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जंग ईरान में, सन्नाटा ताइवान में: क्या इल्हा फॉर्मोसा में चीन कुछ बड़ा करने जा रहा है?

चीन, ताइवान (इल्हा फॉर्मोसा) को लेकर हमेशा से आक्रामक रहा है, उसके आसपास भारी सैन्य तैनाती किए रखता है, लेकिन हाल के दिनों में यहां चीनी सैन्य गतिविधियां कम हो गई हैं, जिससे ताइवान के साथ-साथ अमेरिका को भी परेशान दिख रहा है। आखिर चीन ने ईरान जंग के बीच ताइवान के पास अपनी आक्रमक गतिविधि क्यों रोक दी है?

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ताइवान पर चीन जताते रहा है अपना अधिकार
Curated by: Shishupal Kumar
Updated Mar 14, 2026, 16:06 IST

ईरान-इजराइल, अमेरिका जंग के बीच चीन ने अब एक ऐसी चाल चल दी है, जिसे लेकर दुनिया भर में हैरानी है। जिस ताइवान (इल्हा फॉर्मोसा*) को चीन अपना बताता रहा है, उसके आसपास युद्धपोत से लेकर फाइटर जेट तक और बमवर्षक विमान से लेकर जासूसी जहाज तक तैनात किए रहता था, अब वो अचानक से वहां नहीं दिख रहा है। इस क्षेत्र में तैनात अमेरिकी युद्धपोत से पहले ही ईरान के साथ जंग लड़ने के लिए मिडिल ईस्ट जा चुके हैं। ऐसे में सवाल यह है कि चीन तो जंग भी नहीं लड़ रहा है, फिर ताइवान के क्षेत्र से क्यों गायब है? जबकि आमतौर पर ऐसा होता नहीं है, कहीं ये आने वाले तूफान से पहले की शांति तो नहीं है, चीन कुछ बड़ा तो प्लान नहीं कर रहा है?

चिंता में अमेरिका

AP ने अपनी रिपोर्ट में इसपर विस्तार से जानकारी देते हुए लिखा है कि पिछले कई वर्षों से चीन नियमित रूप से अपने लड़ाकू विमान ताइवान की ओर उड़ाता रहा है। ताइवान एक स्वशासित द्वीप है, लेकिन चीन उसे अपना हिस्सा मानता है, इसलिए इन सैन्य उड़ानों को लेकर ताइपे से लेकर वॉशिंगटन तक चिंता बनी रहती है। हालांकि पिछले दो हफ्तों में इन उड़ानों की संख्या अचानक काफी कम हो गई है, जिससे विशेषज्ञ हैरान हैं कि चीन की सेना आखिर क्या योजना बना रही है। पूर्व अमेरिकी रक्षा अधिकारी ड्रू थॉम्पसन का कहना है कि जब चीन के इरादों को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं होती, तो अनिश्चितता और जोखिम दोनों बढ़ जाते हैं।

ताइवान के पास चीनी लड़ाकू विमान (फोटो- AP)

ताइवान के पास चीनी लड़ाकू विमान (फोटो- AP)

ताइवान सरकार रखती है खुद नजर

ताइवान का रक्षा मंत्रालय रोजाना चीन की वायु और नौसैनिक गतिविधियों की जानकारी जारी करता है, जिसमें आमतौर पर चीनी विमानों की उड़ान का नक्शा भी होता है। लेकिन हाल के दिनों में कई रिपोर्टों में नक्शा नहीं था, क्योंकि कोई विमान दिखाई ही नहीं दिया। ताइवान के अनुसार 27 फरवरी से 5 मार्च तक उसके एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन ज़ोन में चीन का एक भी सैन्य विमान नहीं आया। पिछले दो दिनों में कुछ उड़ानें फिर दिखीं- बुधवार को तीन और गुरुवार को दो। इस तरह पिछले दो हफ्तों में कुल सात उड़ानें दर्ज हुईं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 92 उड़ानें हुई थीं।

ट्रंप के दौरे के कारण चीन हटा या फिर कोई बड़ी सैन्य रणनीति है?

  1. चीन की संसद की वार्षिक बैठक के दौरान पहले भी सैन्य गतिविधियां कुछ कम देखी गई हैं, लेकिन इस बार गिरावट पहले से कहीं ज्यादा है।
  2. एक संभावना यह भी है कि चीन अमेरिका के साथ तनाव कम करना चाहता हो।
  3. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 31 मार्च से 2 अप्रैल के बीच चीन की यात्रा करने वाले हैं।
  4. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप चीन को मुख्य रूप से आर्थिक प्रतिद्वंद्वी मानते हैं, न कि बड़ी सुरक्षा चुनौती।
  5. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अपनी सैन्य रणनीति और प्रशिक्षण के नए चरण पर काम कर रहा है।
  6. संभव है कि चीन की वायुसेना, नौसेना और थलसेना मिलकर संयुक्त सैन्य अभ्यास का नया मॉडल आजमा रही हों।
  7. ऐसे अभ्यास ताइवान से दूर किए जा सकते हैं, ताकि दूसरे देश उनकी निगरानी न कर सकें।
  8. यही कारण हो सकता है कि हाल के दिनों में ताइवान के आसपास चीनी विमानों की गतिविधि कम दिखाई दे रही है।

ताइवान अचंभित लेकिन सतर्क

ताइवान चीन के इस कदम पर अचंभित तो है, लेकिन सतर्क है। ताइवान अपनी रक्षा के लिए वही रणनीति अपना रहा है, जिसपर वो पहले से चलते रहा है। उसमें उसने कोई ढील नहीं दी है। ताइवान के रक्षा मंत्री वेलिंगटन कू ने कहा कि चीन की नौसेना अब भी आसपास के समुद्र में सक्रिय है। उन्होंने कहा कि सिर्फ इस आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि विमान नहीं दिख रहे हैं। ताइवान की सेना चीन की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए है।

चीन ताइवान विवाद

चीन ताइवान विवाद

जब होते-होते रुकी है जंग

चीन और ताइवान के बीच सीधे बड़े युद्ध तो नहीं हुए, लेकिन कई बार गंभीर सैन्य टकराव और तनाव पैदा हुए हैं। 1950 के दशक में दो बड़े संकट हुए, जिन्हें First Taiwan Strait Crisis और Second Taiwan Strait Crisis कहा जाता है। इन दौरान चीन ने ताइवान के नियंत्रण वाले द्वीपों पर गोलाबारी की, जबकि अमेरिका ने ताइवान का समर्थन किया। इसके बाद 1995–96 में Third Taiwan Strait Crisis हुआ, जब चीन ने ताइवान के आसपास मिसाइल परीक्षण किए और अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत क्षेत्र में भेज दिए।

एशिया की सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक समस्या

चीन-ताइवान विवाद की शुरुआत वर्ष 1949 में चीन के गृहयुद्ध के बाद हुई। उस समय कम्युनिस्ट नेताओं ने मुख्य भूमि चीन पर सत्ता स्थापित कर ली, जबकि राष्ट्रवादी सरकार और उसके समर्थक ताइवान द्वीप पर जाकर बस गए और वहीं अपनी अलग सरकार चलाने लगे। इसके बाद से ताइवान में अलग प्रशासन, अपनी सेना और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था विकसित हो गई। हालांकि चीन आज भी ताइवान को अपना ही हिस्सा मानता है और कहता है कि भविष्य में उसका एकीकरण मुख्य भूमि चीन के साथ होना चाहिए। दूसरी ओर ताइवान के कई लोग खुद को अलग पहचान वाला क्षेत्र मानते हैं और अपनी वर्तमान व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं। इसी मुद्दे को लेकर दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से राजनीतिक और सैन्य तनाव बना हुआ है। चीन अक्सर ताइवान के आसपास सैन्य अभ्यास और लड़ाकू विमानों की उड़ानें करता है, जबकि ताइवान अपनी सुरक्षा मजबूत करता रहता है। यही कारण है कि यह विवाद आज भी एशिया की सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक समस्याओं में गिना जाता है।

*फॉर्मोसा- पुर्तगाली नाविकों ने 16वीं सदी में ताइवान को देखकर इसे इल्हा फॉर्मोसा यानी “सुंदर द्वीप” कहा था।

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