Bhuj The Pride of India Review: 1971 युद्ध के रोमांच का जबरदस्त डोज, ऐसी है भुज-द प्राइड ऑफ इंडिया फिल्म

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भुज फिल्म रिव्यू: अजय देवगन-स्टारर भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया, 1971 के भारत-पाक युद्ध पर बनाई गई है, लेकिन तड़कते-भड़कते डायलॉग, उथले किरदारों और युद्ध के माहौल वाले ओवरडोज ने मजा किरकिरा कर दिया है।

Film Review of Bhuj The Pride of India
भुज द प्राइड ऑफ इंडिया फिल्म रिव्यू  |  तस्वीर साभार: Instagram

मुख्य बातें

  • अजय देवगन की फिल्म भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया हुई रिलीज
  • ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध की कहानी पर आधारित
  • दिलेर वायुसेना अफसर और आम लोगों की देशभक्ति से जुड़ी सच्ची घटना की कहानी

Bhuj Movie Review in Hindi: अजय देवगन अभिनीत अभिषेक दुधैया की फिल्म 'भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया' स्वतंत्रता दिवस से पहले रिलीज़ हुई है। यह फिल्म 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान एक पीरियड वॉर ड्रामा है। वर्तमान में डिज़नी + हॉटस्टार पर स्ट्रीमिंग फिल्म भारतीय वायुसेना की यात्रा का एक काल्पनिक पुनर्कथन है। स्क्वाड्रन लीडर विजय कार्णिक (अजय देवगन), भुज हवाई अड्डे के तत्कालीन प्रभारी थे, जिन्होंने अपनी टीम के साथ और माधापार के स्थानीय गांव की 300 महिलाओं की मदद से, पाकिस्तानी सेना द्वारा बार-बार बमबारी से नष्ट हुए IAF बेस का पुनर्निर्माण किया था।

स्क्वाड्रन लीडर विजय ने दुश्मन सैनिकों को भारतीय क्षेत्र पर कब्जा करने से रोकने की कोशिश कर रही सेना तक पहुंचने में महत्वपूर्ण बैकअप में मदद की थी।

यह घटना अपने आप में सिनेमा के लिए एक शानदार पहलू है कि कैसे नागरिकों की वीरता ने स्वतंत्रता के बाद से दो पड़ोसी देशों के बीच चल रहे एक क्षेत्रीय युद्ध में महत्वपूर्ण जमीन खोने से बचाने में भारतीय सेना की मदद की। हालांकि, कागज पर सुनने में यह कहानी जितनी आकर्षक लगती है, फिल्म काफी हद तक लड़खड़ाती नजर आती है और वैसी अमिट छाप नहीं छोड़ पाती जैसी कि इससे अपेक्षा की जा रही थी।

अजय देवगन, संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा, शरद लेक्लर, अम्मी विर्क, प्रणिता सुभाष और नोरा फतेही जैसे स्टार कास्ट के साथ, फिल्म अद्भुत काम कर सकती थी।

कहानी जिस तरह से आगे बढ़ती है, वह वास्तविकता से बिल्कुल अलग है और गाने व डांस सीन का अनावश्यक रूप से आना फिल्म के मूड को खराब कर देता है। जहां पीरियड फिल्में और युद्ध नाटक आजकल यथार्थवादी अंदाज लेते जा रहे हैं, वहीं भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया इससे थोड़ी दूर है।

मुख्य कलाकारों के अलावा, बड़े कलाकारों की टीम बिना तैयारी के काम करती महसूस होती है। प्रभावी ढंग से एक युद्ध की कहानी जीवंत नहीं हो पाती। कहानी कहने की शैली अत्यधिक नाटकीय है, जिसमें महिलाएं युद्ध के बीच में टूटे हुए रनवे की मरम्मत करते समय भक्ति गीतों की ओर चली जाती हैं, या एक सैनिक कई दुश्मनों को मार डालता है।

फिल्म में वीएफएक्स और एनीमेशन का काम पास करने योग्य है और अजय देवगन, संजय दत्त और एक हद तक शरद केलकर को भी अपनी वीरता दिखाने के लिए पर्याप्त क्षण मिलते हैं। अगर आप एक नए स्वतंत्रता दिवस मनोरंजन की तलाश में हैं, तो वीकेंड का मजा लेने के लिए यह फिल्म देख सकते हैं।

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