भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने शनिवार को कहा, “कोचिंग सेंटर अब ‘पोचिंग सेंटर’ बन चुके हैं। ये सुदृढ़ सांचों में प्रतिभा को जकड़ने वाले काले छिद्र बन गए हैं। कोचिंग सेंटर अनियंत्रित रूप से फैल रहे हैं, जो हमारे युवाओं के लिए, जो कि हमारे भविष्य हैं- एक गंभीर संकट बनता जा रहा है। हमें इस चिंताजनक बुराई से निपटना ही होगा। हम अपनी शिक्षा को इस तरह कलंकित और दूषित नहीं होने दे सकते।”
धनखड़ ने आगे कहा, “अब देश किसी सैन्य आक्रमण से नहीं, बल्कि विदेशी डिजिटल बुनियादी ढांचे पर निर्भरता से कमजोर और पराधीन होंगे। सेनाएं अब एल्गोरिद्म में बदल गई हैं। संप्रभुता की रक्षा का संघर्ष अब तकनीकी स्तर पर लड़ा जाएगा।”
उपराष्ट्रपति ने तकनीकी नेतृत्व को नई राष्ट्रभक्ति का आधार बताते हुए कहा कि हम एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं- एक नए राष्ट्रवाद के युग में। तकनीकी नेतृत्व अब देशभक्ति की नई सीमा रेखा है। हमें तकनीकी नेतृत्व में वैश्विक अगुवा बनना होगा। धनखड़ ने रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आयात-निर्भरता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “यदि हम रक्षा के क्षेत्र में बाहर से तकनीकी उपकरण प्राप्त करते हैं, तो वह देश हमें ठहराव की स्थिति में ला सकता है।
डिजिटल युग में बदलती वैश्विक शक्ति संरचनाओं की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “21वीं सदी का युद्धक्षेत्र अब भूमि या समुद्र नहीं है। पारंपरिक युद्ध अब अतीत की बात हो गई है। आज हमारी शक्ति और प्रभाव ‘कोड, क्लाउड और साइबर’ से तय होते हैं।”
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT), कोटा, राजस्थान के चौथे दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए धनखड़ ने कहा, “हम गुरुकुल की बात कैसे न करें? हमारे संविधान की 22 दृश्य-प्रतिमाओं में एक गुरुकुल की छवि भी है। हम सदैव ज्ञानदान में विश्वास रखते आए हैं। कोचिंग सेंटर को अपने ढांचे का उपयोग कौशल केंद्रों में परिवर्तित करने के लिए करना चाहिए। मैं नागरिक समाज और जनप्रतिनिधियों से आग्रह करता हूं कि इस समस्या की गंभीरता को समझें और शिक्षा में पुनर्संयम लाने हेतु एकजुट हों। हमें कौशल आधारित कोचिंग की आवश्यकता है।”
धनखड़ ने अंकों की होड़ के दुष्परिणामों पर चेताते हुए कहा, “पूर्णांक और मानकीकरण के प्रति जुनून ने जिज्ञासा को खत्म कर दिया है, जो कि मानव बुद्धिमत्ता का एक स्वाभाविक अंग है। सीटें सीमित हैं लेकिन कोचिंग सेंटर हर जगह फैले हुए हैं। वे वर्षों तक छात्रों के मन को एक ही ढर्रे में ढालते हैं, जिससे उनकी सोचने की शक्ति अवरुद्ध हो जाती है। इससे कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।”
