Justice Varma Cash Case: कभी दिल्ली हाईकोर्ट में जज रहे जस्टिस यशवंत वर्मा पर अब महाभियोग का खतरा मंडराने लगा है। जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से कैश बरामद होने के बाद उन्हें वापस इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया था। हालांकि उनके खिलाफ मामले की जांच होने तक उन्हें न्यायिक कार्यवाही से दूर ही रखा गया है, फिर भी जस्टिस वर्मा के कारण न्यायपालिका की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है और उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ तक इस मामले पर आलोचनात्मक रूख दिखा चुके हैं। खबर है कि सरकार जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है। अब जस्टिस वर्मा के सामने महाभियोग से बचने के एक ही रास्ते हैं...! सबसे पहले जानते हैं कि महाभियोग है क्या?
महाभियोग प्रस्ताव क्या है?
महाभियोग प्रस्ताव (Impeachment Motion) न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही बनाए रखने के लिए एक संवैधानिक व्यवस्था है, जिसके तहत किसी सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के न्यायाधीश को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, किसी न्यायाधीश को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया तभी शुरू की जा सकती है जब उस पर "सिद्ध कदाचार" या "अक्षमता" का आरोप हो। इस प्रक्रिया के अंतर्गत संसद के दोनों सदनों द्वारा एक ही सत्र में प्रस्ताव को पारित किया जाना आवश्यक है। इसके पश्चात, राष्ट्रपति को संबंधित न्यायाधीश को पद से हटाने का अधिकार प्राप्त होता है।
जस्टिस वर्मा कैश कांड क्या है
जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड एक गंभीर न्यायिक भ्रष्टाचार प्रकरण माना जा रहा है, जो 14 मार्च 2025 को दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने के बाद सामने आया। इस घटना के दौरान, दमकलकर्मियों ने उनके आवास में बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी पाई, जिससे पूरे न्यायिक समुदाय में हड़कंप मच गया। जिसके बाद जस्टिस वर्मा को दिल्ली उच्च न्यायालय में किसी भी न्यायिक कार्य हटा दिया। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 20 मार्च 2025 को जस्टिस वर्मा को उनके मूल न्यायालय, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया।
| चरण | प्रक्रिया |
|---|---|
| 1. | संसद के किसी एक सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में प्रस्ताव लाया जाता है। |
| 2. | प्रस्ताव पर लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों, और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। |
| 3. | प्रस्ताव स्पीकर या सभापति को सौंपा जाता है। यदि वह स्वीकार करते हैं, तो एक 3 सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है। |
| 4. | समिति जज के खिलाफ आरोपों की जांच करती है। अगर वह जज को दोषी पाती है, तो रिपोर्ट संसद में रखी जाती है। |
| 5. | इसके बाद संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव को दो-तिहाई बहुमत से पास करना होता है (दोनों उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से)। |
| 6. | यदि प्रस्ताव पास हो जाता है, तो राष्ट्रपति जज को पद से हटा सकते हैं। |
जांच में क्या निकला
भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने 20 मार्च 2025 को जस्टिस वर्मा के खिलाफ एक तीन सदस्यीय आंतरिक जांच समिति गठित की। इस समिति में पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति शील नागू, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी. एस. संधावालिया, और कर्नाटक उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति अनु शिवरामन शामिल हैं। जांच के बाद भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए कहा था, जो नकदी बरामदी से जुड़े विवाद में फंसे हैं। न्यायमूर्ति खन्ना की रिपोर्ट मामले की जांच करने वाले तीन न्यायाधीशों की आंतरिक समिति के निष्कर्षों पर आधारित थी। सूत्रों ने पहले बताया था कि न्यायमूर्ति खन्ना ने वर्मा को इस्तीफा देने के लिए कहा था, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था। हालांकि, न्यायाधीश ने नकदी को लेकर अनभिज्ञता जाहिर की थी, लेकिन उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति ने कई गवाहों से पूछताछ और उनके बयान दर्ज करने के बाद उन्हें आरोपित किया था।
सरकार ने क्या कहा
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने पिछले सप्ताह कहा था कि मौजूदा मामला ‘थोड़ा अलग’ है, क्योंकि तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश खन्ना द्वारा गठित आंतरिक समिति पहले ही अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी है। उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए इस मामले में क्या करना है, हम इस पर फैसला लेंगे।’’ मंत्री ने कहा कि प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए, लेकिन पहले से की गई जांच को कैसे एकीकृत किया जाए, इस पर निर्णय लेने की जरूरत है। रीजीजू ने कहा कि नियम के अनुसार, एक समिति का गठन किया जाना चाहिए और फिर समिति को एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है, जिसे सदन में पेश किया जाएगा और न्यायाधीश को पद से हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा शुरू होगी। उन्होंने कहा कि इस मामले में संसद द्वारा नहीं, बल्कि पहले से ही एक समिति का गठन किया गया है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसका गठन प्रधान न्यायाधीश ने किया था। न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत एक समिति का गठन अनिवार्य रूप से किए जाने से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए रीजीजू ने कहा कि इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष निर्णय लेंगे। उन्होंने कहा कि आंतरिक समिति की रिपोर्ट और कानून के तहत रिपोर्ट का मिलान करना ‘गौण मामला’ है। प्राथमिक उद्देश्य पद से हटाने का प्रस्ताव लाना है।

सुप्रीम कोर्ट का एक्शन
महाभियोग से बचने के लिए जस्टिस वर्मा के पास विकल्प
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के पास संसद द्वारा पद से हटाने के लिये चलाई जाने वाली कार्यवाही से बचने का एकमात्र विकल्प इस्तीफा है। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और उन्हें हटाने की प्रक्रिया से अवगत अधिकारियों ने बताया कि किसी भी सदन में सांसदों के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए न्यायमूर्ति वर्मा यह घोषणा कर सकते हैं कि वह पद छोड़ रहे हैं और उनके मौखिक बयान को उनका इस्तीफा माना जाएगा। अगर वह इस्तीफा देने का फैसला करते हैं, तो उन्हें सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर पेंशन और अन्य लाभ मिलेंगे। लेकिन अगर उन्हें संसद द्वारा हटाया जाता है, तो उन्हें पेंशन और अन्य लाभों से वंचित कर दिया जाएगा। संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, उच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित पत्र लिखकर अपना पद त्याग सकता है। न्यायाधीश के त्यागपत्र के लिए किसी अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती। एक साधारण त्यागपत्र ही पर्याप्त है। न्यायाधीश पद छोड़ने के लिए संभावित तिथि बता सकता है। ऐसे मामलों में न्यायाधीश पद पर बने रहने के अंतिम दिन की तिथि के रूप में उल्लिखित दिनांक से पहले अपना त्यागपत्र वापस ले सकता है। संसद द्वारा हटाया जाना न्यायाधीश को पद से हटाने का दूसरा तरीका है।
महाभियोग प्रस्ताव कैसे करता है काम
किसी न्यायाधीश को पद से हटाने से संबंधित प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में से किसी में भी लाया जा सकता है। प्रस्ताव पर राज्यसभा में कम से कम 50 सदस्यों को हस्ताक्षर करने होते हैं। लोकसभा में 100 सदस्यों को इसका समर्थन करना होता है। न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार, जब किसी न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव किसी भी सदन में स्वीकार कर लिया जाता है, तो अध्यक्ष या सभापति, जैसी भी स्थिति हो, तीन-सदस्यीय एक समिति का गठन करेंगे, जो उन आधारों की जांच करेगी, जिनके आधार पर उन्हें हटाने की मांग की गई है। समिति में भारत के प्रधान न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, 25 उच्च न्यायालयों में से किसी एक के मुख्य न्यायाधीश और एक ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ शामिल होते हैं।
