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ईरान को बर्बाद करने के चक्कर में चीन-रूस को कैसे आबाद कर रहा अमेरिका? अधर में लटके ताइवान- साउथ कोरिया

अमेरिका का ईरान के साथ जंग में बहुत कुछ दांव पर लगा है। उसकी सैन्य शक्ति से लेकर आर्थिक ताकत तक के कमजोर होने के दावे किए जा रहे हैं, जिनमें सच्चाई भी दिख रही है। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अमेरिका ने ईरान से जंग शुरू करके अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार ली है, क्योंकि इससे सीधा फायदा चीन और रूस को हो रहा है, जो अमेरिका के चिर प्रतिद्वंदी हैं।

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ईरान जंग से कैसे मजबूत हो रहा चीन-रूस
Authored by: Shishupal Kumar
Updated Mar 13, 2026, 18:12 IST

अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला किया, कहा गया कि जंग एक-दो दिन में खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सुप्रीम लीडर के मारे जाने के बाद भी ईरान आज न केवल कई दिनों से लड़ रहा है, बल्कि अमेरिका और इजराइल को कड़ी टक्कर भी दे रहा है। हाल यह हो गया है कि अमेरिका के पास खाड़ी देशों में एयर डिफेंस की कमी दिखने लगी है, जिसे पूरा करने के लिए वो साउथ कोरिया में लगाए गए एयर डिफेंस को मंगवा रहा है। जिन युद्धपोतों को वो साउथ चाइन सी में तैनात कर रखा था, अब वह मिडिल ईस्ट में जंग में उलझे हैं। ऐसे में न केवल साउथ कोरिया बल्कि ताइवान भी असुरक्षित दिख रहा है। वहीं रूस तेल के क्षेत्र में एक बार फिर से बेताज बादशाह की ओर अग्रसर है। ऐसे में सवाल ये है कि अमेरिका ने ईरान के साथ जंग में जाकर कहीं अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार ली। क्योंकि इस जंग से उसके दो सबसे ताकतवर दुश्मन और ताकतवर होने की राह पर हैं।

चीन कैसे हो रहा मजबूत?

चीन आर्थिक और सैन्य दोनों ही क्षेत्र में ईरान जंग से मजबूत हो रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार युद्ध से पहले अमेरिकी सैन्य कमांडरों ने दक्षिण चीन सागर से एक कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को मध्य पूर्व की ओर मोड़ दिया था। जिससे ताइवान के मामले पर चीन को सीधा फायदा है। ताइवान अमेरिका की बदौलत ही चीन को आंखें दिखाते रहा है, लेकिन अब अमेरिकी युद्धपोत उसके पास से जा चुके हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार इस हफ्ते अमेरिका एशिया से आधुनिक हवाई सुरक्षा प्रणालियों को हटाकर ईरान के ड्रोन और रॉकेटों से सुरक्षा को मजबूत करने के लिए भेज रहा है। इन हटाए गए हथियारों में पैट्रियट मिसाइलें और दक्षिण कोरिया में THAAD प्रणाली के इंटरसेप्टर शामिल हैं- दक्षिण कोरिया एकमात्र ऐसा एशियाई सहयोगी है जिसने इस उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणाली को अपने यहां जगह दी है, जिसे अमेरिका ने उत्तर कोरिया के बढ़ते मिसाइल खतरे का मुकाबला करने के लिए तैनात किया था। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, अब पहली बार, इसके इंटरसेप्टरों को वहां से हटाया जा रहा है, इसके बाद लॉन्चरों को भी हटा दिया जाएगा। अब जहां ताइवान के मामले चीन को बढ़त दिख रही है तो वहीं साउथ कोरिया के मामले में नॉर्थ कोरिया को, जो चीन का घनिष्ठ मित्र देश है। पश्चिमी प्रतिबंधों और युद्ध की स्थिति में ईरान अक्सर अपना तेल कम कीमत पर बेचता है। चीन पहले से ही ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है, इसलिए उसे वैश्विक बाजार से कम कीमत पर ऊर्जा मिल सकती है, जिससे उसकी उद्योग और विनिर्माण लागत कम रहती है। संघर्ष के कारण तेल और गैस की कीमतें बढ़ने से अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ेगा, जबकि चीन इस मामले में इनसे मजबूत स्थिति में होगा।

साउथ चीइना सी में अमेरिकी युद्धपोत (फाइल फोटो- AP)

साउथ चीइना सी में अमेरिकी युद्धपोत (फाइल फोटो- AP)

कहां कमजोर पड़ रहा अमेरिका?

ईरान के साथ जंग में जाने के फैसले को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की देश के भीतर भी जमकर आलोचना हो रही है। ट्रंप लाख दावे करें, लेकिन सच यही है कि अभी ईरान के साथ जंग के दो हफ्ते भी ठीक से नहीं हुए हैं और अमेरिका अपने दोस्तों के यहां लगाए गए हथियार हटाने लगा है। क्यों- अपने आप को बचाने के लिए, उस मिडिल ईस्ट में मौजूद बेसों को बचाने के लिए, जिन्हें वो सालों से अभेद्य किले के रूप में बताते रहा है। अधिकारियों और विश्लेषकों का मानना है कि यह युद्ध अमेरिकी प्रभाव को कमजोर करेगा, अमेरिका के पतन के बारे में चीन के तर्कों को बल देगा, और मध्यम-शक्ति वाले देशों के बीच हथियारों की होड़ को तेज करेगा।

  • अमेरिकी सैन्य कमांडरों ने 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' को बताया है कि वे हथियारों के घटते भंडार और उन्हें अन्यत्र भेजे जाने को लेकर चिंतित हैं, जिसका असर कई क्षेत्रों पर पड़ रहा है। एशिया में, अमेरिका के सहयोगी इस कमी को बहुत शिद्दत से महसूस कर रहे हैं, क्योंकि वे चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति और क्षेत्र में उसकी लगातार आक्रामक होती गतिविधियों का मुकाबला करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
  • दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने अपने मंत्रिमंडल से कहा कि हालांकि उनकी सरकार पेंटागन द्वारा हवाई सुरक्षा प्रणालियों को वहां से हटाए जाने का विरोध करती है, "लेकिन यह भी एक ऐसी सच्चाई है जिसे नकारा नहीं जा सकता कि इस मामले में हमारी मर्ज़ी पूरी तरह से नहीं चल सकती।"
  • राष्ट्रपति बाइडन के कार्यकाल में हिंद-प्रशांत सुरक्षा मामलों के पूर्व सहायक रक्षा सचिव रहे एली रैटनर ने कहा, "कोरिया से हवाई सुरक्षा प्रणालियों को हटाना ऐसे समय में एक बहुत ही बुरा संकेत देता है, जब सियोल में पहले से ही ट्रंप प्रशासन की एशिया के प्रति डगमगाती प्रतिबद्धता को लेकर भारी चिंताएं मौजूद हैं।"
  • ताइवान में इस बात की चिंता है कि युद्ध से स्थिति और भी बदतर हो जाएगी। गोला-बारूद की कमी के कारण अमेरिका की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाएगी, और ताइवान की सरकार के लिए ज्यादा अमेरिकी हथियार खरीदने के लिए रक्षा बजट में बढ़ोतरी को सही ठहराना और भी मुश्किल हो जाएगा।
  • इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से हथियारों और वायु रक्षा प्रणालियों को हटाने से यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिकी सैन्य क्षमता में गहराई की कमी है, और यह स्थिति कई लोगों की अपेक्षा से भी अधिक गंभीर है। अमेरिका के इस कदम से उसके ऊपर, उसके ही दोस्तों का भरोसा कम हुआ है।
पैट्रियट मिसाइल सिस्टम (फाइल फोटो- AP)

पैट्रियट मिसाइल सिस्टम (फाइल फोटो- AP)

रूस के लिए फायदा ही फायदा

यूक्रेन के साथ जंग के कारण रूस कई प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। जिसमें तेल का निर्यात भी शामिल है। रूस तेल का बड़ा निर्यातक है लेकिन प्रतिबंधों के कारण भारत जैसे देश भी उससे दूर होने लगे थे, लेकिन अब अमेरिका की मजबूरी हो गई है कि वो वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन को बचाने के लिए रूस से तेल खरीदने पर छूट दे। अमेरिका खुलकर कह चुका है कि रूस से तेल खरीदें। ऐसे में रूस को सीधा फायदा हो रहा है। जिस यूक्रेन को अमेरिका और यूरोप हथियारों की सप्लाई कर रहे थे, अब वो खुद को बचाने में लगाएंगे, मतलब यूक्रेन के मामले पर भी रूस को सीधा फायदा हो रहा है। बाजार में अमेरिकी हथियारों की कमी को रूस पूरा कर सकता है, मतलब उसके हथियारों के बाजार भी फायदे में जाता दिख रहा है।

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