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पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में 93% से ज्यादा की गिरावट, 2026 में अबतक सामने आए 474 मामले

Punjab News: पंजाब में भगवंत मान सरकार की सब्सिडी नीतियों से पराली जलाने की घटनाओं में 93% की रिकॉर्ड गिरावट आई है।

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पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में भारी कमी (फोटो- PTI& ANI)

Punjab News: हर साल सर्दियां शुरू होते ही दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को लेकर बहस तेज हो जाती है। हवा जहरीली होने लगती है तो पराली जलाने के मुद्दे पर सबसे पहले पंजाब का नाम चर्चा में आ जाता है। लेकिन अब सरकारी आंकड़े इस पुरानी बहस की बदलती तस्वीर सामने रख रहे हैं। पंजाब में पिछले चार वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी कमी दर्ज की गई है। पंजाब कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में 2022 में पराली जलाने की 49,922 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जो 2025 में घटकर महज 5,114 रह गईं। और 2026 में अभी तक सिर्फ 474 घटनाएं भी सामने आई है। यानी लगभग 93 प्रतिशत से भी ज्यादा की गिरावट। यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है, जब पराली प्रबंधन देश की सबसे बड़ी पर्यावरणीय और कृषि संबंधी चुनौतियों में शामिल है। पंजाब में यह गिरावट किसानों की भागीदारी, आधुनिक कृषि मशीनों की बढ़ती उपलब्धता और भगवंत मान सरकार की ओर से लागू की गई सब्सिडी योजनाओं के बीच दर्ज हुई है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस पंजाब को वर्षों तक पराली जलाने के मुद्दे पर राजनीतिक आलोचना का सामना करना पड़ा, वहां घटनाएं तेजी से घटी हैं। इस साल के शुरुआती आंकड़े भी इसी अंतर की ओर इशारा करते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के CREAMS कार्यक्रम द्वारा 6 अक्टूबर 2026 को जारी बुलेटिन के अनुसार, 15 सितंबर से 6 अक्टूबर के बीच सात राज्यों में पराली जलाने की कुल 287 घटनाएं दर्ज हुईं। इनमें सबसे ज्यादा 118 घटनाएं मध्य प्रदेश में दर्ज की गईं, जबकि पंजाब में 88, उत्तर प्रदेश में 65 घटनाएं सामने आईं। रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि के दौरान पंजाब में किसी भी दिन पराली जलाने की घटनाएं दहाई के आंकड़े तक नहीं पहुंचीं, जबकि मध्य प्रदेश में पांच दिन ऐसे रहे जब घटनाओं की संख्या दहाई में दर्ज हुई। पंजाब के लिए यह पिछले सात वर्षों की समान शुरुआती अवधि के मुकाबले सबसे कम आंकड़ा बताया गया है, जबकि मध्य प्रदेश में इसी अवधि के लिए सबसे ज्यादा घटनाएं दर्ज हुईं। हालांकि बादलों के कारण कुछ इलाकों में उपग्रह से आग की पहचान प्रभावित होने की बात भी बुलेटिन में कही गई है।

वर्ष 2025 में छह राज्यों में पराली जलाने की कुल 33,028 घटनाएं दर्ज हुई थीं। इनमें अकेले मध्य प्रदेश में 17,067 घटनाएं हुईं, जो कुल मामलों के 50 प्रतिशत से अधिक थीं। इसके मुकाबले उत्तर प्रदेश में 7,290 और पंजाब में 5,114 घटनाएं दर्ज हुईं। पंजाब में आए बदलाव के पीछे सरकार द्वारा किसानों को उपलब्ध कराए जा रहे विकल्पों की महत्वपूर्ण भूमिका है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में राज्य सरकार ने पराली प्रबंधन के लिए आधुनिक कृषि मशीनों पर भारी सब्सिडी देने की नीति अपनाई है। सरकार का जोर इस बात पर रहा है कि किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए केवल जुर्माने और कानूनी कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय उन्हें खेतों में काम आने वाले व्यावहारिक साधन भी उपलब्ध कराए जाएं।

पंजाब के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां के अनुसार, 2026 के सीजन में किसानों ने 21,155 फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें खरीदी हैं। इनमें सबसे अधिक 14,384 सुपर सीडर शामिल हैं। इसके अलावा 1,721 मल्चर, 1,346 हाइड्रोलिक रिवर्सिबल एमबी प्लाऊ, 1,123 जीरो टिल ड्रिल, 927 बेलिंग मशीनें और 874 स्ट्रॉ रेक खरीदी गई हैं। इन मशीनों के जरिए किसानों को पराली जलाए बिना अगली फसल की बुवाई करने और फसल अवशेषों का दूसरे कार्यों में उपयोग करने की सुविधा मिल रही है।

सरकार व्यक्तिगत किसानों को कृषि मशीनों पर 50 प्रतिशत से ज्यादा सब्सिडी दे रही है, जबकि कस्टम हायरिंग सेंटरों, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और पंचायतों को 80 प्रतिशत तक सब्सिडी उपलब्ध कराई जा रही है। इस व्यवस्था का उद्देश्य उन छोटे और सीमांत किसानों को भी आधुनिक मशीनों की सुविधा देना है, जो अपने स्तर पर महंगी मशीनें खरीदने में सक्षम नहीं हैं।

पंजाब सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पराली प्रबंधन की 600 करोड़ रुपये की कार्ययोजना भी तैयार की है। इसके तहत कृषि मशीनों की उपलब्धता बढ़ाने, किसानों को तकनीकी सहायता देने और फसल अवशेषों के वैकल्पिक उपयोग को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार की ओर से साझा जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2025 में भी CRM मशीनरी के लिए लगभग 395 करोड़ रुपये की सहायता वितरित की गई थी, जिससे हजारों किसानों और संस्थाओं को लाभ पहुंचा। पराली को किसानों की अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनाने के प्रयास भी सामने आ रहे हैं। पंजाब में कुछ किसान पराली को इकट्ठा करके बायोगैस और बायो-CNG परियोजनाओं के लिए बेच रहे हैं। संगरूर के एक किसान द्वारा लगभग 12 हजार क्विंटल पराली बेचकर करीब 16 लाख रुपये की आय अर्जित करने का उदाहरण भी सामने आया है। हालांकि ऐसी कमाई बाजार, पराली की मात्रा, परिवहन लागत और खरीदारों की उपलब्धता पर निर्भर करती है, लेकिन इससे फसल अवशेषों के आर्थिक उपयोग की संभावनाएं जरूर दिखाई देती हैं।

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