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हवाई जहाज में पेट्रोल-डीजल नहीं, अब डलेगा एथेनॉल! इस देश ने लिया जेट फ्यूल बंद करने का फैसला

दक्षिण कोरिया ने विमानन क्षेत्र में एथेनॉल आधारित सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल यानी SAF को बढ़ावा देने का फैसला लिया है। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले जेट फ्यूल पर अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म करना है।

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Flight Ethanol

दुनियाभर में पर्यावरण को बचाने और प्रदूषण को कम करने के लिए लगातार नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं। गाड़ियों और फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं को काबू करने के बाद, अब वैज्ञानिकों और सरकारों का ध्यान आसमान में उड़ने वाले विमानों पर गया है। दरअसल, हवाई जहाज में इस्तेमाल होने वाला पारंपरिक जेट फ्यूल (एविएशन टरबाइन फ्यूल) हवा में भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैस छोड़ता है, जो ग्लोबल वार्मिंग को तेजी से बढ़ा रही हैं। इसी समस्या से निपटने के लिए एविएशन सेक्टर में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव होने जा रहा है।

दक्षिण कोरिया (South Korea) ने इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए एथेनॉल पर आधारित सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (Sustainable Aviation Fuel - SAF) को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने का फैसला किया है। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले जेट फ्यूल पर अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म करना है, ताकि आसमान को साफ और सुरक्षित बनाया जा सके।

सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल क्या है?

अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) क्या बला है और यह सामान्य ईंधन से किस तरह अलग है? सीधे और आसान शब्दों में कहें तो SAF पारंपरिक पेट्रोलियम आधारित जेट फ्यूल के मुकाबले कहीं ज्यादा ईको-फ्रेंडली यानी पर्यावरण के अनुकूल होता है। इसे बनाने के लिए कच्चे तेल की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि इसे एथेनॉल, खेती से निकलने वाले कचरे (कृषि अवशेष), घरों और होटलों में इस्तेमाल हो चुके कुकिंग ऑयल (खाना पकाने का तेल) और अन्य जैविक स्रोतों (ऑर्गेनिक सोर्स) से तैयार किया जा सकता है।

इस फ्यूल की सबसे बड़ी खासियत और फायदा यह है कि जब कोई विमान इसे जलाकर आसमान में उड़ान भरता है, तो उससे निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा सामान्य फ्यूल के मुकाबले बेहद कम होती है। कई रिसर्च में यह सामने आया है कि SAF के इस्तेमाल से विमानों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में 80 फीसदी तक की भारी कमी लाई जा सकती है। यही वजह है कि इसे भविष्य का ईंधन माना जा रहा है।

किस देश में इथेनॉल से उड़ेंगे जहाज?

अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दक्षिण कोरिया की सरकार ने अपनी विमानन नीतियों में एक बड़ा बदलाव किया है। सरकार ने साफ़ कर दिया है कि वह देश की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस में एथेनॉल आधारित इस हरित ईंधन (Green Fuel) के उत्पादन और इसके रोजाना के उपयोग को हर मुमकिन तरीके से सपोर्ट करेगी। दक्षिण कोरिया का लक्ष्य है कि आने वाले कुछ सालों के भीतर सभी एयरलाइंस कंपनियां कदम-दर-कदम पुराने जेट फ्यूल को छोड़ें और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाने वाले इस नए ईंधन को पूरी तरह अपना लें। इसके लिए सरकार रिफाइनरियों और एविएशन कंपनियों को विशेष छूट और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में भी मदद दे रही है। दक्षिण कोरिया के इस कदम से दुनिया के अन्य विकसित देशों पर भी अपने विमानों को ग्रीन फ्यूल पर शिफ्ट करने का दबाव बढ़ेगा, जो कि पूरी पृथ्वी के पर्यावरण के लिए एक बेहतरीन संकेत है।

अगर इस पूरे मामले को भारत के नजरिए से देखें, तो भारत भी बायोफ्यूल (Biofuel) यानी जैविक ईंधन के मामले में दुनिया में एक बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है। भारत सरकार पिछले काफी समय से एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (Ethanol Blending Program) को बहुत आक्रामक तरीके से चला रही है। मौजूदा समय में भारत में पेट्रोल के अंदर बड़े पैमाने पर गन्ने और अनाज से बने एथेनॉल को मिलाया जा रहा है, जिससे न सिर्फ प्रदूषण कम हुआ है बल्कि विदेशों से महंगे कच्चे तेल को आयात करने का देश का खर्च भी काफी घट गया है।

पेट्रोल-डीजल के अलावा, भारत अब विमानों के लिए भी सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) बनाने की तकनीकों पर तेजी से काम कर रहा है। भारतीय वैज्ञानिक और देश की बड़ी तेल कंपनियां इस कोशिश में जुटी हैं कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कृषि कचरे से हवाई जहाज का ईंधन तैयार किया जा सके, ताकि भविष्य में भारतीय विमान भी पूरी तरह स्वदेशी और प्रदूषण मुक्त ईंधन से उड़ान भर सकें।

क्या इतना आसान है जेट फ्यूल रिप्लेस करना?

हालांकि, यह सुनने में जितना आसान लगता है, असल में पूरी दुनिया के जेट फ्यूल को एथेनॉल से रिप्लेस करना उतना सीधा नहीं है। फिलहाल एविएशन इंडस्ट्री के सामने कई बड़ी और जटिल चुनौतियां खड़ी हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि आज की तारीख में जितने भी हवाई जहाज उड़ रहे हैं, उनके इंजन पारंपरिक जेट फ्यूल के हिसाब से डिजाइन किए गए हैं। पूरी तरह से एथेनॉल या SAF पर विमान उड़ाने के लिए इंजनों में तकनीकी बदलाव करने होंगे। इसके अलावा, इस नए ईंधन की सप्लाई चेन, एयरपोर्ट्स पर इसके भंडारण की व्यवस्था और सबसे बढ़कर इसका उत्पादन अभी बहुत सीमित मात्रा में हो रहा है।

यही वजह है कि अभी यह फ्यूल पारंपरिक ईंधन के मुकाबले काफी महंगा भी है। इन चुनौतियों को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआत में जेट फ्यूल को पूरी तरह बंद नहीं किया जाएगा, बल्कि पुराने ईंधन में कुछ प्रतिशत सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) को मिलाकर विमानों को उड़ाया जाएगा, और जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ेगा, इसकी मात्रा को बढ़ाकर 100 फीसदी कर दिया जाएगा।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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