What is Tirupati Model: जब कोई श्रद्धालु मंदिर में दान देता है, तो वह सिर्फ पैसे नहीं चढ़ाता। वह अपनी श्रद्धा, विश्वास और भगवान से जुड़ी अपनी भावनाएं अर्पित करता है। अयोध्या का राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, एक ऐसा स्थान, जिसके लिए लोगों ने खुले दिल से दान दिया, यह सोचकर कि उनका योगदान भगवान के धाम और सेवा में लगेगा। लेकिन जब उसी चढ़ावे को लेकर कथित गड़बड़ी के आरोप सामने आए तो हर राम भक्तों को दुख पहुंचा है और उनकी भावनाएं आहत हुई हैं। जांच जारी है, एफआईआर दर्ज हुई है। आठ लोग गिरफ्तार भी हो चुके हैं। अब जांच के नतीजे जो भी हों, लेकिन इस विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आस्था से जुड़े संस्थानों में दान और चढ़ावे पर पारदर्शिता एवं जवाबदेही को और मजबूत बनाने का समय आ गया है।
इसी बहस के बीच अब चर्चा में है तिरुपति मॉडल। आखिर ऐसा क्या है इस व्यवस्था में कि इसे मंदिर प्रबंधन और दान व्यवस्था की मिसाल बताया जा रहा है? आज इसी को समझेंगे। दरअसल, राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने सुझाव दिया है कि मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए तिरुपति जैसी प्रशासनिक व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।
नृपेंद्र मिश्र ने दिए सुझाव
अयोध्या के दान विवाद पर मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने कुछ सुझाव दिए हैं। 'द प्रिंट' के साथ बातचीत में उन्होंने दान चोरी के आरोपों को 'पीड़ादायक' बताया है। उन्होंने कहा 'यह बहुत ही पीड़ादायक है क्योंकि अगर मान लेते हैं कि भक्तों के योगदान का एक पैसा भी यदि व्यक्तियों के पास गया है, तो यह विश्वास और सम्मान की हानि है और भक्त ठगा हुआ महसूस करेंगे। इसलिए, एक नागरिक के रूप में, हर कोई आहत है। मंदिर को दान के रूप में जो कुछ भी आए, उसके एक-एक पैसे को पारदर्शी तरीके से रखा जाए। लोगों को इसे देखने दें। हर दिन के योगदान की गिनती अगले दिन हो और लोगों को देखने दिया जाए। मुझे यकीन है कि ये चीजें अब सामने आएंगी और सुधार होगा।' पूर्व नौकरशाह ने स्वीकार किया कि मंदिर प्रबंधन के शीर्ष स्तर पर कम से कम कर्मचारियों के ढांचे को औपचारिक रूप देने की आवश्यकता है।
प्रबंधन में सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है-मिश्र
उन्होंने कहा, 'मंदिर के प्रबंधन में सुधार की हमेशा गुंजाइश रहती है। अगर आप भविष्य की बात कर रहे हैं, तो मुझे लगता है कि प्रशासन को औपचारिक रूप देने की आवश्यकता है और हर चीज पर सतर्कता (विजिलेंस) की एक नियमावली (मैनुअल) होने की आवश्यकता है। उन्होंने मंदिर के प्रबंधन के लिए एक सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) की नियुक्त पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, 'सीईओ को ट्रस्ट (राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट) के साथ मिलकर काम करना चाहिए। कोई यह नहीं कह रहा है कि नियमों में बदलाव किया जाना चाहिए, उप-नियमों (बाय-लॉज) को बदला जाना चाहिए, लेकिन एक ऐसा सीईओ होना चाहिए जिसे उत्तर प्रदेश में काम करने का अनुभव हो।'
Tirupati Balaji
दान-चढ़ावा गिनने का तिरुपति का एक मॉडल है
मिश्र ने कहा कि 'यह देखते हुए कि यह अयोध्या है, आपको उत्तर प्रदेश को जानना होगा, तभी आप इसे ठीक से प्रबंधित कर सकते हैं। आपको ट्रस्टियों आदि के साथ मिलकर प्रबंधन करना होगा। तिरुपति में एक मॉडल है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि वह कानून (एक्ट) यहां ले आइए। लेकिन तिरुपति में मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के रूप में कमिश्नर (आयुक्त) रैंक का एक व्यक्ति होता है, और उनमें से प्रत्येक आमतौर पर पांच-सात साल तक रहता है और वहां की पूरी व्यवस्था को संभालता है।'
रोजाना 6 से 12 बड़ी हुंडियां भर जाती हैं
गौरतलब है कि तिरुपति मंदिर में जब श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, तो वो बड़े-बड़े दान पात्रों में अपनी सामर्थ्य के अनुसार चढ़ावा डालते हैं। इन दान पात्रों को 'हुंडी' कहा जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, आम दिनों में भी यहां हर रोज करीब 6 से 12 बड़ी हुंडियां नोटों, सिक्कों और गहनों से पूरी तरह भर जाती हैं। इन हुंडियों को बेहद कड़ी सुरक्षा के बीच हर दिन एक विशेष इमारत में ले जाया जाता है, जिसे 'परकामणि भवन' कहा जाता है। यही वो जगह है, जहां इस महा-चढ़ावे की गिनती और प्रोसेसिंग का पूरा काम होता है। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ,जिसे TTD भी कहते हैं। ये एक संगठित प्रशासनिक ढांचे के तहत काम करता है। यहां मंदिर की देखभाल, दान प्रबंधन, श्रद्धालु सेवाएं और वित्तीय निगरानी के लिए अलग-अलग स्तर पर तय प्रक्रियाएं लागू हैं। यह व्यवस्था नियमित चेंक एंड बैलेंस, रिकॉर्डिंग और प्रशासनिक जवाबदेही पर आधारित मानी जाती है।
तिरुपति में रिकॉर्डिंग-प्रशासनिक निगरानी की व्यवस्था
तिरुपति मॉडल की सबसे ज्यादा चर्चा उसकी वित्तीय निगरानी प्रणाली को लेकर होती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यहां दान की नियमित गिनती, रिकॉर्डिंग और प्रशासनिक निगरानी की व्यवस्था रहती है। परकामणि भवन में चंदे की गिनती करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए बेहद कड़े प्रोटोकॉल लागू हैं। यहां गिनती करने वाले कर्मचारियों को केवल पारंपरिक धोती पहनने की अनुमति होती है। इसके अलावा शरीर पर कोई दूसरा अतिरिक्त कपड़ा, जेब वाली शर्ट या कोई भी निजी सामान ले जाने की सख्त मनाही होती है। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि कोई भी व्यक्ति चाहकर भी चंदे का एक सिक्का या नोट अपने कपड़ों में न छिपा सके।
TTD की प्रमुख विशेषताएं
- हर वर्ष बजट और वार्षिक रिपोर्ट जारी करना
- आय और व्यय का वर्गीकृत विवरण उपलब्ध कराना
- नियमित इंटरनल और एक्सटर्नल ऑडिट
- खरीद और ठेकों के लिए निर्धारित प्रक्रियाएं
- प्रशासनिक निर्णय ट्रस्ट बोर्ड के माध्यम से लेना
- आधुनिक ERP आधारित वित्तीय प्रबंधन की दिशा में काम
कई स्तरों पर जांच से गुजरते हैं कर्मचारी
सुरक्षा का स्तर ऐसा है कि यहां सिक्कों की गिनती करने वाले स्वयंसेवकों को भी प्रवेश करने और बाहर निकलने से पहले कम से कम तीन से चार बार गहन सुरक्षा चेकिंग से गुजरना पड़ता है। इस पूरे काम की कमान आंध्र प्रदेश पुलिस के साथ मिलकर टीटीडी (TTD) की विशेष विजिलेंस और सिक्योरिटी विंग संभालती है, जिसके मुखिया खुद एक आईपीएस (IPS) रैंक के अधिकारी होते हैं। इस AI युग में तिरुपति देवस्थानम ने तकनीक का भी बेजोड़ इस्तेमाल किया है। पूरे परकामणि भवन में हाई-रिजोल्यूशन वाले सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, जो आम कैमरे नहीं हैं। ये कैमरे एआई पावर्ड सर्विलांस सिस्टम से जुड़े हुए हैं। यह एआई तकनीक वहां काम कर रहे कर्मचारियों के हर एक मूवमेंट को ट्रैक करती है और किसी भी संदिग्ध गतिविधि को तुरंत पकड़ लेती है।
दान-चढ़ावे की गिनती मंदिर के स्थाई कर्मचारी करते हैं
गड़बड़ी की गुंजाइश पूरी तरह खत्म करने के लिए, टीटीडी प्रशासन संवेदनशील और पैसों से जुड़े कामों के लिए किसी भी आउटसोर्स या कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी का इस्तेमाल नहीं करता। यहां केवल मंदिर के स्थाई और भरोसेमंद कर्मचारियों को ही तैनात किया जाता है, जिनके साथ पुलिस के आला अधिकारी लगातार ऑन-ड्यूटी रहते हैं। गिनती की प्रक्रिया भी बेहद व्यवस्थित है। परकामणि भवन में पहुंचते ही नकदी, सिक्के और गहनों को अलग-अलग लेयर्स में बांट दिया जाता है। नोटों के बंडल बनाकर उनकी गहन जांच होती है, जबकि सिक्कों की गिनती और पैकिंग के लिए एडवांस मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं, भक्तों द्वारा चढ़ाए गए सोने और चांदी के आभूषणों को बेहद सुरक्षित तरीके से स्टोर किया जाता है, जिनकी हर महीने बाकायदा वैल्यूएशन (मूल्यांकन) की जाती है और इसके बाद इसे तिरुपति स्थित टीटीडी के मुख्य खजाने में ट्रांसफर कर दिया जाता है।
balaji temple
सबसे पारदर्शी मॉडल है तिरुपति का डोनेशन सिस्टम
इंसानी निगरानी, सख्त नियम और एडवांस एआई (AI) टेक्नोलॉजी, इन तीनों के सटीक मेल ने ही तिरुपति के डोनेशन सिस्टम को भारत का सबसे पारदर्शी और मजबूत मॉडल बनाया है। यही वजह है कि आज जब भी बड़े धार्मिक स्थलों में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही की बात आती है, तो विशेषज्ञ तिरुपति मॉडल को अपनाने की सलाह देते हैं। क्योंकि यह व्यवस्था न केवल करोड़ों के चढ़ावे को सुरक्षित रखती है, बल्कि मंदिर प्रबंधन पर भक्तों के अटूट विश्वास को भी बनाए रखती है। TTD अपनी वार्षिक रिपोर्टों में कुल दान, विभिन्न स्रोतों से हुई आय, वेतन, धार्मिक गतिविधियों, सामाजिक योजनाओं, निर्माण कार्यों और अन्य खर्चों का विस्तृत ब्योरा देता है। लेकिन हर श्रद्धालु द्वारा किए गए व्यक्तिगत दान या प्रत्येक छोटे भुगतान का अलग-अलग सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया जाता। यानी संस्था समग्र वित्तीय जानकारी साझा करती है, न कि हर व्यक्तिगत लेन-देन का सार्वजनिक खुलासा।
TTD पर भी उठ चुके हैं सवाल
समय-समय पर मंदिर के हुंडी (दान पात्र) की गिनती, खरीद प्रक्रियाओं और प्रशासनिक फैसलों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। वर्ष 2020 में आंध्र प्रदेश सरकार ने पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से TTD के खातों का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) से ऑडिट कराने का निर्णय लिया था। यानी TTD को पूरी तरह विवादों से परे नहीं माना जा सकता, लेकिन उसकी संस्थागत ऑडिट व्यवस्था और नियमित वित्तीय रिपोर्टिंग उसे अन्य धार्मिक संस्थाओं की तुलना में अधिक जवाबदेह बनाती है। तो सवाल है कि क्या राम मंदिर ट्रस्ट भी ऐसा मॉडल अपना सकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े धार्मिक ट्रस्ट में श्रद्धालुओं का विश्वास मजबूत करने के लिए कुछ बुनियादी कदम उपयोगी हो सकते हैं-
- नियमित वार्षिक वित्तीय रिपोर्ट
- स्वतंत्र ऑडिट।
- दान और खर्च की श्रेणीवार सार्वजनिक जानकारी
- डिजिटल अकाउंटिंग सिस्टम
- समय-समय पर पारदर्शिता रिपोर्ट
