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किस गलती पर रिजेक्ट होगा हेल्थ क्लेम और कब कंपनी भरेगी मुआवजा?

हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी हर मामले में क्लेम रिजेक्ट नहीं कर सकती. जानिए किन वजहों से क्लेम खारिज हो सकता है, कब कंपनी को क्लेम के साथ कम्पेनसेशन देना पड़ता है और क्लेम रिजेक्ट होने पर आपके पास क्या कानूनी विकल्प हैं.

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Health Insurance

लोग इस भरोसे के साथ हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेते हैं कि किसी मेडिकल इमरजेंसी या बीमारी के वक्त उन्हें अस्पताल और इलाज के भारी-भरकम खर्च से राहत मिलेगी। लेकिन कई बार हफ़्तों अस्पताल में बिताने और इलाज पूरा होने के बाद जब क्लेम सेटलमेंट की बारी आती है, तो बीमा कंपनी किसी बारीक तकनीकी नियम या छोटी सी वजह का हवाला देकर क्लेम को खारिज (Reject) कर देती है। ऐसे मामलों में आम इंसान खुद को ठगा सा महसूस करता है। हालांकि, अब बीमा कंपनियों की इस मनमानी पर लगाम कसने लगी है। हाल ही में महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक ऐतिहासिक फैसले में एक निजी बीमा कंपनी पर 20 लाख रुपये का भारी मुआवजा ठोक दिया।

मामला एक डॉक्टर के बेटे के ब्लड कैंसर के इलाज से जुड़ा था, जहां परिवार ने करीब 33.58 लाख रुपये खर्च किए थे। कंपनी ने सिर्फ इस आधार पर क्लेम रोक दिया कि बच्चे को बचपन में 'स्पीच डिले' यानी बोलने में थोड़ी देरी की समस्या थी, जिसे पॉलिसी लेते वक्त छिपाया गया था। उपभोक्ता आयोग ने कंपनी को फटकार लगाते हुए कहा कि बचपन में बोलने में देरी होना कोई गंभीर बीमारी नहीं है और न ही इसका कैंसर से कोई लेना-देना है। इसलिए इस आधार पर क्लेम रोकना पूरी तरह गैरकानूनी है।

कब रिजेक्ट हो सकता है आपका क्लेम

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि इंश्योरेंस कंपनियां कानूनन आपका क्लेम कब रिजेक्ट कर सकती हैं। बीमा का पूरा कॉन्ट्रैक्ट 'अटमोस्ट गुड फेथ' यानी पूरी ईमानदारी और परम विश्वास के सिद्धांत पर काम करता है। इसका मतलब है कि पॉलिसी खरीदते समय ग्राहक को अपनी सेहत और पुरानी बीमारियों से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी बिल्कुल सच-सच बतानी होती है। अगर किसी व्यक्ति को पहले से कोई गंभीर बीमारी (जैसे दिल की बीमारी या डायबिटीज) है और उसने जानबूझकर यह बात छिपाई, और बाद में उसी बीमारी के इलाज के लिए क्लेम किया, तो कंपनी का क्लेम रिजेक्ट करना पूरी तरह जायज माना जाएगा। इसके अलावा, अगर पॉलिसी का वेटिंग पीरियड (प्रतीक्षा अवधि) अभी पूरा नहीं हुआ है, प्रीमियम समय पर न भरने की वजह से पॉलिसी लैप्स हो चुकी है, या फिर अस्पताल के बिलों और दस्तावेजों में कोई हेराफेरी या फ्रॉड पाया जाता है, तो भी इंश्योरेंस कंपनी क्लेम देने से साफ इनकार कर सकती है।

कंपनियों से न छुपाएं जानकारी

लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि कंपनियां किसी भी मामूली बात को बहाना बनाकर आपका क्लेम खारिज कर दें। कंज्यूमर कोर्ट और अदालतों के हालिया फैसलों ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ संदेह या तकनीकी कमियों के आधार पर क्लेम रोकना 'सेवा में कमी' (Deficiency in Service) माना जाएगा और कंपनी को इसका हर्जाना भुगतना होगा। कोर्ट के मुताबिक, क्लेम ठुकराना तब पूरी तरह गलत माना जाएगा जब छिपाई गई जानकारी और जिस बीमारी का इलाज हुआ है, उन दोनों का आपस में कोई सिर-पैर या संबंध न हो। जैसे अगर किसी ने हल्के अस्थमा की बात नहीं बताई और बाद में उसे कैंसर हो गया, तो सिर्फ अस्थमा छिपाने के नाम पर कैंसर का क्लेम नहीं रोका जा सकता। इसी तरह, अगर पॉलिसी जारी करने से पहले कंपनी ने खुद आपका मेडिकल चेकअप कराया था, या कंपनी सालों से आपकी पॉलिसी रिन्यू करके प्रीमियम ले रही थी, तो बाद में अचानक पुरानी बीमारी का बहाना बनाकर क्लेम रिजेक्ट करना पूरी तरह गलत है। ऐसे मामलों में उपभोक्ता अदालतें कंपनी को ब्याज सहित क्लेम की राशि देने और मानसिक प्रताड़ना के लिए अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश देती हैं।

मेटेरियल फैक्ट क्या है?

कानूनी भाषा में इस पूरे विवाद की जड़ 'मटेरियल फैक्ट' (महत्वपूर्ण तथ्य) को माना जाता है। मटेरियल फैक्ट का मतलब ऐसी जानकारी से है जिससे बीमा कंपनी के रिस्क (जोखिम) पर सीधा असर पड़ता हो। अगर कोई जानकारी ऐसी है जिससे कंपनी के पॉलिसी देने या न देने के फैसले पर कोई फर्क नहीं पड़ता, तो उसे छिपाना धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता। जब तक इंश्योरेंस कंपनी कोर्ट में यह साबित नहीं कर देती कि ग्राहक द्वारा छिपाई गई जानकारी की वजह से ही यह मेडिकल स्थिति पैदा हुई है, तब तक वह क्लेम देने से बच नहीं सकती।

अगर दुर्भाग्य से कभी आपका हेल्थ क्लेम खारिज हो जाता है, तो आपको पैनिक होने की जरूरत नहीं है क्योंकि आपके पास कानूनी अधिकार सुरक्षित हैं। सबसे पहले बीमा कंपनी से क्लेम रिजेक्ट करने का आधिकारिक और लिखित कारण (Rejection Letter) मांगें। इसके बाद, कंपनी के ग्रिवेंस रिड्रेसल ऑफिसर (शिकायत निवारण अधिकारी) के पास अपनी आपत्ति दर्ज कराएं। अगर वहां 30 दिनों में समाधान नहीं मिलता, तो आप बीमा नियामक आईआरडीएआई (IRDAI) के पोर्टल पर शिकायत कर सकते हैं। इसके अलावा, आप अपनी शिकायत लेकर इंश्योरेंस ओम्बड्समैन (बीमा लोकपाल) के पास जा सकते हैं, जहां बिना किसी वकील और बिना किसी खर्च के मामलों का तेजी से निपटारा होता है। यदि वहां से भी राहत न मिले, तो आप सीधे उपभोक्ता फोरम (Consumer Court) का दरवाजा खटखटा सकते हैं, जहां उपभोक्ता के हितों की पूरी रक्षा की जाती है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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