2 के फेर में फंसे आरजेडी-जद (यू), लालू की एंट्री बिगाड़ेगी नीतीश का खेल !

Bihar Election News: बिहार में 30 अक्टूबर को होने वाले उप चुनाव, राज्य की राजनीति पर बड़ा असर डाल सकते हैं। राजद को जहां नए समीकरण बनाकर सत्ता में वापसी की उम्मीद है, वहीं नीतीश कुमार दोनों सीटें जीतकर अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहते हैं।

Lalu Prasad Yadav and Nitish Kumar in bihar by election
बिहार उप चुनाव के परिणाम 2 नवंबर को आएंगे  |  तस्वीर साभार: ANI
मुख्य बातें
  • बिहार में 30 अक्टूबर को तारापुर, कुशेश्वरस्थान में उप चुनाव होने हैं। दोनो सीटें जद(यू) के पास थीं।
  • तेजस्वी यादव को चुनावों में जीत मिलने पर सबसे ज्यादा जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी से है।
  • राजद और कांग्रेस के संबंधों में जिस तरह कड़वाहट आई है, उससे कांग्रेस तेजस्वी की उम्मीदों पर पानी फेर सकती है।

Bihar By Election News: कहने को 243 विधान सभा सीटों वाले बिहार में 30 अक्टूबर को 2 सीटों के लिए उप चुनाव होना है। लेकिन जनता दल (यूनाइटेड) और राष्ट्रीय जनता दल के बीच लड़ाई ऐसी हो चली है कि 2 नवंबर (चुनाव परिणाम) का सभी का इंतजार है। इस लड़ाई को और अधिक रोचक राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) की एंट्री ने बना दिया है। वह सीधे दावा कर रहे हैं कि उप चुनावों में दोनों सीटें राजद जीतेगी और उसके बाद नीतीश की सरकार गिर जाएगी। वहीं उनके बेटे और विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव (Tejaswi Yadav) भी दावा कर रहे हैं कि 2 तारीख इंतजार कीजिए, सारी बातें अभी नहीं बताई जा सकती है। जाहिर है तेजस्वी भी अंदर ही अंदर कोई खिचड़ी पकने की उम्मीद कर रहे हैं।

2 सीटों से क्या गिर सकती है सरकार

अगर विधान सभा में सीटों की गणित देखा जाय तो नीतीश सरकार को सीधे तौर पर कोई खतरा नहीं दिखाई देता है। क्योंकि विधान सभा में बहुमत के लिए 122 सीटों की जरूरत है। और नीतीश कुमार (Nitish Kymar) के नेतृत्व वाले एनडीए को इस समय 126 सीटें प्राप्त हैं। इसमें बीजेपी को 74, जनता दल (यूनाइटेड) को 41, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) को  4, विकासशली इंसान पार्टी  को 4 सीटें है। इसके अलावा चुनाव बाद एलजेपी, बसपा और एक निर्दलीय विधायक जेडी (यू) के साथ है। जनता दल (यू) को नवंबर 2020 में हुए चुनावों में 43 सीटें मिली थी। लेकिन तारापुर, कुशेश्वरस्थान के 2 जेडीयू विधायकों की मौत की वजह से उसकी संख्या 41 रह गई है। और इन्हीं दो स्थानों पर उप चुनाव हो रहे है।

अब आरजेडी को यही से उम्मीद की किरण दिख रही है। क्योंकि अगर उसे उप चुनावों में दोनों सीटें मिल जाती हैं। तो उसकी संख्या 75 से बढ़कर 77 हो जाएगी। महागठबंधन के पास इस समय 110 सीटें हैं। और अगर उसे 2 सीटें मिल जाती हैं। तो राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन की 112 सीटें हो जाएगी। इसके बावजूद उसे कम से कम एनडीए की सरकार गिराने के लिए 10 सीटों की जरूरत पड़ेगी, जो इतना आसान नहीं दिखता है।

मांझी और सहनी क्या बदलेंगे पाला

लालू और तेजस्वी को सबसे ज्यादा उम्मीद हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतन राम मांझी और विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी से है। बीच-बीच में जिस तरह पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी नीतीश सरकार को अपनी अहमियत दिखाने की कोशिश करते हैं। उनके पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए भी राजद को उम्मीद है कि वह 2 नवंबर को परिणाम आने के बाद पाला बदल सकते हैं। हालांकि एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि वह वो नहीं चाहते कि तेजस्वी मुख्यमंत्री बने इसीलिए वो महागठबंधन छोड़कर एनडीए में आए और वो नीतीश कुमार के साथ हैं। 

तेजस्वी की दूसरी सबसे बड़ी उम्मीद मुकेश सहनी हैं। खास तौर से आज कल वह जिस तरह से भाजपा के खिलाफ सख्त रवैया अपनाए हुए हैं। उसे देखते हुए, उनके पाला बदलने की आस राजद को है। सहनी, उत्तर प्रदेश चुनावों में निषाद मतदाताओं के जरिए पैठ जमाना चाहते हैं। लेकिन भाजपा को यह रास नहीं आ रहा है। ऐसे में सहनी, भाजपा से नाराज बताए जा रहे हैं।

कांग्रेस क्या करेगी

उप चुनाव में कांग्रेस ने महागठबंधन से नाता तोड़ कर अपना उम्मीदवार खड़ा कर दिया है। ऐसे में चुनावों के बाद वह क्या महागठबंधन का साथ देगी, यह सबसे बड़ा सवाल है। कांग्रेस के कुल 19 विधायक हैं। अगर वह महागठबंधन से अलग हो जाती है, तो फिर महागठबंधन में विधायकों की संख्या 91 रह जाएगी। ऐसे में राजद के लिए सरकार बनाने  की कोई संभावना नहीं रह जाएगी। हालांकि लालू प्रसाद यादव के कांग्रेस  पर दिए गए बयान के बाद, जिस तरह सोनिया गांधी ने सुलह की कोशिश की है, ऐसे में इस बात की संभावना है कि कांग्रेस जरूरत पड़ने पर राजद का साथ दे सकती है। इसी तरह अगर दोनों सीटने के बाद ओवौसी भी बड़ा फैक्टर बनेंगे। AIMIM के पास 5 विधायक हैं। तेजस्वी को अपने  मंसूबे पूरा करने के लिए कई सारे गणित बैठाने होंगे। जो फिलहाल इतना आसान नहीं दिख रहा है। लेकिन अगर जद (यू) दोनों सीटें हारती है, तो यह साफ है कि बिहार की राजनीति में इसका दूरगामी असर पड़ेगा, भले ही उनकी सरकार को कोई खतरा नही रहे।

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