Digital Robbery : सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बुजुर्गों और रिटायर्ड लोगों को निशाना बनाकर करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले संगठित साइबर अपराधियों पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने ऐसे अपराधों को ‘डिजिटल डकैती’ करार देते हुए कहा कि इन अपराधियों से बेहद सख्ती से निपटने की जरूरत है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अगर कानून में मुकदमे की सुनवाई से पहले ही ऐसे अपराधियों को दंडित करने की कोई गुंजाइश है, तो अपराधों की प्रकृति को देखते हुए उसका भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए। कोर्ट ने देशभर में दर्ज साइबर अपराध के मामलों को एक साथ जोड़ने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं। बाद में याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
‘यह डिजिटल डकैती है, वीडियो कॉल के जरिए ठगी की जा रही है’
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालत बुजुर्गों और सेवानिवृत्त लोगों के खिलाफ हो रहे अपराधों की प्रकृति पर दोबारा विचार करेगी। उन्होंने कहा कि इन लोगों को बेरहमी से निशाना बनाने वाले अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। CJI ने यहां तक कहा कि अगर मौका मिला तो अदालत जमानत के आदेश को भी रद्द कर सकती है। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि वह खुद भी साइबर अपराध का पीड़ित है और उसने जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों के पास शिकायत दर्ज कराई है। इस पर CJI ने कहा कि मामले में जांच चल रही है और चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है। उन्होंने कहा कि आरोपी की भूमिका और उससे कितनी रकम की उगाही हुई, यह मुकदमे में देखा जाएगा। CJI ने कहा, “वसूली सबसे साधारण अपराध है। हमारी राय में यह डिजिटल डकैती है। आप वीडियो कॉल के जरिए ऐसा करते हैं।”
जांच को एक जगह समेटने की मांग पर कोर्ट सख्त
याचिकाकर्ता ने मांग की कि संबंधित अधिकारी से यह स्पष्ट कराया जाए कि क्या दिल्ली के मंदिर मार्ग साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन की ओर से सभी मामलों की जांच की जा रही है। उसका कहना था कि यदि एक ही एजेंसी जांच कर रही है, तो अलग-अलग एजेंसियों की ओर से जांच किए जाने से एक ही अपराध की दोबारा जांच की स्थिति बन सकती है। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि अदालत इस मांग पर विचार नहीं कर रही है और ऐसे मामलों में आरोपियों को न्यायिक मंच उपलब्ध कराने का सवाल नहीं उठता। उन्होंने कहा कि जांच जिस भी एजेंसी के पास है, याचिकाकर्ता को उसी के पास जाना चाहिए।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी याचिकाकर्ता की दलीलों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि किसी आरोपी की सुविधा के लिए देशभर के पीड़ितों को दिल्ली आने के लिए क्यों मजबूर किया जाए? उन्होंने कहा कि अपराध जहां हुआ है, वहां मुकदमा चलाने का अधिकार है। यदि ठगी की रकम बैंक खाते में बैंकॉक या सिंगापुर में प्राप्त होती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि अपराध का क्षेत्राधिकार वहां चला जाएगा।
‘आरोपी की सुविधा पीड़ितों और जांच से बड़ी नहीं’
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि कई मामलों को एक साथ जोड़ने की आरोपी की मांग पीड़ितों को होने वाली असुविधा और जांच की जरूरतों से ऊपर नहीं हो सकती। उन्होंने सवाल किया कि क्या केवल आरोपी की सुविधा के लिए देशभर के पीड़ितों को दिल्ली बुलाया जाना चाहिए? कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि आरोपी संगठित साइबर अपराध में केवल एक छोटे स्तर पर काम करने वाला व्यक्ति नहीं है, बल्कि अब वह देशभर में चल रही जांच को बाधित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
याचिकाकर्ता के वकील ने फिर कहा कि दिल्ली पुलिस की मंदिर मार्ग साइबर क्राइम इकाई पहले से ही इन मामलों की जांच कर रही है और दूसरी एजेंसियों की जांच से दोहराव हो सकता है। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यदि दिल्ली पुलिस की जांच एजेंसी खुद यह कहती है कि सभी मामलों की जांच एक जगह समेटना बेहतर होगा, तो कोर्ट इस पर विचार कर सकती है। लेकिन आरोपी की ओर से इस आधार पर जांच को एक जगह समेटने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
दिल्ली हाईकोर्ट जाने की दी सलाह
याचिकाकर्ता के वकील ने इस मुद्दे पर सीमित नोटिस जारी करने की मांग की, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या एक ही एजेंसी सभी मामलों की जांच कर रही है। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि याचिकाकर्ता जांच एजेंसी नहीं है और अदालत उसकी इस मांग के आधार पर देशभर में चल रही जांच को कमजोर नहीं करेगी। कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता को लगता है कि एक ही राज्य की एजेंसी से जुड़े कई एफआईआर को एक साथ किया जाना चाहिए, तो वह संबंधित हाईकोर्ट का रुख कर सकता है। जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है। याचिकाकर्ता के वकील ने दावा किया कि एक ही अपराध की जांच दो अलग-अलग एजेंसियां कर रही हैं। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यहां एक ही अपराध का मामला नहीं है, बल्कि अलग-अलग पीड़ित और अलग-अलग अपराध हैं।
केरल के 81 वर्षीय बुजुर्ग से 1.90 करोड़ रुपये ठगे जाने का जिक्र
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने केरल के एर्नाकुलम में एक 81 वर्षीय बुजुर्ग के साथ हुई ठगी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि बुजुर्ग को डिजिटल अरेस्ट किया गया और उनसे 1.90 करोड़ रुपये ले लिए गए। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उनकी कंपनी 16 साल से अधिक पुरानी है और आर्थिक मुश्किलों से गुजर रही थी। उन्होंने दावा किया कि याचिकाकर्ता खुद भी साइबर अपराध का पीड़ित है और जैसे ही उसे पता चला कि उसके बैंक खाते का इस्तेमाल ठगी की रकम प्राप्त करने के लिए किया गया है, उसने शिकायत दर्ज करा दी थी। हालांकि, जस्टिस बागची ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी कंपनी के खातों को इस्तेमाल होने दिया।
