अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले सोलर मॉड्यूल पर 126 प्रतिशत की प्रारंभिक ड्यूटी तय की है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि भारत ने सोलर मैन्युफैक्चरिंग को अनुचित सब्सिडी दी, जिससे अमेरिकी उत्पादकों को नुकसान हुआ। इस कदम से भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार लगभग बंद होने का खतरा बढ़ गया है।
भारत, इंडोनेशिया और लाओस पर कार्रवाई
अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारत के अलावा इंडोनेशिया पर 86 से 143 प्रतिशत और लाओस पर 81 प्रतिशत तक शुरुआती ड्यूटी तय की है।यूएस की एजेंसियों का दावा है कि इन देशों की सब्सिडी नीति ने वहां के निर्यातकों को अमेरिकी कंपनियों से कम कीमत पर माल बेचने में बढ़त दी। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 की पहली छमाही में भारत, इंडोनेशिया और लाओस मिलकर अमेरिका के कुल सोलर मॉड्यूल आयात का 57 प्रतिशत हिस्सा थे। ऐसे में यह फैसला वैश्विक सप्लाई चेन पर भी असर डाल सकता है।
2024 में 7128 करोड़ का निर्यात
अमेरिकी कॉमर्स डिपार्टमेंट के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में भारत से सोलर आयात का मूल्य 792.6 मिलियन डॉलर यानी करीब 7,128 करोड़ रुपये रहा, जो 2022 के मुकाबले 9 गुना से अधिक है। इससे स्पष्ट है कि भारतीय कंपनियों ने हाल के वर्षों में अमेरिकी बाजार में तेजी से हिस्सेदारी बढ़ाई थी। वहीं, Citi के विश्लेषक विक्रम बागरी के मुताबिक, इतनी ऊंची ड्यूटी दरें अमेरिकी बाजार को भारतीय निर्माताओं के लिए लगभग अनुपलब्ध बना सकती हैं। इससे भारत की सोलर निर्यात कंपनियों की आय और मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
अमेरिकी उद्योग को राहत
अमेरिकी सोलर समूह Alliance for American Solar Manufacturing and Trade ने जांच की मांग की थी। समूह का कहना है कि यह कदम घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बचाने के लिए जरूरी था। संगठन के वकील टिम ब्राइटबिल ने कहा कि यह फैसला अमेरिकी बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बहाल करने की दिशा में अहम कदम है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अमेरिका में सोलर परियोजनाओं की लागत बढ़ सकती है। ऊंची ड्यूटी का असर डेवलपर्स और उपभोक्ताओं दोनों पर पड़ेगा, खासकर ऐसे समय में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वैश्विक टैरिफ नीति को लेकर पहले ही विवादों में हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर असर
गौरतलब है कि हाल ही में दोनों देशों के बीच एक द्विपक्षीय व्यापार समझौता हुआ था, जिसका उद्देश्य आर्थिक तनाव कम करना था। ऐसे में यह कदम संबंधों में नई अनिश्चितता जोड़ सकता है। इस जांच पर अंतिम फैसला 6 जुलाई को जारी किया जाएगा। साथ ही, अमेरिकी वाणिज्य विभाग भारत, इंडोनेशिया और लाओस से आयातित सोलर सेल पर एंटी-डंपिंग जांच भी समानांतर रूप से कर रहा है। कुल मिलाकर, यह फैसला भारतीय सोलर उद्योग के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है और आने वाले महीनों में सेक्टर से जुड़े शेयरों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
इन शेयरों पर पड़ेगा असर
अमेरिका की तरफ से भारतीय सोलर मॉड्यूल पर 126 प्रतिशत शुरुआती ड्यूटी लगाने का सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ेगा जिनकी अमेरिकी बाजार में निर्यात हिस्सेदारी अधिक है। ऊंची ड्यूटी से ऑर्डर फ्लो, मार्जिन और भविष्य की कैपेक्स योजनाओं पर दबाव बन सकता है। खासकर एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सोलर मैन्युफैक्चरर्स फोकस में रहेंगे।
एक्सपोर्ट-फोकस्ड सोलर कंपनियां दबाव में
Waaree Energies : अमेरिका कंपनी के बड़े निर्यात बाजारों में शामिल रहा है। ऊंची ड्यूटी से नए ऑर्डर की प्रतिस्पर्धात्मकता घट सकती है और रेवेन्यू ग्रोथ पर असर दिख सकता है।
Adani Solar : अडानी समूह की सोलर मैन्युफैक्चरिंग इकाई का भी अमेरिकी एक्सपोजर रहा है। हालांकि समूह का फोकस घरेलू और इंटीग्रेटेड मॉडल पर है, फिर भी निर्यात अवसर सीमित हो सकते हैं।
Vikram Solar : विक्रम सोलर ने पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाई थी। ड्यूटी लागू रहने पर वैकल्पिक बाजारों की तलाश करनी पड़ सकती है।
Tata Power Solar: टाटा पावर की सोलर यूनिट का अमेरिका में सीमित एक्सपोजर है, लेकिन सेक्टर-सेंटिमेंट के चलते स्टॉक में वोलैटिलिटी संभव है।
सेक्टर पर व्यापक असर
ड्यूटी दरें यदि अंतिम रूप में बरकरार रहती हैं, तो भारतीय सोलर निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार लगभग बंद हो सकता है। इससे कंपनियां यूरोप, मिडिल ईस्ट और घरेलू बाजार की ओर शिफ्ट कर सकती हैं। शॉर्ट टर्म में निर्यात-आधारित कंपनियों के शेयरों पर दबाव और सेक्टर में हाई वोलैटिलिटी देखने को मिल सकती है, जबकि घरेलू मांग-आधारित कंपनियां अपेक्षाकृत स्थिर रह सकती हैं।
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