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36 साल से बाजार के उतार-चढ़ाव देख रहे अजीत दयाल ने क्यों कहा, 'बाजार का ऐसा हाल कभी नहीं देखा'

पिछले 36 साल से शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव को देख रहे मार्केट एक्सपर्ट अजीत दयाल का कहना है कि उन्होंने कभी भी भारतीय बाजार ऐसी स्थिति में नहीं देखा है, जैसा यह अब हो गया है।

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अजीत दयाल ने बताया बाजार से क्यों उठा FII का भरोसा

India Stock Market Analysis : एक तरफ दुनिया में भारत की ग्रोथ स्टोरी का डंका बज रहा है। वहीं, दूसरी तरफ विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बाजार से दूरी बना रहे हैं। पिछले 36 सालों से भारतीय बाजार के हर उतार-चढ़ाव को देख चुके Quantum Advisors के संस्थापक अजीत दयाल के मुताबिक वे पहली बार भारतीय बाजार ऐसे हालात में है।

भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। लेकिन, इसके बावजूद विदेशी निवेशकों के बीच भारत को लेकर निराशा बढ़ रही है। बाजार के 36 साल के अनुभव के आधार पर अजीत दयाल ने विदेशी निवेशकों के इसी बदलते नजरिए पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

दयाल का मानना है कि विदेशी निवेशकों के भारतीय बाजार के प्रति नकारात्मक रुख के पीछे सिर्फ महंगा क्रूड, ग्लोबल ब्याज दरें या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की रेस में भारत का पीछे रहना नहीं है। असली समस्या टैक्स नीतियों, नियमों में अनिश्चितता और विदेशी पूंजी के प्रति सरकारी रवैये में है।

36 साल में कहां से कहां पहुंचे?

अजीत दयाल ने 1990 में Quantum Advisors की शुरुआत की थी। इसका मकसद संस्थागत निवेशकों को भारतीय बाजार के बारे में रिसर्च उपलब्ध कराना और उन्हें भारत में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना था। दयाल बताते हैं कि जब उन्होंने अपना काम शुरू किया था, तो भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक बंद थी।

1990 में भारतीय शेयर बाजार का मार्केट कैपिटलाइजेशन करीब 60 अरब डॉलर था, जबकि देश की GDP लगभग 350 अरब डॉलर थी। पिछले 36 साल में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भारतीय शेयर बाजार का आकार अब बढ़कर 4 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो गया है। जबकि, GDP भी लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई है।

भारत में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी लंबे समय तक बढ़ती रही। दयाल के अनुसार, पिछले 25 साल में रजिस्टर्ड FPI की संख्या करीब 500 से बढ़कर 12,000 हो गई। भारतीय सूचीबद्ध कंपनियों में FPI के निवेश का मौजूदा मूल्य उनके लेख में लगभग 800 अरब डॉलर बताया गया है।

अब क्यों आ रहा असंतोष?

दयाल का कहना है कि विदेशी निवेशकों के बीच भारत को लेकर निराशा व्यापक हो रही है। उनके मुताबिक, इस असंतोष की वजह सिर्फ वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव नहीं है। भारत के भीतर लिए जाने वाले नीतिगत फैसले भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। विदेशी निवेशकों की नाराजगी के पीछे दयाल ने टैक्स नीतियों को एक प्रमुख कारण बताया है।

उनके मुताबिक, भारत में कैपिटल गेन पर लगने वाला टैक्स कुछ विदेशी संस्थागत निवेशकों के लिए निवेश की लागत बढ़ा देता है। खासकर ऐसे पेंशन फंड और एंडोमेंट, जिन्हें अपने देश में टैक्स से छूट प्राप्त है, उनके लिए भारत में चुकाए गए टैक्स को दूसरी जगह समायोजित करना संभव नहीं भी हो सकता है।

उन्होंने एक और समस्या की ओर ध्यान दिलाया है। जब कोई पेंशन फंड अपने निवेश को एक अंतरराष्ट्रीय बाजार वाले फंड से उभरते बाजारों के फंड में स्थानांतरित करता है, तो कुछ परिस्थितियों में इसे बिक्री मानकर कैपिटल गेन टैक्स की मांग की जा सकती है।

दयाल ने रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स यानी पिछली तारीख से लागू किए जाने वाले टैक्स को भी विदेशी निवेशकों के लिए परेशानी का कारण बताया। ऐसी स्थिति में मौजूदा निवेशक पर उस निवेश से जुड़ा टैक्स आ सकता है, जिसे पहले ही भुनाया जा चुका हो।

उनका तर्क है कि निवेशक सिर्फ संभावित रिटर्न नहीं देखते। वे यह भी आकलन करते हैं कि टैक्स चुकाने के बाद कितना रिटर्न बचेगा और भविष्य में नियम बदलने का जोखिम कितना है।

गवर्नेंस पर भी उठाए सवाल

दयाल का कहना है कि विदेशी निवेशकों के बीच भारत की गवर्नेंस को लेकर भी अब सवाल उठने लगे हैं। विदेशी निवेशक किसी देश में निवेश करते समय सिर्फ आर्थिक विकास की दर नहीं देखते। वे यह भी देखते हैं कि कंपनियों में अल्पांश शेयरधारकों के हित कितने सुरक्षित हैं, नियम कितने स्थिर हैं और सरकार के फैसलों में कितनी निरंतरता है।

अगर निवेशकों को लगता है कि नियम बदल सकते हैं या उनके हितों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं है, तो मजबूत आर्थिक विकास के बावजूद वे अपना निवेश घटा सकते हैं।

डिस्क्लेमर: TIMES NOW नवभारत किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ या कमोडिटी में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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