Sudarshan Faakir ने लिखा, जयदेव ने म्‍यूजिक दिया, 42 साल पहले बना था गाना 'Zindagi Mere Ghar Aana'

Zindagi Mere Ghar Aana: स्‍टार प्‍लस के नए सीरियल 'जिंदगी मेरे घर आना' का टाइटल सॉन्‍ग चर्चा में है। ये गाना संगीतकार जयदेव ने 42 साल पहले तैयार किया था। अब नए गाने को श्रेया घोषाल ने गाया है।

Zindagi Mere Ghar Aana
Zindagi Mere Ghar Aana  

मुख्य बातें

  • स्‍टार प्‍लस का नया सीरियल जिंदगी मेरे घर आना 26 जुलाई से शुरू हो रहा है।
  • इस सीरियल में अभिनेत्री ईशा कंसारा और अभिनेता हसन जैदी लीड रोल में हैं।
  • 'जिंदगी मेरे घर आना' का टाइटल सॉन्‍ग बॉलीवुड की एक पुरानी फ‍िल्‍म से ल‍िया है।

Zindagi Mere Ghar Aana Serial Title Track Story: "मेरे घर का सीधा सा इतना पता है, ये घर जो है चारों तरफ से खुला है। न दस्तक ज़रूरी, न आवाज़ देना। मेरे घर का दरवाज़ा कोई नहीं है, हैं दीवारें गुम और छत भी नहीं है। बड़ी धूप है दोस्त, कड़ी धूप है दोस्त, तेरे आँचल का साया चुरा के जीना है, जीना जीना ज़िन्दगी ज़िन्दगी, ओ ज़िन्दगी मेरे घर आना।" इस दिल को छू जाने वाले उस गाने के बोल हैं जिसे आज से 42 साल पहले कलमबद्ध किया गया था।

हिंदी सिनेमा को अनगिनत सदाबहार गीत देने वाले जयदेव का यह गाना 1979 में आई फ‍िल्‍म दूरियां में शामिल था। इस गाने को जाने माने कवि, शायर सुदर्शन फाकिर (Sudarshan Faakir) ने लिखा था। सुदर्शन फाकिर की गजलें बेगम अख्‍तर और जगजीत सिंह ने खूब गाईं। 1934 में जालंधर में पैदा हुए सुदर्शन की कई गजलों को बॉलीवुड की फ‍िल्‍मों में शामिल किया गया। इस गाने को आवाज दी थी भूपिंदर सिंह और अनुराधा पौडवाल ने।  

42 साल बाद ये गाना एक बार फ‍िर चर्चा में हैं और इसकी वजह से स्‍टार प्‍लस का नया सीरियल 'जिंदगी मेरे घर आना' (Zindagi Mere Ghar Aana) जोकि 26 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। अदाकारा ईशा कंसारा (esha kansara) और हसन जैदी (Hasan Zaidi) के लीड रोल वाला यह सीरियल अपने खूबसूरत प्रोमो और टाइटल सॉन्‍ग को लेकर चर्चा में हैं। इस गाने का टाइटल सॉन्‍ग वही है जो 1979 में फ‍िल्‍म दूरियां में था, बस इसे हल्‍का सा रिक्रिएट किया गया है। सीरियल के टाइटल ट्रैक को जानी मानी गायिका श्रेया घोषाल ने आवाज दी है। मेकर्स ने यूट्यूब पर पूरा गाना जारी किया तो वाकई बहुत दिलकश है।  

कौन थे जयदेव 

3 अगस्‍त 1918 को केन्‍या के नैरोबी में पैदा हुए जयदेव अपने परिवार के साथ लुधियाना में रहने लगे थे। साल 1933 में जब वह 15 साल के थे तो घर से एक्‍टर बनने मुंबई भाग गए। यहां उन्‍होंने आठ फ‍िल्‍मों में चाइल्‍ड आर्टिस्‍ट का किरदार निभाया। उसके बाद उन्‍होंने संगीत की शिक्षा ली। पिता की आंखों की रोशनी चली गई तो वह वापस लुधियाना आ गए। कुछ समय बाद पिता का निधन हो गया तो वापस सपना पूरा करने मुंबई पहुंचे और म्‍यूजिक डायरेक्‍टर एवं कंपोजर बन गए। पहले वह एसडी बर्मन के असिस्‍टेंट रहे और फ‍िर चेतन आदंन की फ‍िल्‍म जोरू का भाई से म्‍यूजिक डायरेक्‍टर। 

तीन बार जीता नेशनल अवार्ड 

जयदेव हिंदी सिनेमा के पहले म्‍यूजिक डायरेक्‍टर थे जिन्‍हें तीन नेशनल अवॉर्ड मिले थे। उन्‍होंने कई फ‍िल्‍मों में गाने दिए, संगीतबद्ध किए। उनकी फ‍िल्‍मों की बात करें तो हम दोनों, किनारे किनारे, मुझे जीने दो, रेशमा और शेरा, गमन जैसी दर्जनों फ‍िल्‍में थीं। आंखी, गमन एवं रेशमां और शेरा के ल‍िए उन्‍हें नेशनल अवॉर्ड मिला।

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