महाराष्ट्र में, पुलिस की मारपीट या प्रशासनिक लापरवाही के कारण हिरासत में जान गंवाने वालों के परिवारों को 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। वहीं, शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना के कारण स्थायी विकलांगता (permanent disability) होने पर 4 लाख रुपये तक का मुआवजा मिलेगा।राज्य के गृह विभाग ने मंगलवार को पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों और प्रताड़ना के पीड़ितों के लिए एक नई मुआवजा नीति की घोषणा की। इससे कुछ दिन पहले ही महाराष्ट्र कैबिनेट ने इस नीति को मंजूरी दी थी।
सरकारी आदेश (GR) के अनुसार, अगर हिरासत में प्रताड़ना के कारण किसी व्यक्ति को 50 प्रतिशत से कम स्थायी विकलांगता होती है, तो उसे 2 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। वहीं, 50 प्रतिशत या उससे अधिक विकलांगता होने पर 4 लाख रुपये दिए जाएंगे। इसके लिए मेडिकल सर्टिफिकेट और सत्यापन (verification) जरूरी होगा।
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अगर आंतरिक जांच में पुलिसकर्मी मारपीट या प्रशासनिक लापरवाही के दोषी पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए जाएंगे। आदेश में कहा गया है कि लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन, पेंशन या संपत्ति से यह मुआवजा राशि वसूल की जाएगी।यह नीति 2014 में बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर एक याचिका पर दिए गए निर्देशों के आधार पर तैयार की गई है। इसका उद्देश्य पुलिस हिरासत में जान गंवाने वालों के कानूनी उत्तराधिकारियों और हिरासत में प्रताड़ना या प्रतिबंधित तरीकों के इस्तेमाल के कारण स्थायी विकलांगता झेलने वालों को समय पर आर्थिक सहायता प्रदान करना है।
'मौत का कारण सबूतों के जरिए साबित होना चाहिए'
पुलिसकर्मियों द्वारा मारपीट, प्रताड़ना या जबरदस्ती के तरीकों से हुई मौत के मामलों में, मौत का कारण सबूतों के जरिए साबित होना चाहिए। इसमें मजिस्ट्रेट जांच, मेडिकल और फोरेंसिक रिपोर्ट, स्वतंत्र जांच, गवाहों के बयान या सीसीटीवी फुटेज जैसे सबूत शामिल हो सकते हैं। सरकारी आदेश (GR) के अनुसार, मुआवजा देने के लिए किसी व्यक्ति का आपराधिक मामले में दोषी साबित होना जरूरी नहीं है।
प्रशासनिक लापरवाही के कारण होने वाली मौतों के मामलों में, इस नीति में कई तरह की कमियों का जिक्र किया गया है। इनमें समय पर मेडिकल जांच या इलाज न देना, बीमारी या चोट की शिकायतों को नजरअंदाज करना, डॉक्टरों की सलाह न मानना और आपातकालीन चिकित्सा सहायता में देरी करना शामिल है। संबंधित जिला पुलिस अधीक्षक (SP) या पुलिस आयुक्त (Police Commissioner) को घटना के 30 दिनों के भीतर या स्थायी विकलांगता का मेडिकल सर्टिफिकेट मिलने के 30 दिनों के भीतर मुआवजे के प्रस्तावों की जांच करके उन्हें जमा करना होगा। जीआर (GR) में कहा गया है कि राज्य सरकार पुलिस महानिदेशक से प्राप्त प्रस्तावों की जांच अगले 30 दिनों के भीतर करेगी।
