महिला, POCSO और गंभीर अपराधों की होती रही है सुनवाई।
साल 2000 में हुई थी शुरुआत, 2012 के निर्भया कांड के बाद मिला नया विस्तार।
Fast Track Court: नीट पेपर लीक के विरोध और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हजारों की तादाद में छात्र दिल्ली के जंतर-मंतर पर डटे हैं। वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर हैं। इस आंदोलन (Students Protest At Jantar Mantar) की चिंगारी देश की राजधानी से निकलकर कई शहरों में पहुंच चुकी है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कई बार हिंसक भी हो चुकी है। प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी कई बार आमने-सामने आ चुके हैं।
वहीं, विपक्ष लगातार सरकार पर निशाना साध रही है। इन सभी घटनाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को बड़ा फैसला लिया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार पेपर लीक के मामलों में तेजी से सुनवाई और दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करेगी। उन्होंने कहा कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे छात्र।
पीएम मोदी के इस ऐलान के बाद अगर आपके मन में यह सवाल है कि आखिर ये फास्ट ट्रैक कोर्ट है क्या और ये कैसे काम करता है तो इसका जवाब जान लीजिए।
आसान भाषा में समझें तो सामान्य अदालतों में केस लंबा चल सकता है, वहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट विशेष न्यायालय होते हैं, जिनका उद्देश्य महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई सामान्य अदालतों की तुलना में अधिक तेजी से करना है। इन अदालतों में ऐसे मामलों को प्राथमिकता दी जाती है, जिनमें शीघ्र न्याय जरूरी माना जाता है।
इनमें महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध, यौन हिंसा, पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के मामले, दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और अन्य गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई प्रमुख रूप से की जाती रही है। अब सरकार पेपर लीक जैसे मामलों के लिए भी फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था करने जा रही है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट की शुरुआत कैसे हुई?
भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट की अवधारणा वर्ष 2000 में 11वें वित्त आयोग की सिफारिश के बाद लागू हुई। आयोग ने देशभर में लंबित मामलों का बोझ कम करने और लोगों को जल्द न्याय दिलाने के उद्देश्य से 1,734 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने का सुझाव दिया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने राज्यों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई और उच्च न्यायालयों के परामर्श से राज्यों ने इन अदालतों की स्थापना की।
हालांकि, वर्ष 2011 में केंद्र सरकार ने इन अदालतों के लिए वित्तीय सहायता बंद कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि फास्ट ट्रैक कोर्ट चलाना या बंद करना राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है और वे अपनी वित्तीय क्षमता के अनुसार इस पर फैसला ले सकते हैं।
निर्भया कांड के बाद फिर मिला जोर
साल 2012 के दिल्ली निर्भया गैंगरेप मामले के बाद न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति की सिफारिशों के आधार पर महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों की सुनवाई तेज करने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट को दोबारा प्राथमिकता दी गई। आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 के बाद देशभर में इन अदालतों का दायरा बढ़ाया गया।
निर्भया गैंगरेप मामले के बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट का बढ़ा दायरा। PTI
फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य क्या है?
इन अदालतों का सबसे बड़ा उद्देश्य न्याय में होने वाली देरी को कम करना है। सामान्य अदालतों में वर्षों तक लंबित रहने वाले मामलों की तुलना में फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई को प्राथमिकता दी जाती है। लगातार सुनवाई, गवाहों के जल्द बयान, साक्ष्यों का समयबद्ध परीक्षण और तय समयसीमा में फैसला देने पर विशेष जोर रहता है। इससे अदालतों में लंबित मामलों का बोझ भी कम होता है।
पढ़ें क्या है फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य। AI IMAGE
पेपर लीक मामलों में कैसे करेगी काम?
यदि सरकार पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करती है, तो नीट (NEET), जेईई (JEE) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े पेपर लीक मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर होगी। जांच पूरी होने के बाद आरोपियों के खिलाफ मुकदमे तेजी से चलाए जाएंगे, जिससे दोषियों को जल्द सजा मिल सके और छात्रों को वर्षों तक न्याय का इंतजार न करना पड़े। इसका उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में भरोसा बहाल करना और भविष्य में ऐसे अपराधों पर रोक लगाना भी है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट के क्या फायदे हैं?
फास्ट ट्रैक कोर्ट लंबित मामलों की संख्या कम करने में मदद करती हैं। इससे पीड़ितों को समय पर न्याय मिलने की संभावना बढ़ती है और न्यायिक प्रक्रिया में लोगों का विश्वास मजबूत होता है। इसके अलावा, लंबे समय से जेल में बंद विचाराधीन कैदियों के मामलों का भी जल्द निपटारा हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट भी कई फैसलों में कह चुका है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र और निष्पक्ष सुनवाई प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है।
किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
हालांकि फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य न्याय में तेजी लाना है, लेकिन इनके सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। देश में अदालतों और न्यायाधीशों की कमी, पर्याप्त बुनियादी ढांचे का अभाव, तकनीकी संसाधनों की कमी और बढ़ते मामलों का बोझ इन अदालतों की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। कई बार फास्ट ट्रैक कोर्ट भी लंबित मामलों के दबाव से पूरी तरह मुक्त नहीं रह पाती हैं।
क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट अलग कानून के तहत काम करती है?
नहीं। फास्ट ट्रैक कोर्ट कोई अलग न्यायिक व्यवस्था नहीं है। ये सामान्य अदालतों की तरह ही भारतीय कानून और न्यायिक प्रक्रिया का पालन करती हैं। अंतर केवल इतना है कि इनमें कुछ विशेष श्रेणी के मामलों को प्राथमिकता देकर तेजी से सुनवाई और समयबद्ध फैसला सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती है।
