रहा है। हालिया कार्रवाई में माइक्रोसॉफ्ट, एडोब और कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो तथा एचसीएल जैसी कंपनियों की स्थायी निवास प्रक्रिया से जुड़ी PERM फाइलिंग प्रभावित हुई है। अमेरिकी प्रशासन ने इन कंपनियों के वीजा कार्यक्रमों के इस्तेमाल को लेकर जांच और सवाल उठाए हैं।
PERM यानी Permanent Labor Certification अमेरिकी कंपनियों के लिए रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है। इस प्रक्रिया में देरी या रोक का असर उन विदेशी कर्मचारियों पर पड़ सकता है, जो अमेरिका में लंबे समय तक काम करने और स्थायी निवास पाने की प्रक्रिया में हैं। भारतीय आईटी कंपनियों के कर्मचारियों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई कंपनियां अमेरिका में बड़े पैमाने पर कारोबार करती हैं और भारतीय पेशेवरों को वहां काम करने के अवसर देती हैं।
क्या है अमेरिका का तर्क?
इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने कुछ नए एच-1बी वीजा आवेदनों पर 1 लाख डॉलर के भुगतान की शर्त को भी एक साल के लिए बढ़ाया था। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि वीजा कार्यक्रमों के दुरुपयोग से अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार और वेतन पर असर पड़ता है। वहीं, आलोचकों का कहना है कि सख्त नियमों से विदेशी कुशल कर्मचारियों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों के सामने मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
