इलेक्शन

चीन के मुद्दे पर राहुल गांधी को सुनाई खरी-खोटी, पीओके के लिए भी एस. जयशंकर ने कह दी ये बड़ी बात; पढ़ें Exclusive इंटरव्यू की खास बातें

Public Manch: चुनाव की सरगर्मी क्या बढ़ी PoK पर चर्चा गर्म हो गई है। अब हर ओर से आवाज उठ रही है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी भारत में शामिल हो जाना चाहिए। टाइम्स नाउ नवभारत और टाइम्स नाउ की ग्रुप एडिटर इन चीफ नाविका कुमार के हर सवाल पर का जवाब एस. जयशंकर ने पब्लिक मंच पर दिया।

S Jaishankar Exclusive Interview With Navika Kumar: भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने टाइम्स नाउ नवभारत से बात करते हुए कहा कि पूरे देश में PoK के बारे में इंटरेस्ट है, जो पूरे देश में लग रहा है कि भाई आज पाकिस्तान की हालत देखिए। केंद्रीय मंत्री जयशंकर ने इस दौरान राहुल गांधी पर भी तीखी टिप्पणी की। भारत और चीन के बीच रिश्ते को लेकर विपक्ष मोदी सरकार पर सवाल उठा रहा है, इसी बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत-चीन संबंधों को लेकर खुलकर बात की।

राहुल गांधी पर विदेश मंत्री एस जयशंकर का हमला

टाइम्स नाउ नवभारत के खास शो पब्लिक मंच में टाइम्स नाउ और टाइम्स नाउ नवभारत की ग्रुप एडिटर-इन-चीफ नाविका कुमार से बात करते हुए केंद्रीय विदेश मंत्री और भाजपा नेता एस जयशंकर ने पाकिस्तान और पीओके के मुद्दे पर खुलकर बात की। उन्होंने चीन से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए कांग्रेस पर जमकर हमला बोला। विदेश मंत्री ने कहा कि वो (राहुल गांधी) तो चीन को इतना समझते हैं कि चीन के राजदूत के साथ सीक्रेट मीटिंग करते हैं। तो हो सकता है सीक्रेट मीटिंग में कुछ जानकारी तो मिली होगी न, तो इसीलिए इतना अच्छा समझते हैं। नीचे पढ़ें पूरा इंटरव्यू...।

नाविका कुमार, ग्रुप एडिटर इन चीफ: हेलो गुड, ईवनिंग, नमस्कार... आज मेरे साथ पब्लिक मंच पर हैं विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर, आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई एस जयशंकर जी और तालियों की गड़गड़ाहट से पता चल रहा है की पब्लिक बहुत उत्सुक है सवालों के लिए और सवालों से ज्यादा आपके जवाबों के लिए, क्योंकि आपको कहा जाता है वो सेंचुरी वाला बैट्समैन जो आता है डबल सेंचुरी लगाता है।

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री: थैंक यू। मुझे भी बहुत खुशी है कि मैं आज आपके साथ यहां बैठ पाऊं और इन सब के सामने समय मिलने का मैं तो आभार प्रकट करता हूं। ये समय है कि हमें अपना विषय जो है, पब्लिक के सामने रखना चाहिए और यही हम दोनों लोग आज कर रहे हैं।

नाविका कुमार: बिल्कुल पब्लिक मंच है और ये हमारे साथ जो बैठे हैं, ये फर्स्ट टाइम वोटर्स हैं और फर्स्ट टाइम वोटर्स अपना मन बना रहे हैं। और इनसे कुछ खास पहले कहना चाहेंगे, इससे पहले की मैं सवालों की झड़ी लगाऊं? इनसे कुछ कहना चाहेंगे आप?

एस जयशंकर: नहीं मैं बस इनको इतना कहूंगा कि मुझे भी याद है जब मैं पहला फर्स्ट टाइम वोटर था, 1977 का चुनाव था, ये पहला चुनाव था, इमरजेंसी के बाद, तो अभी भी जब मैं चुनाव के, जब भी मैं चुनाव के बारे में सोचता हूं, कोई भी अपने अनुभव के हिसाब से चलता है, तो उस समय हम लोग तो यूनिवर्सिटी में थे, हमने तो मन बना लिया था उस समय, मुझे लगता है आप लोगों ने, बहुत लोगों ने मन बना लिया होगा।

नाविका कुमार: चलिए जिनका मन बन चुका है वो अपनी जगह, लेकिन जिनका नहीं मन बना है। तो आज शुरू करते हैं सवालों की झड़ी से और पहला सवाल तो मैं आपसे पूछूंगी जयशंकर जी कि मोदी सरकार की जब बात होती है और पिछले 10 सालों की जब बात होती है तो बहुत बहुत ज्यादा बात होती है कि भारत का कद दुनिया में कितना बढ़ा। और इस इस चीज की भी बात होती है कि विदेश मंत्रालय ने जिस तरह से भारत के कद को बढ़ाने में अपना एक योगदान दिया है, आप इसे कैसे देखते हैं? आपका बेस्ट मोमेंट और सबसे ज्यादा चैलेंजिंग मोमेंट। अगर आज आप पब्लिक को बताएं।

एस जयशंकर: नाविका जी, मैं तो सहमत हूं आपसे कि पिछले 10 साल में अगर देश की प्रतिष्ठा, जिस परिपेक्ष से दुनिया हमें देखती है, उसमें एक बहुत बड़ा परिवर्तन तो आया है। मैं बिल्कुल सहमत हूं आपसे इसके बहुत कारण हैं, एक नहीं है। एक है कि कोई भी देश अपने लीडर, अपने नेता की छवि से जाना जाता है। तो हम लोगों का सौभाग्य है कि पिछले 10 साल में, क्योंकि मोदी जी इतने एक्टिव रहे, उन्होंने अपनी बात देश की बात दुनिया के सामने रखी, उसका हमें जरूर फायदा तो मिला है। दूसरा पहलू जो है वो है कि देश की इस दशक में हमारी क्षमताएं भी बढ़ीं हैं, हमारे योगदान बढ़े हैं। अगर आप देखें कि कोविड के समय में, महामारी के समय में हम लोगों ने दुनिया की कितनी सहायता की, करीब सौ देशों को हमने वैक्सीन पहुंचाया। तो ऐसी चीजें जो हैं वो दुनिया को जरूर छू जाती हैं। मतलब घटना के बाद भी लोग याद रखते हैं कि संकट के समय में किसने साथ दिया, किसने याद किया, किसने नहीं किया। तो हमारे कर्मों का आज एक किस्म से उसका इम्पैक्ट जो है वो दुनिया में दिखाई दे रहा है। मैं यह भी कहूंगा कि हमारी युवा पीढ़ी और जो हमारे अलग-अलग क्षेत्रों में जो भी हमारे टैलेंट जो हैं अगर आप चंद्रयान की बात करें या 5G की बात करें या जो जिस स्पीड से आज हमारे यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ रहा है, जो बाहर के इन्वेस्टमेंट जो आ रहे हैं तो लोगों को लगता है कहीं कि ये देश जो कोविड के बाद फिर से 7 परसेंट ग्रोथ रेट पर वापस पहुंचा है जहां इतनी सारी चीजें हो रही हैं, जो भी बड़ी डिबेट कुछ भी दुनिया में कुछ होता है तो दुनिया जानना चाहती है कि भाई भारत भारत का क्या मत है। तो ये सब मेरे खयाल से अलग अलग इनका इम्पैक्ट होता है और हम जो हैं विदेश नीति विदेश मंत्रालय में हम एक किस्म से फ्रंट एंड हैं। हमें सबका सपोर्ट मिलता है। तो जब हम लोग जब दुनिया में जाते हैं तो हमारा आज कल जो इम्पैक्ट जो है दुनिया पर, प्रभाव जो है वो ज्यादा होता है।

नाविका कुमार: कोई ऐसा मोमेंट जो आपको लगा बहुत चैलेंजिंग है और आपके लिए पर्सनली उसको नेविगेट करना, आपको लगा कि पहले मुश्किल था और आपने कैसे किया?

एस जयशंकर: किसी की बात करूं तो मैं G20 का करूंगा, कि G20 के समय में यूक्रेन के विषय में इतना विवाद था कि लोग अनुमान करते थे कि हम जो हैं G20 की सर्व सहमति बना नहीं पाएंगे, उसका रिजल्ट नहीं निकलेगा। और पूरे साल काम करने के बाद अगर मान लीजिए हम दिल्ली में सबको एक साथ नहीं ला पाए तो उसकी अपनी मुश्किलें होती हैं। G20 जिस तरीके से, क्योंकि बीच-बीच में लगता था कि इतना बड़ा गल्फ था, गैप था पश्चिमी देशों और रूस के बीच में, चीन का मत भी थोड़ा झुकाव जो था वो रूस की तरफ था। तो इतना बड़ा गैप था, हमारी जिम्मेदारी थी। हम लोग बहुत क्लियर थे तो किसी न किसी तरीके से हमको इसे सफल बनाना ही बनाना है। तो उसका बोझ तो होता है, तो टेंशन तो हुई थी। और आखिर में जब मीटिंग हुई थी सितम्बर में वो आखिर के 2-3 दिन जो है, मैं कहूंगा बहुत ही टेंशन थी। हम लोग बहुत लोग जो हैं 1-2 दिन तो हम बिना सोए नेगोशिएट करते रहे।

नाविका कुमार: और अंत में जो होता है अच्छे के लिए होता है। सवाल आप से पूछूंगी क्योंकि इलेक्शन का समय है और इन दिनों सोशल मीडिया पर एक अलग तरह की वॉर नजर आती है और ये वॉर है कि बीजेपी का एक विज्ञापन है जिसमें कहा पापा ने वार रुकवा दी। इस सेंटेंस का इस्तेमाल हुआ। और दूसरी तरफ अपोजिशन की रैलियों में मीम्स बनाए जा रहे हैं इस बात के, कि अगर तब वार रुकवा दी अपने लोग बाहर निकाल लिए, तो गाजा और इजराल की वॉर भी रुकवा देते। ये अपोजिशन का कहना है।

एस जयशंकर: देखिए अगर आप मुझसे पूछें कि वार रुकवा दी, तो मेरा जवाब है हां। कैसे रुकवाई मैं खुद साक्षी हूं। मैं आपको डेट बता सकता हूं, टाइम बता सकता हूं, बात सकता हूं कि कितनी देर के लिए रुकी और बता सकता हूं कि कैसे किया, किसके लिए किया? ये किया दो बार, एक बार मार्च 5 को खारकीव में जब हमारे विद्यार्थी जो हैं शहर के बाहर जा रहे थे। एक सेफ जोन था सेफ जोन के अगल-बगल में शेलिंग हो रही थी, रशियन आर्मी शेलिंग कर रही थी। तो मोदी जी ने राष्ट्रपति पुतिन को फोन किया और उन्हें कहा कि कृपया शेलिंग बंद करवाइए, क्योंकि हम लोगों के बीच में यह समझौता है कि हम सेफ जोन जाएंगे। तो कुछ समय के बाद वो शेलिंग रुक गई, और वो लोग वहां जा पाए। जो दूसरी घटना जो थी और वो और जटिल विषय था। ये मार्च 8 को हुआ, ये मार्च 8 की सुबह से शाम तक हुआ। एक जगह थी जहां यूक्रेन रशिया और एक प्राइवेट मिलिशिया थी इनफॉर्मल मिलिशिया वो आपस में फायरिंग कर रहे थे और हमारे स्टूडेंट्स जो थे वो चाहते थे कि वो वहां से निकले और एक बार हमारा प्रयास हुआ। वो प्रयास असफल था क्योंकि जैसे ही वो लोग बस में बैठे फायरिंग फिर से शुरू हो गई। तो उनको बस छोड़कर हॉस्टल जाना पड़ा। तो अगली बार हम लोग गए पीएम के पास और कहा कि देखें इसमें दो चीजें हमें करनी होंगी। एक तो वहां के विद्यार्थी जो हैं उनका मनोबल इतना डाउन था कि हम दिल्ली से कुछ सीनियर अफसर भेजेंगे जो वहां तक जाएंगे ताकि स्टूडेंट को लगे कि अगर दिल्ली से कोई वहां तक आया है तो हम वहां से दिल्ली पहुंच सकते हैं। तो ये हमारा लॉजिक था और हमारे 2 सीनियर अफसर जो रूसी बोलते थे वो वहां तक गए। दूसरा जो है हमें रुकवाना था और रास्ता बनाना था कि क्योंकि हमें रोड तो पता था, तो 3-4 विकल्प थे इसमें, पर जब तक रूस और वो प्राइवेट मिलिशिया कि सहमति न बने कि उस रोड पर उस दिन पूरे दिन फायरिंग नहीं होगी, जब तक हमारे लोग नहीं निकालेंगे तब तक हम रिस्क नहीं ले सकते थे। तो इसमें हम लोग मोदी जी के पास गए और जब हमने एक्सप्लेन किया तो उन्होंने उसके पहले राष्ट्रपति पुतिन से बात की, राष्ट्रपति जेलेंस्की से बात की। उन्होंने अपनी फौज को कहा की आप इंडियन रेप्रेजेंटेटिव के साथ इसमें कुछ हल ढूंढ़िए। तो दोनों लोग, और वो मिलिशिया ने मिलकर हम लोगों ने एक सैनिटाइज्ड पाथवे बनाया, उस पाथवे में वो बस में बैठ के वो लोग आए। तो अगर आप पूछ रहे हैं कि मुझे पता है या नहीं है या जानकारी, भाई हम लोगों का काम था।

नाविका कुमार: और ये हुआ है सच में..?

एस जयशंकर: बिल्कुल मैं साक्षी हूं, वो स्टूडेंट निकले ना वहां से। अब ये सोचिए कि सुमी के जो भी स्टूडेंट हैं वो आपको बता सकते हैं कि उस रात तक, उस सुबह तक फायरिंग हो रही थी, उस दिन जब उनको निकालना था, फायरिंग बंद हो गई। तो किसी ने तो रुकवाया होगा ना। क्योंकि रात तक अगर फायरिंग हो रही थी, उनके निकलने के समय में फायरिंग बंद हो गई थी। तो कुछ तो हुआ होगा, अपने आप तो नहीं हुआ।

नाविका कुमार: बड़ी बात कह रहे हैं जयशंकर जी, लेकिन जयशंकर जी, जो विपक्ष रोज सवाल ऐसी बातों पर खड़ा करता है, उन्हें क्या कहेंगे आप?

एस जयशंकर: उन्हें मुझे क्या कहना है वो, तो वोटर कहेगा ना उनको, वोटर कहेगा। जवाब तो वोटर देगा उनको।

नाविका कुमार: और अगर वोटर ने वो किया जो राहुल गांधी कह रहे हैं कि 150 सीटें ही आएंगी?

एस जयशंकर: देखिए, वोटर राहुल गांधी को पहचानते हैं, आपको भी पहचानना चाहिए।

नाविका कुमार: मैं आप से सवाल एक और करूंगी क्योंकि अबाला में मोदी जी ने कहा के इस वक्त जिस तरह की सरकार है, दुश्मन 10 बार सोचता है, अगर सरकार बदलती है तो विदेश नीति भी बदलती है। मैं पूछना चाहती हूं, पहले जमाने में कहा जाता था सरकारों में परिवर्तन पर फॉरन पॉलिसी जो है वो स्टेबल रहती है।

एस जयशंकर: वो गलत था, शुरू से गलत था। वो उस समय के लोग अपने स्वार्थ और अपने हित के लिए कहते थे, पर गलत थ।, मैं नहीं मानता मैं आपको समझा सकता हूं क्यूं।

नाविका कुमार: बताइए क्यों?

एस जयशंकर: ये आप सोचिए एक तो लोग कहते हैं कि जो भी सरकार हो विदेश नीति पर सहमति। ये कहते हैं ना? आप जानते हैं कि जब हमारी चीन के बारे में नीति बन रही थी, नेहरू की नीति जो है उसका सरदार पटेल ने विरोध किया, उनके उप-प्रधान मंत्री थे, उन्होंने विरोध किया, नेहरू की कैबिनेट में बहुत सारे मंत्री ऐसे थे जिन्होंने विरोध किया। बाद में जब 1962 में जब अक्साई चिन की रोड बनी और चाइना ने 1-2 आक्रमण किए उस समय। अगर आप संसद में देखें बहुत बहस हुई, पंडित नेहरू की चाइना पॉलिसी पर बहुत आलोचना हुई। तो ये कहना की शुरू से सहमति थी और कहीं सहमति आज बिगड़ गई है पहले से परंपरा थी, ये सच नहीं है। आप पाकिस्तान का लीजिए। अगर उस समय भी जब नेहरू और लियाकत अली खान के बीच में पैक्ट हुआ कि दोनों देश जो हैं अपने अल्पसंख्यकों की देखभाल करेंगे, उस समय एक मिनिस्टर थे उन्होंने विरोध किया, श्यामा प्रसाद मुखर्जी। नेहरू की अमेरिका पॉलिसी का डॉक्टर अंबेडकर ने विरोध किया। तो ये नहीं है। उसके बाद देखें नेहरू तो चलिए इतिहास हैं, अगर सरकार कोई भी होती, फॉरेन पॉलिसी एक ही होती, जब तक अटल जी आए किसी की हिम्मत नहीं थी न्यूक्लियर ऑप्शन एक्सरसाइज करने की। आपके लॉजिक में अटल जी भी नहीं करते, जब तक मोदी जी नहीं आए किसी की हिम्मत नहीं थी की LoC पार करके इंटरनेशनल बाउंडरी पार करके आतंकवाद का जवाब देना। तो आपके लॉजिक से जो मोदी जी को वही करना चाहिए था, जो 26/11 के वक्त किया, मुंबई में। मतलब कुछ नहीं किया। तो हमको आपके लॉजिक से हमें पुलवामा भी झेलना है, उरी भी झेलना है, हर चीज झेलनी है, क्योंकि हमें पाकिस्तान की ज्यादा परवाह है। तो ये देखिये, आपको गुमराह कर रहे हैं कि अरे सब विदेश नीति में एक सर्व सहमति थी, हमारा सब का मत एक ही था, ये बोगस है।

नाविका कुमार: और फारूक अब्दुल्ला? वो तो अब भी कहते हैं कि हमें देखना चाहिए कि पाकिस्तान चूड़ियां पहनकर नहीं बैठा, उनके पास एटम बम है।

एस जयशंकर: देखिए वो अब मैं क्या कहूं। उस परिवार में कहीं पाकिस्तान के बारे में इतनी फीलिंग है, वो पाकिस्तान की इतनी कद्र करते हैं? हम लोगों को पूछना चाहिए कि जो कहीं भारत का बल, भारत की क्षमता कोई कम है क्या आज? दुनिया जानती है।

नाविका कुमार: तो आप कह रहे हैं कि उनकी फीलिंग्स भारत की तरफ कम हैं, पाकिस्तान की तरफ ज्यादा हैं?

एस जयशंकर: मैं ये कह रहा हूं जब पूरे देश में, जब पूरे देश में PoK के बारे में इंटरेस्ट है, जो पूरे देश में लग रहा है कि भाई आज पाकिस्तान की हालत देखिए, जब कोई डॉक्टर फारूक जैसे नेता जो हैं, विपरीत दिशा में जाते हैं। सोचने की बात तो है ना। है ना या नहीं है?

नाविका कुमार: पब्लिक क्या कह रही है? सोचने की बात है कि ये लोग अलग बात क्यों कह रहे हैं? हां या ना?

एस जयशंकर: और वो अकेले नहीं हैं, मणिशंकर अय्यर भी हैं साथ। अब आप जानते हैं कांग्रेस पार्टी में, वो बोलते रहेंगे, जब थोड़ी प्रॉब्लम हो जाती है, वो कहते हैं नहीं-नहीं, वो हमारा ओपिनियन नहीं है, वो उनका पर्सनल है। तो सैम पित्रोदा का पर्सनल है, मणिशंकर अय्यर का पर्सनल है। जब भी चलता है तो पर्सनल नहीं है, नहीं चलता तो पर्सनल है।

नाविका कुमार: लेकिन राहुल गांधी जी कहते हैं कि सब देशों के साथ आपने

एस जयशंकर: वो तो अपनी बात को भी इनकार कर देते हैं। वो कहते हैं बीच में कि राहुल गांधी मर गया, ये अलग राहुल गांधी हैं, उनका पुनर्जन्म हो जाता है।

नाविका कुमार: लेकिन वो कहते हैं चीन शायद आप समझते नहीं ठीक से, आपके बारे में कहते हैं क्योंकि चीन के साथ हमारे रिश्ते सही नहीं हुए।

एस जयशंकर: देखिए वो तो चीन को इतना समझते हैं कि चीन के राजदूत के साथ सीक्रेट मीटिंग करते हैं। तो हो सकता है सीक्रेट मीटिंग में कुछ जानकारी तो मिली होगी न, तो इसीलिए इतना अच्छा समझते हैं।

नाविका कुमार: लेकिन जब आपको कहते हैं कि आप चीन नहीं समझ पाते। आपको लगता है कि राहुल गांधी की एक पाठशाला होनी चाहिए?

एस जयशंकर: अब देखिए राहुल गांधी जी को जून 4 के बाद सोचना तो होगा की क्या चलाएं, कहां चलाएं, किधर चलाएं। तो एक आइडिया है, आपकी पाठशाला चलाएं।

नाविका कुमार: लेकिन पाठशाला में स्टूडेंट कौन होगा?

एस जयशंकर: अब वो नॉर्मली कहते हैं ना जैसा टीचर है, स्टूडेंट भी वैसे ढूंढ़ने होंगे। अब पता नहीं कहां से ढूंढ़ेंगे। वोटर्स में तो नहीं मिलेंगे उनको स्टूडेंट

नाविका कुमार: मैं आपसे ये भी सवाल पूछना चाहती हूं कि प्रधानमंत्री ने मुझे एक इंटरव्यू में कहा। और ये सबके सामने भी आया है कि बाहर के देशों का हमारे देश पर एक नैरेटिव बनाने का एक सिलसिला चल रहा है और ये इलेक्शन के दौरान भी चल रहा है। खास करके तब, जब अरविंद केजरीवाल को अरेस्ट किया गया तो UN द्वारा, US स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा और जर्मनी द्वारा कुछ स्टेटमेंट कहे गए। आपको लगता है कि हमारे देश के इलेक्शन में कोई विदेशी इंटरफियरेंस या विदेशी इन्फ्लुएंस है?

एस जयशंकर: देखिए मेरा कहना है चुनाव के पहले भी कि काफी समय से, 10 साल से। 10 साल भी नहीं, मैं उससे आगे की भी बात कर सकता हूं, कि दुनिया में एक विचारधारा है और वो विचारधारा भारत में भी है, दुनिया में भी है। लोग जो उस सोच के हैं, वो एक दूसरे की मदद करते हैं। ये आजकल ग्लोबलाइज्ड पॉलिटिक्स है। तो जब उनको लगता है कि उनके साथियों की राजनीतिक स्थिति भारत में अच्छी न हो, जब वोटर उनको रिजेक्ट कर देता है तो उनको लगता है भाई बाहर से कुछ ऑक्सीजन सपोर्ट देना चाहिए, तो वो देते रहते हैं। ज्यादातर इसका जो माध्यम है, ये प्रेस होता है। ये आपका प्रोफेशन है जो ज्यादातर ये करता है। अगर आप देखें पिछले 10 साल से, जब से मोदी सरकार आई है, वेस्टर्न प्रेस, उसकी एक लिबरल वेस्टर्न, लिबरल लेफ्ट प्रेस जो है वो बार-बार हर विषय पर अटैक करती रहेगी, आलोचना करती रहेगी। ये होगा कि आपकी कोविड हैंडलिंग ठीक नहीं है, आपकी इकोनॉमिक हैंडलिंग ठीक नहीं है, आपकी किसानों के लिए पॉलिसी ठीक नहीं है। तो कुछ भी अगर आप देखें, 10 चीजें हैं, अरे कम से कम 5 में, तो मेरा निर्णय ठीक होगा ना? मैं नहीं कहता की हर समय हम ठीक हैं, हमसे कभी गलती नहीं होती, होती है सबसे होती है। पर अगर आप वेस्टर्न प्रेस को देखें, वेस्टर्न प्रेस जो है उसने एक किस्म से एक पूरा नेरेटिव सेट करने की कोशिश की है, हर चीज पर वो आएंगे और आपको एक नेगेटिव व्यू पाइंट देंगे। आज कल का है कि आपका इलेक्शन ठीक नहीं है, आपका इलेक्शन कमीशन ठीक नहीं है, आपके इलेक्शन रूल्स ठीक नहीं है, आपकी प्रक्रिया ठीक नहीं है, आपके यहां गर्मी बहुत ज्यादा है। अरे भाई गर्मी ज्यादा है? सालों से मई-जून में इलेक्शन हो रहे हैं। पहली बार तो नहीं हुआ ना। पहली बार ये गर्मी नहीं हुई ना, पहले भी थी।

नाविका कुमार: ये शायद गर्मी चुनाव की है। जो आप लोगों को जेल में डाल देते हैं, शायद उसकी बात हो रही थी।

एस जयशंकर: देखिए, ऐसा है एक तो है ये पश्चिमी देश, बहुत सारे, इनको दुनिया के बारे में कमेंट करने की पुरानी आदत है। आदत क्यों है? क्योंकि एक समय में इनकी चलती थी। हर जगह जब वो कुछ कहते थे, दूसरे लोग घबरा जाते थे। तो अब दुनिया बदल गई है, पर वो नहीं बदले ना। उनकी आदतें जो हैं वो चलती गईं।

नाविका कुमार: आप अमेरिका के बारे में कह रहे हैं?

एस जयशंकर: नहीं, मैं पूरी पश्चिमी दुनिया के बारे में कह रहा हूं।

नाविका कुमार: अमेरिका के साथ तो हमारे रिश्ते अच्छे हैं।

एस जयशंकर: जर्मनी के साथ भी अच्छे हैं, UN के साथ भी अच्छा है। अच्छे रिश्ते की बात नहीं है, ये है कि ये पश्चिमी दुनिया में ये विचारधारा है। मैं नहीं कहता कि हर विचारधारा का नेता या उसका सोर्स कोड जो है, वहां के प्रेसिडेंट या प्राइम मिनिस्टर या फॉरेन मिनिस्ट्री का हो। मैं नहीं कह रहा, पर मैं कह रहा हूं कि उनके यहां ये थिंकिंग है कुछ लोगों में, ये प्रेस में ज्यादा है। और आपके प्रेस वाले जो हैं उनके यहां प्रवक्ता के पास पहुंच जाते हैं और कहते हैं अच्छा भाई, बताइए मुझे, इंडिया में ये हुआ, आपके कमेंट क्या है? तो जरूर कहेंगे क्योंकि आप तो उनसे पूछ रहे हैं। आप तो भड़का रहे हैं उनको।

नाविका कुमार: मैं सवाल एक और पूछना चाहती हूं और आप ही का एक स्टेटमेंट है, आपने कहा मेरे पिताजी नौकरशाही में थे, वो सेक्रेटरी बन गए। हम आपके लिए ये बाइट आप की ही प्ले करना चाहते हैं और इस पर मेरा सवाल है।

एस जयशंकर: मेरे पिता एक डेमोक्रेट थे और सचिव बन गए थे, लेकिन उन्हें उनके पद से हटा दिया गया था, जब 1980 में इंदिरा गांधी दोबारा चुनी गईं, तो वह पहले सचिव थे जिन्हें उन्होंने हटाया था।

नाविका कुमार: तो आपका कहना है कि कांग्रेस party vindictive है?

एस जयशंकर: नहीं, मेरा आपने जो एक शब्द दिखाया आप सब लोगों को जानना चाहिए. मैं जो इंटर्व्यूअर को समझा रहा था उन्होंने मेरे से पूछा की आपके मन में था पॉलिटिक सेंटर करने का आप कभी मंत्री बनना चाह रहे थे। तो मैंने उनको कहा नहीं नहीं आप मेरी फैमिली बैकग्राउंड समझिए हमारे परिवार में क्योंकि हम ज्यादातर बेरोक्रेटिक लोग हैं। लोगों ने गवमेंट सर्विस की है। हमारे परिवार में सबसे बड़ा लक्ष्य जो था वो सेक्रेटरी बनने का था, क्योंकि मेरे पिताजी जो थे वो कुछ ही समय के लिए सेक्रेटरी बन पाए उनके पास काफी सर्विस था उसके बाद आरोप, क्योंकि 7 साल उन्होंने, उसके बाद वो फिफ्टी वन थे। जब सेक्रेटरी बने और फिर उनको हटाया गया तो घर में कम से कम उनको थोड़ी निराशा तो थी। यह तो स्वाभाविक है। तो उनके लिए अपने बच्चे अगर सेक्रेटरी बन जाए, यह बहुत गर्व का विषय है। तो मेरे बड़े भाई जो हैं मेरे से सीनियर हैं, वो भी सर्विस में थे, वो मेरे से पहले सेक्रेटरी बने और मेरे पिता जी, उस समय वो जिंदा थे, उनके लिए बहुत गर्व का विषय था। तो मेरा कहना इतना ही था कि मेरा ड्रीम एम्बिशन था फौरन सेक्रेटरी बनने का मेरा उससे ज्यादा कुछ नहीं था। कहने का तात्पर्य विदेश मंत्री बनने का मैंने सपने में भी कभी सोचा नहीं था।

नाविका कुमार: सोचा नहीं था तो ये सोच फिर आई कैसे?

एस जयशंकर: वो मेरे दिमाग में नहीं आया, न किसी और के दिमाग में आया।

नाविका कुमार: तो आपको फोन कॉल आया बातचीत हुई?

एस जयशंकर: उन्होंने मुझे बुलाया और बात की, मेरे से डायरेक्टली बात की। जैसे आप बैठे हैं उनके मन में था, मेरे मन में नहीं था।

नाविका कुमार: जब उन्होंने आपसे कहा तो कितना समय लगा आपको माइंड मेकअप करने में?

एस जयशंकर: देखिये मोदी जी बहुत विचारशील हैं उनको भी लगा कि उन्होंने मेरा आश्चर्य तो देखा होगा न, फेस पे है, फेस पे देखा होगा। तो उन्होंने मेरे से बात की, जो उनके मन में था, वो बताया, फिर कहा कि आप सोच कर मुझे बताएं।

नाविका कुमार: आप तो फौरन सेक्रेटरी उनके साथ काम कर चुके थे। तो आप उनको जानते थे, वो आपको जानते थे तो फिर उसके बाद कितना समय लगा सोच के बताने में?

एस जयशंकर: हमारी जो बात हुई कैबिनेट शपथ ग्रहण के कुछ ही दिन पहले उतना समय नहीं था निर्णय लेने के लिए मैं कुछ दिनों की बात कर रहा हूं।

नाविका कुमार: 24 घंटे 48 घंटे?

एस जयशंकर: मोटा मोटा ऐसा ही कुछ।

नाविका कुमार: 24 घंटे

एस जयशंकर: जो भी था।

नाविका कुमार: और 24 घंटे सोच विचार करके अब आप काम कर रहे हैं और 24*7 काम करना पड़ता है?

एस जयशंकर: नहीं, वो तो 24*7 पहले भी करना पड़ता था। अगर मोदी जी के साथ है तो ट्वेंटी थ्री सिक्स नहीं चलता, ट्वेंटी फोर सेवन ही चलता है।

नाविका कुमार: बहुत बड़ी बात आपने कही, लेकिन लोग अब भी यही कहते हैं की जो फौरन वेस्टर्न नैरेटिव की हम बात कर रहे हैं। कुछ समय पहले हमने देखा यूएस की 1 यूनिवर्सिटी में छात्रों ने प्रोटेस्ट किया। गाजा और इजराइल के बीच की लड़ाई की क्या एक्शन था वो भारत के बारे में हमेशा हमें पाठ पढ़ाते हैं ह्यूमन राइट्स का आपको लगता है कहीं न कहीं दोनों में डिस्कनेक्ट।

एस जयशंकर: देखिये मेरे मन में जरूर उस समय ये अनुभव था कि हमारे यहां जब सीए के बाद कुछ लोगों ने नारेबाजी की, कहीं ट्रैफिक रोका, कुछ प्रदर्शन किए जो भी पब्लिक डिसॉर्डर, जो क्रिएट किया, तो उस समय हमें बहुत बाहर से ज्ञान मिलता था की ये डेमोक्रेसी में जो भी वो करे आपको ये झेलना होगा आपको भी वो समय याद होगा बिल्कुल काफी लम्बा चला था।

नाविका कुमार: लगभग 1 साल

एस जयशंकर: मुझे इतना ही लगा की जब अमेरिका में आप देख रहे थे की लोगों ने यूनिवर्सिटीज जो उनका वहां जो व्यवहार जो था और उसमें पब्लिक नॉर्मल यूनिवर्सिटीज की फंक्शनिंग में उसका क्या असर हुआ। तो जब उनका समय आया और उनको कुछ निर्णय लेना पड़ा तो उन्होंने ले लिया और जो निर्णय लिया और जो हमें ज्ञान दिया वो अलग अलग था। तो हमारा भी बनता है कि अगर मैं आपको ये बताऊं और कल जब आपकी बारी होती है, आप कुछ और करते हैं, आप वही करते हैं जो आपने मुझे कहा कि नहीं करना चाहिए।

नाविका कुमार: तो आज कुछ ज्ञान देना चाहेंगे?

एस जयशंकर: नहीं ज्ञान तो हम लोग दे चुके न तरीके से हम लोग देते हैं कुछ न कुछ कहते हैं जिनको सुनना वो समझ लेते हैं।

नाविका कुमार: क्या ज्ञान दिया?

एस जयशंकर: नहीं हमने इतना कहा की देखिये डेमोक्रेसी में लोगों का हक भी होता है, लोगों की जिम्मेदारी भी होती है। दोनों का बैलेंस होता है। किसी भी डेमोक्रेसी जो है उसका भी अपना कर्तव्य है कि दूसरे डेमोक्रेसी की जो परिस्थिति वो समझे तो ये हमने काफी स्पष्ट रूप में उनके सामने यह बात रखी।

नाविका कुमार: कुछ पब्लिक के सवाल सोशल मीडिया के जरिए हमारे पास आए हैं। जीतेंद्र सिंह अल्मोड़ा से पूछ रहे हैं पिछले दिनों पाकिस्तान के साथ रिश्ते को लेकर कहा गया था कि अब गेंद उनके पाले में है आपके इस बयान का क्या आशय है? क्या भारत भविष्य में पाकिस्तान के साथ नरमी दिखा सकता है?

एस जयशंकर: नहीं गेंद उनके यहां नहीं है आतंकवादी उनके यहां है। तो पहले वो आतंकवादी को शॉर्ट आउट करें न।

नाविका कुमार: और आपका आज भी वही स्टैंड है।

एस जयशंकर: ये खाली मेरा स्टैंड नहीं है। आप पब्लिक का मूड देखिए। आप में से कौन चाहता है कि हम आतंकवाद को झेलें जैसे हमने 26/11 में किया, कुछ हुआ तो हम उसको बर्दाश्त करें, कुछ जवाब न दे और कहें की नहीं पाकिस्तान हमारा पड़ोस है, हमें बातचीत करनी चाहिए आप में से एक भी आदमी कोई चाहता है, इसके पक्ष में है।

नाविका कुमार: शुभम मिश्रा लखनऊ से पूछ रहे कर्गीस्तान में पाकिस्तानी छात्रों की लिंचिंग के बाद आपने भारतीय छात्रों को अलर्ट किया और दूतावास के संकर्प में रहने को कहा क्या इसे लेकर आपके पास कुछ इनपुट है कि प्रिकोशन के तौर पर क्या कदम हो सकते हैं?

एस जयशंकर: देखिये वहां कुछ इंसीडेंट हुआ था जो हमें जो जानकारी थी ये जो बात जो शुरू ही किसी और देश के छात्राओं के साथ शुरू हुई, मुझे रात को फोन आने लगा की कर्गीस्तान के हमारे जो छात्र जो वहां पढ़ने जाते हैं. तो उन लोगों 4-5 बजे सुबह, 3-4 बजे रात को फोन आया तो मेरी हमारे एम्बेसडर से बात हुई और उन्होंने कहा की ये घटना हुई है, वो हमारे छात्रों के संपर्क में थे उन्होंने सबको सलाह दी कि इस समय हॉस्टल छोड़ के बाहर जाना यह उचित नहीं होगा। तो उनको लगा क्योंकि बहुत सारे लोग मुझे सोशल मीडिया में फॉलो करते हैं, एम्बेसी 1 एडवाइजरी दे चुकी थी। तो सोशल मीडिया में कहना लोग उसको और सीरियसली लेते हैं और अब जो मुझे बताया गया है वो तनाव कम हो गया है, कुछ लोग कुछ छात्र जो हैं उनको हॉस्पिटल जाना पड़ा, पर हमारे भारत के ऐसे कोई छात्र नहीं थे, तो ऐसे किसी को सीरियस इंजरी नहीं हुई हमारे यहां से।

नाविका कुमार: जनार्दन जयपुर से पूछ रहे हैं पीओके में इस वक्त काफी उथल पुथल है। वहां की आवाम ने पाकिस्तान सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। क्या आपको नहीं लगता कि अखंड भारत की परिकल्पना को साकार करने का यही समय है सही समय है।

एस जयशंकर: आजकल मैं देख रहा हूं, पिछले कुछ हफ्तों में भारत में भी पीओके के बारे में इंटरेस्ट जो बढ़ रहा है। अब नविका जी आप ही याद करें। 10 साल पहले कौन याद करता था पीओके को 5 साल पहले भी कोई नहीं करता था। क्यों कर रहे हैं आज लोग, आज कर रहे क्योंकि जब हमने जो है धारा 370 के बाद जो निर्णय लिया उसके बाद जो कश्मीर वैली घाटी में जो परिवर्तन आया है उसका असर आप पीओके में देखे कि वहां की पब्लिक लगता है भाई वो पड़ोसी वहां जो बैठा है उसके जीवन में इतना अच्छा हो रहा है। तो मेरे जीवन में क्यों न हो? और मेरे साथ यह जुल्म क्यों हो रहा है। तो उनके मन यह भावना तो है।

नाविका कुमार: आपके मन में कौन सी भावना हम तो वो जानना चाहते हैं?

एस जयशंकर: मेरे मन में देखिये भावना वही है जो संसद की सर्व सहमति के बाद एक निर्णय जो 30 साल पहले लिया गया था कि पीओके जो है भारत का अंग है, अंग था और अंग रहेगा। और मुझे विश्वास है कि जो आज आप कह सकते हैं की हमारी अपेक्षा है वो जरूर हकीकत होगी।

नाविका कुमार: तो थर्ड टर्म में वादा है कि पीओके भारत का हिस्सा होगा?

एस जयशंकर: देखिये अगर आप सेकेंड टर्म के शुरुआत में जिस हफ्ते में मिनिस्टर बना था, अगर आप मेरे से पूछते की 370 के बारे में आपका क्या इरादा है। मैं आपको जरूर कहूंगा की ये भाजपा की कमिटमेंट है, कमिटमेंट एक चीज है, इरादा कुछ और है, क्योंकि कमिटमेंट को इरादा बनाने के लिए आपको देखना होगा कि सब चीज अनुकूल है, पॉलिटिक्स ठीक है, ग्लोबल सिचुएशन ठीक है तो वो जजमेंट और जिसकी जिम्मेदारी है, वो लोग मिल जुलकर के बनायेंगे।

नाविका कुमार: एक सवाल जो अक्सर लोग पूछा करते हैं कि 1 तरफ चीन के साथ हमारे रिश्ते जो है, वो सबके सामने है, वो बार्डर के कई जगहों को अपने चीनी नाम दे देते हैं विपक्ष इस पर कई बार सवाल भी उठाता है। और इस सबके बीच में सवाल ये रमेश कुमार पांडे वाराणसी से पूछ रहे हैं कि साल 2023-24 में चीन 1 बार फिर भारत के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार के रूप में उभरा है। भविष्य में चीन के प्रति भारत की निर्भरता को कम करने के लिए आप क्या रणनीति करेंगे? यह चीन चीन के साथ हम एक कदम आगे, चार कदम पीछे जो होते रहते हैं इससे निजात कब मिलेगी?

एस जयशंकर: नहीं... देखिये इसमें 2 विषय हैं, जो आपका प्रश्न था न, मैं 1 चीज बहुत स्पष्ट करना चाहता हूं। मैंने कहा कि हम लोगों का कमिटमेंट है, इरादा कब बनेगा, वो मैं प्रेडिक्ट नहीं कर सकता। आपने पूछा अगले 5 साल में बन सकता है। अगले 5 साल में बहुत सारी चीजें हो सकती।

नाविका कुमार: ठीक है अब चीन का सवाल, चीन के सवाल का जवाब?

एस जयशंकर: चीन का जो है। 2-2 अलग अलग विषय हैं, कनेक्शन भी है। जो बॉर्डर का विषय जो है आज हमारी चुनौती ये है कि 62 के युद्ध में चीन जो है 38 हजार किलोमीटर हमारे भारत की धरती पर उन्होंने कब्जा किया और उन्होंने ऐसी ऐसी जगह पर पोजीशन ले ली जो हमारे लिए एक बहुत बड़ा डिसएडवांटेज। तो आज आज कल जो भी आप लोग पढ़ते होंगे न न्यूज पेपर में, मीडिया में देखते होंगे कि चीन ने मॉडल विलेज बनाया, चीन ने नया पुल बनाया, चीन ने नया रोड बनाया। ये बात जरूर आप याद रखिए कि वो उस धरती पर बन रही है जहां चीन ने 62 में कब्जा किया था, क्योंकि पब्लिक को गुमराह करने की कोशिश कर रही है कि यह सब कुछ नई चीज है। यह कई ऐसी जगह बन रही है जो 2020 के बाद उन्होंने लिया। बन रही है 1959 लॉन्ग जू में, 1960-61 -62 पैंगोंग त्सो, 1963 शक्सगाम वैली जो हो रही है। तो 1 तो बॉर्डर की स्थिति, आप लोग समझ लीजिए, जो व्यापार की जो बात हो रही है, आज कल हम लोग जो है चीन से हमारा व्यापार जो है बहुत एकतरफा है क्योंकि हमारे जो व्यापारी चीन से लेते हैं उनके लोग हमसे नहीं लेते और हम उनसे क्यों लेते हैं। क्योंकि हम लोग जो है अपने देश में मैनुफेक्चरिंग उसका सपोर्ट पहले वाली सरकार ने कभी नहीं की। हमारी मैनुफेक्चरिंग कमजोरी है। हमें दुनिया से कहीं न कहीं लेना पड़ता है। चीन जो है सबसे सस्ते में दाम बेचता तो इसका उपाय क्या है। उपाय है हमें देश में मैनुफेक्चरिंग को बढ़ावा देना है और यही है मोदी सरकार की नीति की। हम अलग अलग हम लोगों ने इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया है, हमने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव दिया है, हमने बैंक की क्रेडिट दी है, हमने स्माल मीडियम इंडस्ट्रीज को बहुत सहायता दी है। जब तक भारत में मैनुफैक्चरिंग नहीं बढ़ेगा तब तक हमारा जो चाइना से इम्पोर्ट जो आते हैं, उसको कम करना मुश्किल होगा। सो सलूशन, फॉर, चाइना, इस इकोनोमिक, ग्रोथ एट होम, इस मैनुफेक्चरिंग एट होम और राहुल गांधी, रघुराम राजन जैसे लोग उनका कहना है कि हम मैनुफेक्चरिंग में कभी काबिल नहीं हो सकते, हमारी यह क्षमता है नहीं हमें ट्राई भी नहीं करना चाहिए। हमारी सोच है कि ये हमें गलत रास्ते पर ले जा रहे।

नाविका कुमार: ईरान में चाबहार पोर्ट का एक नया एग्रीमेंट हुआ है, चुनाव के दौरान हुआ है। इस पर यूएस का भी स्टेटमेंट आया है। हालांकि वो समझते हैं कि इसका मल्टी डाइमेंशनल इशु है, लेकिन वो एक तरफ ये कहते हैं और दूसरी तरफ आगाह भी करते हैं कि देशों को सोचना चाहिए सैंक्शंस के तौर पर आज इस पर आपका क्या स्टैंड है?

एस जयशंकर: देखिये जो चाबहार का बंदरगाह जो है में एक टियर जो है हम लोग चलाते हैं। अभी तक हम लोग टेम्प्रेरी हर साल एक्सटेंशन होती थी। अभी जो सहमति बनी है, वो लॉन्ग टर्म एग्रीमेंट है। तो ग्राउंड में देखे इतना कुछ ज्यादा बदला नहीं है। यही होगा कि लॉन्ग टर्म होगा तो हम थोड़ी चीज और कर पाएंगे।

नाविका कुमार: और सैंक्शन्स का डर?

एस जयशंकर: नहीं और सालों से ये बंदरगार चल रहा है, आज तक उस पर कोई सैंक्शन नहीं लगा। तो आप रिकॉर्ड देखिए न रिकॉर्ड में है कि यूएस जो है इसे यूएस को समझ है कि चाबाहार बंदरगाह के उपयोग में यूएस का भी कहीं हित है पूरे क्षेत्र का इसमें कुछ हित है। तो मुझे लगता है कि उनके साथ बैठ के हम इस बात पर जरूर हम उनको समझा पाएंगे क्योंकि अगर प्रैक्टिकली आप देखें। इस एग्रीमेंट के कारण ऐसी कोई बड़ी चीज नहीं हो रही जो पहले नहीं हुई है। इन प्रिंसिपल, हम इन्वेस्ट और करेंगे हम पोर्ट को जरूर अलग अलग दिशा में इसके कारण और रोड वगैरह बनेंगे पर उसके अलावा इन प्रिंसिपल कोई नई चीज नहीं।

नाविका कुमार: जयशंकर जी क्योंकि पब्लिक मंच है आपकी इजाजत से पब्लिक से दो सवाल ले लूं? इतने सारे हाथ खड़े हो रहे हैं।

पब्लिक का सवाल: सर मेरा नाम मीमांसा कृष्णा है, मेरे जैसे UPSC एस्पिरेंस्ट्स को आपकी डिप्लोमेसी की कला इन्सपायर करती है, देश और विदेश दोनों में भारत का पक्ष बहुत ही दमदार तरीके से रखा है। हम भी ये सारे गुण अपने अंदर देखना चाहते हैं, तो ये गुण आपने खुद में कैसे लाए?

नाविका कुमार: विदेश मंत्री के लिए इस कॉम्प्लिमेंट के लिए जोरदार तालियां होनी चाहिए।

एस जयशंकर: मुझे लगता है कि आत्मविश्वास जगाने के लिए पहले आपको प्रेरणा का स्रोत खोजना होगा। लीडरशिप की खोज करनी होगी। मैं ये लोगों से बहुत गंभीरता से ये बात कहता हूं। किसी भी देश का विदेश मंत्री होना बहुत अच्छी बात है और बहुत गर्व की बात है। पर जब आप मोदी के विदेश मंत्री हैं तो ये आपके लिए एक स्पेशल बोनस की तरह है। बहुत सारा कॉन्फिडेंस आप अपने साथ लेकर चलते हैं। पर इसके अलावा मैं अगर बात करूं तो एक मंत्री जब विदेश जाता है तो वो क्या करता है? वो देश का मूड रिफ्लेक्ट करता है। अगर देश का मूड डाउन है। मुझे लगता है कि आज देश कॉन्फिडेंट है। जिस तरह से हम कोविड से बाहर आए हैं। मैं दूसरे देशों को देखता हूं, कुछ तो अभी तक इससे जूझ रहे हैं। हमने कैसे ग्रोथ की है। जिस आतंकवाद को हम 50-60 साल के झेलते आ रहे थे आज हम उससे अलग तरह से डील कर रहे हैं, चीन बॉर्डर के चैलेंज से हम अलग तरह से निपट रहे हैं, UN या वेस्ट के देश जो आकर कहते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबके विचार होते हैं, मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं है। प्लीज मुझे अपनी सोच बताइए, लेकिन उसके बाद आपकी सोच पर मेरी सोच को सुनने के लिए भी तैयार रहिए।

नाविका कुमार: एक आखिरी सवाल।

पब्लिक का सवाल: गुड ईवनिंग सर मेरा नाम सृष्टि है। हाल में हमारे कतर से हमारे नेवी अफसर निकलकर आए, उन्हें फांसी की सजा मिली थी, ये न्यू इंडिया की बड़ी कूटनीतिक जीत थी, तो क्या आप बता सकते हैं कि ये कैसे हुआ?

डॉ एस जयशंकर: इस मुद्दे की एक बड़ी तस्वीर है जो आपको समझनी चाहिए। इस केस में कुछ भूल हुई थी और हमें कूटनीतिक रास्तों का सहारा लेना पड़ा इसे हल करने के लिए। प्रधानमंत्री ने खुद कतर के अमीर से बात की, जिससे इस सिचुएशन में बहुत मदद मिली। पर एक बड़े मुद्दे से हम भारतीयों को डील करना पड़ता है। देखिए हममें से ज्यादा से ज्यादा लोग देश से बाहर जाएंगे, पढ़ाई के लिए, काम के लिए, छुट्टियां मनाने के लिए। कोई एयरलाइन के लिए काम करेगा, कोई शिपिंग के लिए काम करेगा। जब इतने सारे लोग देश के बाहर जाते हैं, तो हमें एक सिस्टम बनाना पड़ता है कि अपने लोगों की देखरेख कैसे की जाए। मेरे लिए, वो यूक्रेन हो सकता है, यमन हो सकता है, सूडान हो सकता है, अफगानिस्तान हो सकता है। हमें ये देख कर चलना है कि हमारे लोग अगर मुश्किल में फंसे हैं तो उन्हें उनके हाल पर ना छोड़ा जाए। उन्हें लगना चाहिए कि भारत और भारत की सरकार उनके साथ खड़ी है। पूरे देश में आज ये भरोसा है कि हम 140 करोड़ भारतीय हैं और ये मोदी सरकार है। अगर हम मुश्किल में होंगे तो ये हमारा साथ नहीं छोड़ेंगे, वो हमारे लिए आएंगे। ये फीलिंग बहुत जरूरी है।

नाविका कुमार: बहुत बड़ी बात कही आपने कि 140 करोड़ का देश और मोदी सरकार आपके पीछे खड़ी है। इन सालों में हमने कितने इस तरह के उदाहरण देखे हैं जब सरकार बचा कर लाई है, और इस सरकार को ट्रिब्यूट देने के लिए हम सभी नमन करते हैं कि ये शक्ति भारत के लोगों के लिए इस्तेमाल की गई है। हम आप सब को धन्यवाद करते हैं। जाहिर है लोग कहेंगे कि गोदी मीडिया पर जब अच्छा काम किया है तो अच्छा कहने में कम से कम मुझे कोई शर्म महसूस नहीं होती। और मैं आज इस मंच से कहूंगी कि बहुत अच्चा काम इसमें हुआ है और लोगों का कॉन्फिडेंस बढ़ा है। कॉन्फिडेंस लोगों का तो बढ़ा है लेकिन जयशंकर जी आखिरी सवाल सिर्फ आपसे इतना पूछूंगी कि कितनी सीटें? कितना कॉन्फिडेंस है?

एस जयशंकर: देखिए जब मोदी जी, मोदी सरकार, भाजपा, NDA टारगेट रखती है, जैसे मैनिफेस्टो में कुछ प्रॉमिस करती है सोच समझ कर रखती है।

नाविका कुमार: तो आबकी बार 400 पार?

एस जयशंकर: 400 पार।

नाविका कुमार: धन्यवाद डॉ एस जयशंकर, आप आए और आपने सवालों का बेबाकी से जवाब दिया। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। और ऑडियंस का भी बहुत धन्यवाद।

End of Article