18वीं सदी के मशहूर दार्शनिक नीत्शे ने कहा था, कि अगर आप एक कॉकरोच को मारते हैं तो आप हीरो कहे जाएंगे और तितली को मारते हैं तो विलेन। नैतिकता के मानक सुंदरता से जुड़े होते हैं। कॉकरोच बीमारी फैलाते हैं, आपको घिनौने लग सकते हैं। लेकिन उसे अब शायद तितली के समकक्ष खड़ा करने का समय शायद आ गया है। कारण उसकी सुंदरता नहीं, हमारी सेहत से जुड़ा एक पहलू है। एक स्टडी कहती है कि कॉकरोच से मिलने वाले दूध में पारंपरिक दूध से कहीं अधिक पोषण होता है। जर्नल ऑफ द इंटरनेशनल यूनियन ऑफ क्रिस्टलोग्राफी में छपी एक रिपोर्ट कहती है कि यह चीज पृथ्वी पर सबसे अधिक पोषक तत्वों से भरपूर चीजों में से एक हो सकती है। आइए जानते हैं इसके बारे में।
क्या होता है कॉकरोच का दूध? (What Is Cockroach Milk)
डिप्लोप्टेरा फंक्टाटा एक कॉकरोच प्रजाति है, जो बच्चे पैदा करने के लिए जानी जाती है। इसमें दूध का उत्पादन करने की क्षमता होती है जिसमें प्रोटीन क्रिस्टल होते हैं। ये इसके बच्चों के लिए पोषण देते हैं। पारंपरिक डेयरी दूध के उलट, ये एक पीले रंग का तरल पदार्थ होता है। ये प्रोटीन, अमीनो एसिड और हेल्दी शुगर से भरपूर होता है, जो सेल्स की मरम्मत और विकास जैसे शारीरिक कार्यों के लिए आवश्यक है। शोधकर्ताओं ने पाया कि कॉकरोच के दूध में भैंस, गाय और इंसान के दूध की तुलना में तीन गुना अधिक कैलोरी होती है।
कॉकरोच के दूध का पोषण (Nutrition Of Cockroach Milk)
अभी कॉकरोच का दूध उतना पॉपुलर नहीं है कि इसके पोषण संबंधी जानकारियां दी जा सकें लेकिन कुछ रिसर्च बताती हैं कि 45% प्रोटीन, 25% कार्बोहाइड्रेट, 16 से 22% फैट और 5% एमिनो एसिड पाया जाता है। इसके अलावा इसमें लिनोलिक एसिड, ओलिक एसिड, ओमेगा 3 फैटी एसिड, विटामिन, मिनरल्स, शॉर्ट चेन और मीडियम चेन फैटी एसिड भी मौजूद होता है। इसके अलावा ये लैक्टोज फ्री होता है, इसलिए लैक्टोज इन्टॉलरेंट लोगों के लिए फायदेमंद होता है।
क्या कॉकरोच का दूध पिया जा सकता है? (Is Cockroach Milk Safe To Consume)
इसको लेकर सबसे बड़ी समस्या उत्पादन की है। कॉकरोच इस पदार्थ की केवल एक छोटी मात्रा बनाते हैं, जिससे इसका सेवन करने की बात लगभग असंभव हो जाती है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ कहता है कि, कॉकरोच के दूध में आम दूध की तुलना में बहुत अधिक ऊर्जा होती है, जो इसे एक सुपरफूड बना देता है। हालांकि अभी ये पीने के लिए उपलब्ध नहीं है। वैज्ञानिक भविष्य में कुछ जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए इसका उत्पादन बढ़ाने की उम्मीद जता रहे हैं।
