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21 भारतीय समाचार प्रकाशकों ने केंद्र सरकार के डेटा प्राइवेसी कानून को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती, जानिए क्या है मीडिया हाउसेस का मत?

India Privacy Law Supreme Court: डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) के 21 मीडिया हाउसों ने डेटा प्राइवेसी कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिका में प्रेस की स्वतंत्रता और खोजी पत्रकारिता पर खतरे की बात कही गई।

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21 भारतीय समाचार प्रकाशकों ने केंद्र सरकार के डेटा प्राइवेसी कानून को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती, जानिए क्या है मीडिया हाउसेस का मत?

DNPA Supreme Court Challenge: भारत के 21 प्रमुख डिजिटल समाचार प्रकाशकों के समूह- डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने केंद्र सरकार के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। रॉयटर्स के अनुसार, 698 पन्नों की इस याचिका में तर्क दिया गया है कि यह कानून स्वतंत्र और खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) को पूरी तरह पंगु बना देगा और गोपनीय स्रोतों की पहचान को खतरे में डालेगा।

इस याचिका में देश के बड़े मीडिया समूह शामिल हैं, जिनमें मुकेश अंबानी की 'नेटवर्क18' (Network18), गौतम अडानी का 'एनडीटीवी' (NDTV), 'द इंडियन एक्सप्रेस' (The Indian Express) और 'टाइम्स इंटरनेट' (Times Internet) जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं।

मीडिया प्रकाशकों की 5 मुख्य चिंताएं:

सहमति का नियम और खोजी पत्रकारिता पर प्रहार:

याचिका के अनुसार, यदि किसी खोजी रिपोर्टिंग या घोटाले के खुलासा से पहले पत्रकार को संबंधित व्यक्ति से डेटा एकत्र करने की सहमति (Consent) लेनी होगी, तो आरोपी व्यक्ति सबूत मिटा सकता है और गवाहों को डरा-धमका सकता है। यह नियम खोजी पत्रकारिता की आत्मा पर सीधा प्रहार है।

समाचार हटाने का दबाव:

कानून लोगों को किसी भी समय अपनी सहमति वापस लेने और अपना व्यक्तिगत डेटा हटाने (Erase) का अधिकार देता है। सार्वजनिक हित (Public Interest) के लिए किसी अपवाद या छूट का प्रावधान न होने के कारण, मीडिया हाउसों को प्रकाशित हो चुकी तथ्यात्मक खबरों को हटाने या बदलने के लिए मजबूर किया जा सकता है।

पत्रकारों के लिए लिखित छूट का न होना:

यूरोपीय संघ (EU), ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देशों के डेटा प्राइवेसी कानूनों में पत्रकारों और मीडिया के लिए स्पष्ट छूट दी गई है। हालांकि अगस्त में सरकार ने मौखिक आश्वासन दिया था, लेकिन कानून में लिखित प्रावधान न होने से प्रकाशकों में भारी अनिश्चितता है।

गुप्त स्रोतों के उजागर होने का खतरा:

कानून का एक विवादास्पद प्रावधान केंद्र सरकार को किसी भी डेटा संस्था से जानकारी मांगने की असीमित शक्ति प्रदान करता है। DNPA का मानना है कि इससे सरकार न्यूज रूम से संवाददाताओं और व्हिसलब्लोअर्स (स्रोतों) की गोपनीय जानकारी मांग सकती है, जिससे भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोग आगे आने से डरेंगे।

सेंसरशिप और भारी जुर्माना:

केंद्रीय प्राधिकरण को गैर-अनुपालन पर भारी जुर्माना लगाने और 'जनहित' के नाम पर किसी भी जानकारी तक पहुंच को ब्लॉक (Block) करने का अधिकार दिया गया है। DNPA ने इसे 'अप्रत्यक्ष पूर्व-सेंसरशिप' करार दिया है, जो लोकतंत्र के लिए घातक है।

Nitin Arora
नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।

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