प्रेमचंद की एक कहानी है, ईदगाह। यह स्टोरी आज भी अपने मर्म की वजह मशहूर है। जब-जब लोग पढ़ते हैं, तो वह मानो उनके दिल को छू लेती है। किस्से में एक लड़का था, जो अपनी अम्मी के लिए तोहफे में चिमटा लाता है। आप सोच रहे होंगे कि भला लोहे का चिमटा ही क्यों? ऐसा इसलिए, क्योंकि रोटियां सेंकने के दौरान जब उसकी अम्मी के हाथ आग की तपिश से जल जाते थे तो वह उनका दर्द न देख पाता था।
ऐसा ही एक असल किस्सा बिहार के दरभंगा में देखने को मिला। धनतेरस के मौके पर इस असल मार्मिक कहानी की नायिका लाडली कुमारी हैं। नन्हीं सी बच्ची को भले ही साफ तौर पर इस बात का बोध हो या न हो कि उसे भविष्य में क्या करना है, पर उसे इतना जरूर पता है कि मां जब सिलबट्टे पर खाने-पीने की चीजें पीसती है, तब उन्हें कितना समय लगता है। साथ ही कितनी तकलीफ होती है।
यही वजह रही कि उसने अपनी बचाई हुई छिटपुट रकम को त्यौहार पर मां के नाम न्यौछावर कर दिया। लाडली ने इसके लिए अपनी गुल्लक तोड़ जमा की रकम को इस्तेमाल किया। हालांकि, जितने पैसे उसकी गुल्लक से निकले थे, वे मिक्सर ग्राइंडर (खाने-पीने के सामान पीसने वाली मशीन - मिक्सी) लेने में कम थे, मगर मां के प्रति कुमारी के प्यार को देख दुकानदार का दिल भी पिघल गया और उसने पैसे कम कर मिक्सी दे दी।
लाडली ने इस बाबत टाइम्स नाऊ नवभारत के रिपोर्टर को बताया- मेरी मां सिलबट्टे पर मसाला पीसती थीं। वह इस दौराना खासा परेशान हो जाती थीं। मुझसे ये देखा नहीं जाता था। मुझे उनकी ओर से ऐसा करना कतई पसंद नहीं था। यही वजह थी कि मैंने उनके लिए मिक्सी खरीदने का मन बनाया।
बच्ची के मुताबिक, पिता उसे खर्च के लिए हर रोज कुछ रुपए दिया करते थे। वह इन रुपयों को अपनी गुल्लक में डालकर जमा करती थी। धनतेरस पर उसने तय किया कि वह गुल्लक तोड़ मिक्सी खरीदेगी। ऐसे में वह भाई को साथ लेकर धनतेरस पर मिक्सी खरीदने पहुंच गई, जहां दुकानदार ने उसकी मां के प्रति ऐसी भावना देख 1800 रुपए में मिक्सी दे दी।
