Bihar Polls में किसके लिए मुसीबत बनेंगे छोटे दल? तीसरा मोर्चा भी हो सकता है खड़ा

Role of small parties in Bihar elections: बिहार में चुनाव का बिगुल बज चुका है। अब देखना यह है कि इस बार के चुनाव में छोटे दल किस प्रकार अपनी भूमिका निभाते हैं और सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते हैं।

Role of small parties in Bihar elections
बिहार चुनाव 2020: क्या होगी छोटी पार्टियों की भूमिका 

मुख्य बातें

  • बिहार में इस बार करीब डेढ़ दर्जन छोटी पार्टियां चुनावी समर में ताल ठोंकती दिखेंगी
  • इन छोटी पार्टियों में जन अधिकारी पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM अहम हैं
  • राज्य में इस बार के विधानसभा चुनाव में जातियों का फिर दबदबा देखने को मिलेगा

नई दिल्ली : बिहार विधानसभा (Bihar Assembly Elections 2020) का चुनावी बिगुल बज गया है। सभी राजनीतिक दल एवं गठबंधन अपनी चुनावी रणनीति एवं सीट बंटवारे को अंतिम रूप देने के करीब हैं। राज्य में इस बार मुख्य मुकाबला एनडीए (NDA) और महागठबंधन के बीच है फिर भी कुछ ऐसे छोटे दल हैं जो प्रासंगिक होने पर दोनों गठबंधन के लिए मुसीबत बन सकते हैं। राज्य में इस बार करीब डेढ़ दर्जन छोटी पार्टियां हैं जो चुनाव लड़ती नजर आएंगी। हालांकि इन छोटे दलों का पिछला चुनावी रिकार्ड अच्छा नहीं रहा है। इन छोटे दलों में पप्पू यादव की जन अधिकारी पार्टी (JAP) और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम (AIMIM) शामिल है।

जाहिर है कि ये छोटे दल महागठबंधन और एनडीए के वोटों का बंटवारा करने के साथ उन्हें नुकसान पहुंचाएंगे। इस चुनाव में छोटी पार्टियों में सर्वाधिक चर्चा पप्पू यादव की जाप और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम की हो रही है। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ये दोनों ही पार्टियां कोई असर नहीं छोड़ पाई हैं। पप्पू यादव की पार्टी का प्रभाव कोसी क्षेत्र में माना जाता है जबकि ओवैसी की नजर सीमांचल की सीटों पर है।

सीमांचल में कई सीटें मुस्लिम बहुल हैं और कुछ सीटों के नतीजे मुस्लिम मतदाता तय करते हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए ओवैसी ने पिछला विस चुनाव लड़ा था लेकिन उनकी पार्टी कोई सीट नहीं जीत सकी। पिछले चुनाव में एआईएमआईएम को 0.2 फीसदी वोट मिले थे।

पप्पू यादव और यशवांत सिन्हा तीसरा मोर्चा की कोशिश में

पप्पू यादव की बात करें तो वह लोकसभा चुनावों के बाद से राज्य में लगातार सक्रिय हैं। वह बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, कोरोना संकट, बाढ़, प्रवासियों की स्थिति को लेकर नीतीश सरकार पर लगातार हमलावर रहे हैं। कृषि सुधार विधेयकों के खिलाफ उनकी पार्टी लगातार मुखर है। यादव को उम्मीद है कि इस बार के चुनाव में वह अच्छा प्रदर्शन करेंगे। पिछले विधानसभा चुनाव में जाप को महज 1.4 प्रतिशत वोट मिले थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा छोटे-छोटे 16 दलों के साथ लाकर तीसरा मोर्चा खड़ा करने की कोशिश में हैं। तो मुकेश साहनी वाली वीआईपी जैसे कुछ छोटे दल महागठबंधन के साथ हैं।

इस बार के चुनाव में जातियों का फिर होगा दबदबा

वाम दलों की अगर बात करें तो इन्होंने 2015 का चुनाव 243 सीटों पर लड़ा था और इस चुनाव में उन्हें चार फीसदी वोट मिले थे। सीपीआईएमएल लिबरेशन, भाकपा, माकपा, फारवर्ड ब्लाक सहित छह छोटे दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा था। इस बार के चुनाव में जातियों का फिर दबदबा देखने को मिलेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगड़ी, पिछड़ी और दलित समुदाय में पकड़ रखने वाला गठबंधन सत्ता के लिए जरूरी बहुमत के आंकड़े तक पहुंचेगा। राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता करीब 51 फीसदी, ओबीसी में यादव 14.4, कुर्मी-कुशवाहा 14.4, अति पिछड़ी जातियां 21% हैं। इनके अलावा दलित मतदाता 16 प्रतिशत, सवर्ण 17  प्रतिशत और मुस्लिम मतदाता 16.9 प्रतिशत हैं। राज्य में मुस्लिम एवं यादव मतदाता 31 प्रतिशत हैं जो एमवाई समीकरण बनाते हैं। इसी एमवाई समीकरण के बदौलत लालू यादव ने बिहार पर 15 सालों तक राज किया।

पिछले विधानसभा चुनाव की स्थिति

पिछले चुनाव में जदयू को 71 सीटें, भाजपा को 53 सीट, राजद को 80 सीट, कांग्रेस को 27 सीट, लोजपा को 2 सी, आरएलएसपी को 2 सीट, हम को 1 सीट और अन्य को 7 सीटें मिली थीं।

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