भारतीय सेना ने सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे एक फर्जी वीडियो को लेकर लोगों को सतर्क किया है। साथ ही डिजिटली एडिट किए गए इस वीडियो को फर्जी करार दिया है। इस वीडियो में सेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल गिरिश कालिया के नाम से कथित बयान प्रसारित किया जा रहा है कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश के कुछ सीमावर्ती इलाकों पर कब्जा कर लिया है और वहां तैनात भारतीय सैनिकों को जरूरी सामान की आपूर्ति नहीं हो रही है। सेना ने इन दावों को पूरी तरह भ्रामक बताते हुए वीडियो को डिजिटल रूप से छेड़छाड़ करके तैयार किया गया डीपफेक करार दिया है।
सेना की आधिकारिक फैक्ट चेक इकाई 'इंडियन आर्मी फैक्ट चेक' ने 25 अक्टूबर को अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर एक पोस्ट कर इस मामले में विस्तार से जानकारी दी है। सेना ने बताया है कि वायरल वीडियो में आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल कर आवाज और लिप-सिंकिंग में बदलाव किया गया है। सेना ने कहा कि एआई का इस्तेमाल कर पुराने सैन्य ब्रीफिंग के फुटेज में उन बातों का दावा किया गया है,जो संबंधित अधिकारी ने कभी कही ही नहीं थीं।
क्या दावा किया जा रहा है फर्जी वीडियो में?
सोशल मीडिया पर प्रसारित क्लिप में दावा किया गया कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश के असाफिला, लॉन्गजू और टाकसिंग सर्किल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है। साथ ही वीडियो में यह भी दिखाने की कोशिश की गई कि इन इलाकों में तैनात भारतीय सेना के जवानों को आवश्यक आपूर्ति से वंचित किया जा रहा है। वायरल वीडियो को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो लेफ्टिनेंट जनरल गिरिश कालिया ने किसी गोपनीय जानकारी का खुलासा करते हुए यह स्वीकार किया हो। हालांकि, भारतीय सेना ने स्पष्ट किया कि अधिकारी के नाम से प्रसारित ये टिप्पणियां पूरी तरह मनगढ़ंत हैं। वीडियो में वास्तविक फुटेज का इस्तेमाल जरूर हुआ है,लेकिन उसके साथ डिजिटली छेड़छाड़ कर झूठे दावे जोड़े गए हैं।
कहां का है वीडियो और क्या था असली बयान?
भारतीय सेना ने अपने फैक्ट चेक में असली वीडियो के बारे में भी बताया है कि ओरिजनल वीडियो फुटेज में क्या था। 'इंडियन आर्मी फैक्ट चेक' के मुताबिक, वायरल वीडियो में इस्तेमाल किया गया मूल फुटेज 27 अक्टूबर 2023 का है। उस समय मेजर जनरल गिरिश कालिया जम्मू-कश्मीर में 28 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (GOC) थे। उन्होंने कुपवाड़ा में एक प्रेस ब्रीफिंग की थी। यह ब्रीफिंग नियंत्रण रेखा (LoC) के पार से आतंकवादियों की घुसपैठ की कोशिशों और उनके खिलाफ चलाए गए अभियानों से संबंधित थी। इसमें अधिकारी ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई और आतंकवाद विरोधी अभियानों के नतीजों की जानकारी दी थी।
उस समय की ब्रीफिंग में घुसपैठ की 10 कोशिशों को नाकाम करने, 27 आतंकवादियों को मार गिराने और हथियारों, युद्ध संबंधी सामग्री तथा मादक पदार्थों की बरामदगी का जिक्र किया गया था। सेना ने साफ किया कि मूल बयान में न तो चीन का कोई उल्लेख था और न ही अरुणाचल प्रदेश के किसी सीमावर्ती क्षेत्र पर चीनी कब्जे की बात कही गई थी। भारतीय सैनिकों को जरूरी सामान की आपूर्ति रोके जाने का दावा भी मूल ब्रीफिंग का हिस्सा नहीं था।
AI की मदद से कैसे फैलाया गया दुष्प्रचार?
सेना के मुताबिक, इस मामले में पुरानी सैन्य ब्रीफिंग के वास्तविक वीडियो को आधार बनाकर उसमें कृत्रिम तरीके से नई बातें जोड़ी गईं। AI आधारित लिप-सिंकिंग और वॉयस क्लोनिंग के जरिए अधिकारी के चेहरे की गतिविधियों और आवाज को कथित बयानों के अनुरूप दिखाने की कोशिश की गई। सेना ने इस मामले को सैन्य दुष्प्रचार का उदाहरण बताते हुए इसके पीछे इस्तेमाल किए गए तरीके को भी बताया है>
सेना की लोगों से अपील, बिना जांच वीडियो साझा न करें
इसके साथ ही भारतीय सेना ने सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं से अपील की है कि वे ऐसे वीडियो पर भरोसा करने या उन्हें आगे साझा करने से पहले उनकी प्रामाणिकता की जांच करें। खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती क्षेत्रों से जुड़े दावों के मामले में मूल बयान और आधिकारिक स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करना जरूरी है।
