सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को त्रिपुरा के जमातिया कस्टमरी लॉ एक्ट, 2017 के एक प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर त्रिपुरा सरकार और त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) से जवाब मांगा। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कानून की धारा 143 गंभीर अपराधों, जिनमें बलात्कार भी शामिल है, को एक लाख रुपये तक का जुर्माना देकर समझौते के जरिए निपटाने की अनुमति देती है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मधुमिता भट्टाचार्य की ओर से दायर जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया।
कानून की धारा 143 को क्यों दी गई चुनौती?
याचिकाकर्ता ने जामातिया कस्टमरी लॉ एक्ट, 2017 की धारा 143 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है। याचिका के मुताबिक, इस प्रावधान को धारा 164 के साथ पढ़ने पर गंभीर अपराधों को जुर्माना देकर निजी समझौते के जरिए निपटाने का रास्ता खुलता है। इसमें अधिकतम एक लाख रुपये तक के जुर्माने का उल्लेख है।याचिका में कहा गया है कि बलात्कार जैसे गंभीर अपराध को आर्थिक भुगतान के जरिए निपटाने की अनुमति देना महिला की गरिमा और शारीरिक आजादी के खिलाफ है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ऐसे अपराध केवल दो व्यक्तियों के बीच का निजी विवाद नहीं होते, बल्कि पूरे समाज के खिलाफ अपराध हैं।
‘महिला की गरिमा की कीमत तय करने जैसा’
याचिका में कहा गया है कि अधिनियम की धारा 143 को धारा 164 के साथ पढ़ने पर महिला की गरिमा की कीमत तय करने जैसी स्थिति बनती है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि गंभीर यौन हिंसा के आरोपी को आर्थिक भुगतान के जरिए दायित्व से मुक्त करने की व्यवस्था आपराधिक न्याय के सिद्धांतों को कमजोर करती है। याचिका में यह भी कहा गया है कि बलात्कार, हत्या और डकैती जैसे गंभीर अपराधों को निजी विवाद मानकर आपसी समझौते से समाप्त नहीं किया जा सकता। ऐसे अपराधों का प्रभाव पीड़ित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और कानून-व्यवस्था पर भी पड़ता है।
छठी अनुसूची के अधिकारों की सीमा का सवाल
याचिका में संविधान की छठी अनुसूची का भी हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक, छठी अनुसूची का उद्देश्य जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक परंपराओं और भूमि संबंधी अधिकारों की रक्षा करना है। लेकिन याचिकाकर्ता का तर्क है कि इसके तहत मिलने वाली शक्तियां परंपरागत संस्थाओं को गंभीर अपराधों से संबंधित राष्ट्रीय आपराधिक कानूनों को दरकिनार करने का अधिकार नहीं देतीं।
याचिका में दावा किया गया है कि धारा 143 छठी अनुसूची के तहत उपलब्ध विधायी शक्तियों की सीमा से आगे जाती है और बलात्कार जैसे अपराधों के लिए समानांतर व्यवस्था तैयार करती है।
जनजातीय महिलाओं के साथ समानता के अधिकार का मुद्दा
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि यह प्रावधान मनमाना और असंवैधानिक वर्गीकरण पैदा करता है। याचिका के अनुसार, इससे जनजातीय महिलाओं को उनके भौगोलिक क्षेत्र और जनजातीय पहचान के आधार पर आपराधिक कानून के समान संरक्षण से वंचित किए जाने का खतरा है। याचिका में महिला की गरिमा, समानता और शारीरिक स्वायत्तता के अधिकारों का हवाला देते हुए धारा 143 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के ज्ञान सिंह बनाम पंजाब सरकार और मध्य प्रदेश सरकार बनाम मदनलाल फैसलों का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन फैसलों के सिद्धांतों के अनुसार बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों को निजी समझौते के जरिए समाप्त नहीं किया जा सकता। जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया गया है कि त्रिपुरा सरकार और संबंधित स्वायत्त जिला परिषद को कानून से जुड़े सभी प्रासंगिक रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश करने का निर्देश दिया जाए।फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर त्रिपुरा सरकार और TTAADC से जवाब मांगा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अदालत ने अभी धारा 143 की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। जुर्माने के जरिए बलात्कार के मामलों के निपटारे से जुड़ा दावा याचिका में उठाया गया मुद्दा है, जिस पर आगे सुनवाई के दौरान विचार किया जाएगा।
कौन है त्रिपुरा की जमातिया ट्राइब?
जमातिया कस्टमरी लॉ एक्ट, 2017 त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) द्वारा संविधान की छठी अनुसूची के तहत बनाया गया कानून है। इसका उद्देश्य त्रिपुरा के जमातिया जनजातीय समुदाय की पारंपरिक रीति-रिवाजों और विवाद निपटाने की व्यवस्थाओं को कानूनी रूप देना है। इस कानून में समुदाय की सामाजिक परंपराओं और पारंपरिक फैसले लेने की व्यवस्था से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। समुदाय के पारंपरिक निर्णायक या आध्यात्मिक-सामुदायिक नेताओं को ‘ओकरा’ कहा जाता है।इसी कानून की धारा 143 विवाद के केंद्र में है। इसका शीर्षक ‘महिला को बहला-फुसलाने और दुष्कर्म के लिए दंड’ है और इसमें संबंधित मामलों में आर्थिक दंड का उल्लेख है। धारा में यह भी कहा गया है कि ओकरा के फैसले से असंतुष्ट पक्ष उपयुक्त कानूनी मंच का रुख कर सकता है। याचिकाकर्ता का दावा है कि धारा 143 को कानून की धारा 164 के साथ पढ़ने पर दुष्कर्म से जुड़े मामलों में एक लाख रुपये तक के आर्थिक दंड की गुंजाइश बनती है। इसी आधार पर इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
जमातिया पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा के 19 अनुसूचित जनजातीय समूहों में से एक प्रमुख और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध आदिवासी समुदाय है। यह समुदाय अपनी अनूठी सामाजिक व्यवस्था, समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली इतिहास के लिए जाना जाता है। त्रिपुरी और रियांग समुदाय के बाद यह त्रिपुरा का तीसरा सबसे बड़ा जनजातीय समूह है।
