Swami Vivekananda Jivan Parichay in hindi : आज पूरे देश में स्वामी विवेकानंद की जयंती मनाई जा रही है। ये दिन पवित्र दिन हिंदू कैलेंडर के अनुसार मनाया जाता है और इसका गहरा सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व है। सनातन धर्म और वेदांत दर्शन के मशालची के रूप में जाने जाने वाले स्वामी विवेकानंद अपनी ताकत, अनुशासन, देशभक्ति, आध्यात्मिकता और आत्मविश्वास पर अपनी शिक्षाओं से पीढ़ियों को प्रेरित करते रहते हैं। स्वामी विवेकानंद की जयंती हर साल 12 जनवरी को मनाई जाती है। आज का दिन National Youth Day 2026 के तौर पर मनाया जाता है। स्वामी विवेकानंद हमेशा से ही युवाओं को देश की रीढ़ मानते थे। ऐसे में आज का दिन युवाओं के लिए भी बेहद जरूरी है क्योंकि इस दिन को मनाने के पीछे का उद्देश्य स्वामी विवेकानंद के विचारों को याद करना और उन्हें अपने जीवन में अपनाना है। ऐसे में चलिये बात करते हैं युवाओं की प्रेरणा और महान सन्यासी स्वामी विवेकानंद के बारे में...
स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय Swami Vivekananda Life
स्वामी विवेकानंद का जन्म 1863 में कोलकाता में हुआ था। वे एक संत थे जिन्होंने भारतीय दर्शन और आध्यात्मिकता को दुनिया के सामने रखा। वे श्री रामकृष्ण परमहंस के समर्पित शिष्य थे और उन्होंने रामकृष्ण मिशन, बेलूर मठ और रामकृष्ण मठ की स्थापना की। 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में उनका ऐतिहासिक भाषण भारत की आध्यात्मिक शक्ति और शांति के सार्वभौमिक संदेश को दुनिया के सामने लाने में बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ।
स्वामी विवेकानंद के मूल्यों को याद करने का दिन
स्वामी विवेकानंद जयंती सिर्फ उन्हें याद भर ही करने का दिन नहीं है, बल्कि यह एक अनुशासित और नेक जीवन अपनाने, नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को मजबूत करने, करुणा के साथ मानवता की सेवा करने और प्रगति के लिए प्रयास करते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा है। उनकी शिक्षाएं लाखों लोगों को साहस, स्पष्ट सोच, भक्ति और आत्मविश्वास के रास्ते पर मार्गदर्शन करती रहती हैं।
स्वामी विवेकानंद की माता का नाम भुवनेश्वरी देवी और पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था। बचपन से ही वे तीव्र बुद्ध के धनी थे, जिन्होंने पाश्चात्य दर्शन, विज्ञान और भारतीय शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। स्वामी विवेकानंद के पिता कलकत्ता उच्च न्यायालय में एटर्नी (वकील) थे।
शतरंज के थे खिलाड़ी
स्वामी विवेकानंद को बचपन से ही घुमक्कड़ साधुओं से काफी लगाव था। वे जब भी उनकी आवाज सुनते थे, घर से बाहर आ जाते थे। आलम ये था कि साधुओं की आवाज सुनते ही उन्हें कमरे में बंद कर दिया जाता था और फिर उनके जाने पर ही बाहर निकाला जाता था। रायपुर में अपने प्रवास के दौरान उन्होंने शतरंज पर भी महारत हासिल कर ली थी। वे पखावज, तबला, इसराज और सितार भी बजा लेते थे। मगर उन्हें सबसे ज्यादा रुचि शास्त्रीय गायन में थी। यही संगीत उन्हें अपने परम गुरु रामकृष्ण परमहंस के पास लेकर गया, जिन्होंने स्वामी के जीवन को एक नई दिशा देने का काम किया।
