Tata Group Feud Noel Tata Reach out PMO : टाटा ग्रुप (Tata Group) की अंदरूनी कलह अब प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक पहुंच गई है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने Tata Sons की लिस्टिंग के मुद्दे पर अपना पक्ष रखने के लिए PMO से मुलाकात का समय मांगा है। हालांकि, अभी बैठक की तारीख तय नहीं हुई है।
टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी Tata Sons को शेयर बाजार में लिस्ट कराने के मुद्दे पर नोएल टाटा और कंपनी के बोर्ड के बीच मतभेद लगातार गहरा रहे हैं। Financial Express की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार भी टाटा ग्रुप के भीतर बढ़ते विवाद पर नजर बनाए हुए है। फिलहाल सरकार इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करने से बच रही है। लेकिन ग्रुप के शीर्ष स्तर पर मतभेद सार्वजनिक होने से चिंता बढ़ गई है।
Tata Sons की लिस्टिंग के खिलाफ नोएल टाटा?
नोएल टाटा असल में टाटा सन्स की लिस्टिंग के खिलाफ हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि Tata Sons की शेयर बाजार में लिस्टिंग से ग्रुप का दशकों पुराना ऑनरशिप स्ट्रक्चर बदल सकता है। फिलहाल Tata Trusts के पास Tata Sons की करीब 66% हिस्सेदारी है। यही कंपनी टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है।
क्यों लिस्टिंग नहीं चाहते हैं नोएल टाटा?
नोएल टाटा का मानना है कि Tata Sons में चैरिटेबल ट्रस्ट की बहुमत हिस्सेदारी होने से कंपनी को लंबी अवधि के हिसाब से फैसले लेने की आजादी मिलती है। इस व्यवस्था के तहत ग्रुप जरूरत पड़ने पर कमजोर कंपनियों को आर्थिक सहारा दे सकता है और ऐसे प्रोजेक्ट्स में निवेश कर सकता है, जिनसे तुरंत मुनाफा नहीं मिलता। उनकी दलील है कि लिस्टिंग के बाद सार्वजनिक शेयरधारकों के हित और बेहतर रिटर्न की अपेक्षाएं कंपनी के फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं। इससे टाटा ग्रुप के लंबे समय के निवेश और परोपकारी गतिविधियों से जुड़े मौजूदा मॉडल पर असर पड़ने की आशंका है।
रतन टाटा के फैसले का भी दिया हवाला
लिस्टिंग के विरोध में नोएल टाटा पहले भी कंपनी के पुराने फैसलों का हवाला दे चुके हैं। मार्च 2024 में रतन टाटा के मार्गदर्शन में Tata Sons के बोर्ड ने कंपनी को निजी बनाए रखने के पक्ष में एकमत से फैसला लिया था। जुलाई 2025 में दोनों प्रमुख टाटा ट्रस्ट्स ने भी इस रुख की पुष्टि की थी। नोएल टाटा का तर्क है कि कंपनी की रणनीति में बदलाव करते समय बहुमत शेयरधारक के अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, IPO की दिशा में आगे बढ़ने से पहले दूसरे विकल्पों पर भी विचार करना जरूरी है।
RBI के नियमों से बढ़ा लिस्टिंग का दबाव
Tata Sons की लिस्टिंग को लेकर विवाद के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियम भी अहम हैं। RBI ने 11 सितंबर, 2026 को Tata Sons की ओर से अपना NBFC रजिस्ट्रेशन स्वेच्छा से सरेंडर करने की मांग खारिज कर दी थी। इसके बाद कंपनी पर लागू नियामकीय नियमों के अनुपालन का दबाव बढ़ गया। हालांकि, नोएल टाटा का कहना है कि RBI के पत्र को सीधे लिस्टिंग का आदेश मानना सही नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि नियामक के निर्देशों का सही मतलब समझने के बाद ही आगे का फैसला लिया जाना चाहिए।
क्या है लिस्टिंग से बचने की योजना?
इसी विवाद के बीच Tata Trusts ने कंपनी के रीस्ट्रक्चरिंग का विकल्प सुझाया है। प्रस्ताव के तहत Tata Electronics Systems Solutions और Tata Consulting Engineers को Tata Sons में मर्ज करने की संभावना पेश की गई है। इसका मकसद कंपनी की नियामकीय स्थिति में बदलाव करके लिस्टिंग से बचने का रास्ता तलाशना है। हालांकि, इस प्रस्ताव पर भी स्थिति साफ नहीं है। रिपोर्टों के मुताबिक, Tata Sons का बोर्ड इसकी कानूनी वैधता पर राय ले रहा है और इस पर औपचारिक विचार करने से पहले कई पहलुओं की जांच की जा रही है।
चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर भी मतभेद
टाटा ग्रुप में जारी खींचतान केवल लिस्टिंग तक सीमित नहीं है। Tata Sons के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की आगे की भूमिका को लेकर भी मतभेद सामने आए हैं। 17 सितंबर, 2026 को हुई बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन को पांच साल का एक और कार्यकाल देने का फैसला किया गया था। नोएल टाटा ने इस फैसले का विरोध किया था। इसके बाद Tata Trusts और Tata Sons के बीच मतभेद और खुलकर सामने आए।
