RTI कार्यकर्ता प्रफुल्ल सारडा द्वारा साझा किए गए नए RTI डेटा के मुताबिक, पिछले पांच वित्त वर्षों में बैंकों ने ₹6,15,647 करोड़ के बैड लोन राइट-ऑफ किए। इस आंकड़े की पुष्टि वित्त राज्य मंत्री ने संसद के शीतकालीन सत्र में दिए गए लिखित जवाब में की है। यह आंकड़ा पहले बताए गए ₹4.90 लाख करोड़ से काफी ज्यादा है, जिससे कर्ज वसूली और बड़े कॉरपोरेट डिफॉल्ट पर फिर सवाल खड़े हो गए हैं।
वर्ष-वार राइट-ऑफ का ब्यौरा:
FY 2020–21: ₹1,33,384 करोड़
FY 2021–22: ₹1,15,748 करोड़
FY 2022–23: ₹1,27,238 करोड़
FY 2023–24: ₹1,14,622 करोड़
FY 2024–25 (सितंबर 2025 तक): ₹1,24,655 करोड़
पहले के आंकड़ों से ज्यादा
इससे पहले Times Now की रिपोर्ट में पांच साल का राइट-ऑफ आंकड़ा ₹4,90,992 करोड़ बताया गया था। नए RTI डेटा में यह बढ़कर ₹6.15 लाख करोड़ हो गया है। RTI के मुताबिक, FY 2024–25 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) का राइट-ऑफ करीब 25% बढ़ा है।
राइट-ऑफ का मतलब क्या?
RTI और संसद के जवाब से यह भी साफ हुआ है कि राइट-ऑफ का मतलब कर्ज माफ करना नहीं होता। बैंकों की बैलेंस शीट से NPA हटाया जाता है, लेकिन कर्जदारों से वसूली की प्रक्रिया जारी रहती है।
वसूली पर सवाल
विपक्षी दलों ने बड़े कॉरपोरेट कर्ज राइट-ऑफ को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि सार्वजनिक पैसा डूब रहा है, जबकि वसूली कमजोर बनी हुई है। एक अन्य RTI के मुताबिक, 2014 से सितंबर 2024 तक बैंकों ने कुल ₹16.61 लाख करोड़ के NPA राइट-ऑफ किए हैं, जिसमें सरकारी, निजी और सहकारी बैंक शामिल हैं।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि राइट-ऑफ एक कानूनी और लेखा प्रक्रिया है। इससे कर्जदारों को राहत नहीं मिलती। कर्ज वसूली के लिए DRT, SARFAESI, NCLT और IBC जैसे कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं और कार्रवाई जारी रहती है।
