भारत की शिक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों और विशेष रूप से साल 2026 की 'नीट-यूजी' (NEET-UG) परीक्षा के पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ प्रदर्शन देखते ही देखते एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। दिल्ली की सड़कों पर डेरा डाले हजारों युवा प्रदर्शनकारी, लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले और कैंडललाइट मार्च की तस्वीरों ने वैश्विक मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। जैसे-जैसे 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) का यह आंदोलन आगे बढ़ा, अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे भारत में शासन, युवाओं की आकांक्षाओं और राजनीतिक जवाबदेही की एक बड़ी कहानी के रूप में पेश करना शुरू कर दिया। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद विदेशी मीडिया ने इसे बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के तीसरे कार्यकाल के लिए एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम माना है।
दुनिया के कुछ सबसे बड़े समाचार संगठनों ने इस पूरे घटनाक्रम को किस तरह कवर किया है, आइए जानते हैं-
रॉयटर्स: मोदी सरकार के लिए बड़ी परीक्षा
वैश्विक समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इन प्रदर्शनों और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में उनके सामने आई एक बड़ी राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा है। रॉयटर्स ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को चौंकाने वाला बताया, क्योंकि पीएम मोदी की छवि आमतौर पर जन दबाव के आगे न झुकने वाले नेता की रही है। एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में इस अशांति के राजनीतिक निहितार्थों के का बारे में बताया। रिपोर्ट में कहा गया कि बीजेपी के लिए युवा मतदाता बेहद अहम हैं और परीक्षा में गड़बड़ी, बेरोजगारी व सीमित अवसरों को लेकर छात्रों का यह लामबंद होना सरकार के लिए एक बड़ी परीक्षा है।
सीएनएन (CNN): मोदी सरकार के सामने दुर्लभ चुनौती
सीएनएन ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक "दुर्लभ और बढ़ती" चुनौती करार दिया। नेटवर्क ने कहा कि पीएम मोदी को ऐसे नेता के रूप में नहीं देखा जाता जो सड़कों पर होने वाले प्रदर्शनों के दबाव में तुरंत फैसले लें। सीएनएन ने इन प्रदर्शनों को गवर्नेंस, जवाबदेही और भारत में युवाओं की बेरोजगारी की समस्या से जोड़कर देखा। उनका तर्क था कि यह विरोध प्रदर्शन महज पेपर लीक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह डिग्री धारक युवाओं के भीतर की गहरी आर्थिक चिंताओं और हताशा को दर्शाता है।
बीबीसी (BBC): हाल के वर्षों का सबसे बड़ा छात्र आंदोलन
बीबीसी ने सीजेपी (CJP) के इस आंदोलन को हाल के वर्षों में भारत के सबसे बड़े छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलनों में से एक बताया और इसे देश के जन आंदोलनों के इतिहास से जोड़ा। बीबीसी ने इसकी तुलना 1970 के दशक के 'नव निर्माण आंदोलन' से की। रिपोर्ट में कहा गया कि इतिहास में कुछ छात्र आंदोलनों ने बड़े राजनीतिक बदलाव किए हैं, तो कुछ वक्त के साथ फीके भी पड़े हैं। बीबीसी के अनुसार, यह आंदोलन अपने व्यापक पैमाने और गवर्नेंस व शिक्षा नीति जैसी चिंताओं को एक साथ लाने के कारण अलग नजर आता है। हालांकि, बीबीसी ने यह सवाल भी उठाया कि क्या यह गुस्सा लंबे समय तक एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में टिक पाएगा?
द गार्डियन (The Guardian): मशहूर हस्तियों की चुप्पी पर सवाल
ब्रिटिश अखबार 'द गार्डियन' ने इसके राजनीतिक पहलुओं के बजाय सांस्कृतिक प्रतिक्रियाओं पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया। अखबार ने प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच भारत की बड़ी मशहूर हस्तियों की चुप्पी को लेकर उपजे गुस्से को हाइलाइट किया। रिपोर्ट के मुताबिक, कई प्रदर्शनकारियों ने छात्रों पर हुई पुलिसिया कार्रवाई पर बड़े स्टार्स की चुप्पी को उनका डरपोकपन बताया। अखबार ने लिखा—"प्रदर्शनकारी इस बात से बेहद नाराज थे कि जो सेलिब्रिटीज वैश्विक त्रासदियों या मुद्दों पर तुरंत ट्वीट करते हैं, उन्होंने अपने ही देश के युवाओं के दर्द से आंखें मूंद लीं, जबकि उन्हीं का सबसे वफादार फैनबेस सड़कों पर लाठियां और आंसू गैस झेल रहा था। अखबार ने यह भी कहा कि कुछ मशहूर हस्तियों ने आंदोलन के बिल्कुल आखिरी पड़ाव में आकर अपनी चुप्पी तोड़ी।
एससीएमपी (SCMP): परिसरों से बाहर निकला आंदोलन
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) ने लिखा कि यह विरोध प्रदर्शन हाल के वर्षों में भारत के सबसे बड़े सड़क प्रदर्शनों में से एक था। अखबार ने रेखांकित किया कि यह आंदोलन बहुत तेजी से यूनिवर्सिटी परिसरों (कैंपस) से बाहर निकलकर आम जनता, विपक्षी दलों और नागरिक समाज (सिविल सोसायटी) तक फैल गया। यह आंदोलन नौकरी की कमी और गवर्नेंस की विफलताओं को लेकर बढ़ती चिंताओं का आईना है। अखबार ने एक राजनीतिक टिप्पणीकार के हवाले से लिखा, इस घटनाक्रम के बाद बीजेपी ने वह नैतिक बढ़त खो दी है, जिसका इस्तेमाल वह कभी कांग्रेस पार्टी की आलोचना करने के लिए करती थी।
हर मीडिया आउटलेट का नजरिया भले ही अलग रहा, लेकिन सभी ने एक सुर में इस आंदोलन के पैमाने और इसकी गंभीरता को स्वीकार किया है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक यह आंदोलन सिर्फ परीक्षा की गड़बड़ियों का मुद्दा नहीं रह गया था, बल्कि इसे युवाओं के भविष्य, रोजगार और गवर्नेंस से जुड़ी गहरी हताशा के रूप में देखा गया।
